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बदलता समय, बदलती अहमियत

बदलता समय, बदलती अहमियत

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बात बहुत अधिक पुरानी नहीं है। 75 वर्षीय कमला देवी अपनी बालकनी में बैठी मोहल्ले के आने जाने वाले को देख रही थी। उनका अधिकतर समय इसी बालकनी में व्यतीत होता था। दोपहर के 1:00 बजते बजते मोहल्ला सूना हो जाता था। सब घरों के दरवाजे बंद हो जाते थे। ए.सी. ने सबकी खिड़कियां बंद करा दी थी। टी. वी. मोबाइल ने औरतों की बैठकें भी बंद करा दी। कहने को तो बेटे बहू पोते पोतियां सब थे। काम करने के लिए भी काम वाली आती थी। बेटे बहुओं ने उनके आराम में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। बैठे-बैठे उन्हें याद आया कि 2 दिन बाद तीज का व्रत है उन्होंने तुरंत बहू को आवाज लगाई- नीलम, रश्मि। 

तभी नीलम की आवाज़ आई, "मांजी कुछ चाहिए।" 

कमलादेवी "अरे परसों तीज है तैयारियां करनी हैं।" "हां,मांजी मुझे पता है फेसबुक पर देख लिया था।" नीलम ने कहा। 

कमलादेवी "सत्तू बनाने हैं।" 

नीलम "वह ऑनलाइन ऑर्डर दे दिया और पूजा का सामान भी ऑनलाइन आ जाएगा।" 

दो दिन बाद तीज का त्योहार आया। कमला देवी ने आवाज लगाई "तीज माता माढ़नी है। मिट्टी और नीम की डाली तो ले आओ।" तभी रश्मि की आवाज आई, "उसकी जरूरत नहीं माजी फेसबुक, व्हाट्सएप पर तीज माता की फोटो है उसी को देख कर पूजा कर लेंगे।" 

कमला देवी अपना सा मुंह लेकर रह गई। अब उनके हूनर और सुझाव की किसी को जरूरत नहीं थी। फिर उन्हें याद आया तीज की कहानी तो मुझसे ही सुनेंगे मन ही मन प्रफुल्लित हुई कि कोई तो ऐसा काम है जहां उनकी जरूरत होगी। शाम को कमलादेवी सबसे पहले तैयार होकर बालकनी में बैठ गई। बहुएं और आस पड़ोस की महिलाएं कहानी सुनने तो उसे ही बुलाएगी। बैठे-बैठे घड़ी में 8:00 बज गए तो उन्होंने बहू को आवाज लगाई "अरे कहानी कब सुनोगी इतनी देर हो गई।" तभी रश्मि ने कहा "वह तो हमने 7:00 बजे ही सुनली।" कमला देवी आश्चर्य से पूछती है कैसे ? "आजकल किसी की जरूरत नहीं यूट्यूब पर सब मिल जाता है तो हमने उसी पर सुन ली" नीलम ने कहा। 

कमला देवी मन मसोज कर रह गई। थोड़ी बहुत जो खुशी के पल मिलते वह भी इस यूट्यूब ने छीन लिए। वह बुदबुदाई। पिछले हफ्ते ही रश्मि ने चने और करेले का अचार डाला तब भी कमला देवी को लगा था अब तो उनका महत्व बढ़ेगा वह बहुओं को बताएंगी अचार कैसे बनाया जाता है, पर यह हक भी यूट्यूब ने छीन लिया। दिनभर बालकनी में बैठी बैठी यही इंतजार किया करती थी शायद किसी को उनके हुनर और तजुर्बे की जरूरत पड़ जाए। उन्हें याद आ रहा था वर्षों पहले जब वह इस घर में बहू बनकर आई थी तब उन्हें पढ़ाई के अलावा और कुछ नहीं आता था पर उनकी सास और ददिया सास कैसे साया बनकर उसके साथ रहती थी। एक एक चीज खाना बनाना, अचार, पापड़ , मिठाईयां सिलाई कढ़ाई से लेकर बच्चे पालने तक सब उन से सीख सीख कर ही वह एक कुशल ग्रहणी बनी थी। केवल वही क्यों आसपास की औरतें भी कैसे अपनत्व से उनके पास अपनी समस्या लेकर आती थी। एक जाती तो दूसरी आती। मोहल्ले की सभी बुजुर्ग महिलाओं की यही स्थिति थी। वह भी बड़े अपनत्व के साथ सबका स्वागत करती थी। एकादशी का व्रत कब है, चौथ का उद्यापन कैसे करें, नए काम शुरू कब करें, चलता फिरता गूगल ही थी वह। पति के जाने के बाद सास के साथ बैठकर चाय, नाश्ता, खाना होता था। उसे कभी किसी व्हाट्सएप यूट्यूब या गूगल की जरूरत नहीं पड़ी और आज तो यूट्यूब ही सास बना बैठा है। वह मन ही मन बुदबुदाते हुए आधुनिक साधनों को कोस रही थी। उन्हें लग रहा था कि अब उनकी कोई अहमियत नहीं रहीं।

समय के साथ आगे बढ़ना गलत नहीं है। परिवर्तन को स्वीकार ना ही समझदारी है। परंतु कुछ रिश्ते, कुछ भावनाएं ऐसी होती है जो ना बदले तो ही अच्छा है। जो महिलाएं अकेली है जिनके पास कोई बताने वाला नहीं उनके लिए तो यह नए साधन बहुत उपयोगी हैं। पर जब घर में ही इतने तजुर्बेकार और हुनरमंद इंसान मौजूद हो तो उसे अनदेखा नहीं करना चाहिए । उनके पास सिर्फ हमारी समस्याओं का समाधान या जानकारी ही नहीं बल्कि उनका प्रेम, उनकी भावनाएं भी होती है। एक अदृश्य आशीर्वाद होता है,अनकही सी,अनसुनी सी दुआएं होती है आधुनिक साधनों के साथ साथ उनकी राय को भी शामिल किया जा सकता हैं। इससे उनके प्रति सम्मान और प्रेम बढ़ेगा। उनकी अहमियत बनी रहेगी बल्कि आपसी रिश्ते भी मजबूत होंगे। बुजुर्गो का मान बना रहेगा। आजकल रिश्तों में जो दूरियां आ गई है, उनका एक कारण यह भी है कि संवाद कम हो गए हैं।

किसी ने कहा है, "कुछ पल बैठा करो बुजुर्गो के पास, हर चीज गुगल पर नहीं मिलती।


Dr Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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