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मैं वो हूँ जो तिरंगे का कफ़न ओढ़ता हूँ

मैं वो हूँ जो तिरंगे का कफ़न ओढ़ता हूँ

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मेरी माँ के गौरव के लिए अपना शीश भी कटाता हूँ

डर भी मुझसे डरता है, मैं वो हूँ जो तिरंगे का कफ़न ओढ़ता हूँ

 

 हिमालय भी कांप जाता है जब मैं हुंकार भरता हूँ

समंदर भी खमोश हो जाता है जब तूफानों को मैं चीरता हूँ

आसमान की क्या बिसात मेरी रवानगी से वो भी शरमा जाता है

मेरे कंधो की सितारों की चमक में वो चाँद फीका हो जाता है

अँधेरे की क्या बिसात मेरे आगे मैं सूरज बन चमकता हूँ

डर भी मुझसे डरता है, मैं वो हूँ जो तिरंगे का कफ़न ओढ़ता हूँ

 

तपती रेत नहीं ये तो माँ की गोद सा सुकून देती है

ये सफ़ेद बर्फ की चादर उसके आंचल का अहसास देती है

ये न पूछो मैं कैसे यहाँ जीता हूँ

अमृत का स्वाद कैसे बताऊ, ये तो वही जाने जो देशभक्ति का अमृत पीता है

मैं वो दीवाना हूँ जो बस माँ के गौरव के लिए जीता हूँ

डर भी मुझसे डरता है, मैं वो हूँ जो तिरंगे का कफ़न ओढ़ता हूँ

 

मानता हूँ मेरे घर में एक माँ हर वक़्त दरवाज़े को देखती है

जानता हूँ कोई है जो मेरे नाम का सिन्दूर मांग में भरती है

कंधे झुक गए है उनके जिन्होंने मुझे कंधो पे उठाया था

अरसा हो गया जब मैंने मेरी बेटी को बिठाया था

आसुंओं को मेरे मैं इन आँखों में है कैद रखता हूँ

डर भी मुझसे डरता है, मैं वो हूँ जो तिरंगे का कफ़न ओढ़ता हूँ

 

ज़िन्दगी से ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं बस ये तिरंगा हमेशा ऊँचा रहे

मौत का डर क्या, चाहता हूँ देश पर हर गोली के आगे सीना मेरा रहे

सपना है, देश की मिटटी से बना हूँ इसी मिटटी में मिल जाऊंगा

तेरा लाल हूँ भारत माँ तुझे कभी नहीं लजाउँगा

अलग ही शान होती है साहेब जब वर्दी पेहेन मैं निकलता हूँ

डर भी मुझसे डरता है, मैं वो हूँ जो तिरंगे का कफ़न ओढ़ता हूँ


Tushar Dubey

एक आवाज़ हूँ!!!!!!! तुम्हे जगाने आया हूँ

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