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अंधविश्वास के अँधेरे से बाहर निकलों

अंधविश्वास के अँधेरे से बाहर निकलों

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“अंधविश्वास के अँधेरे से बाहर निकलों,यदि मानव जाति किसी के द्वारा आरोपित किए गए विचारों पर ध्यान न दे, और अपने तर्क से सत्य का अनुसरण करे, तो उसकी उन्नति को कोई रोक नहीं सकता, तभी मानव जाति प्रत्येक भेदभाव को मिटा कर प्रगति की राह पर अग्रसर हो सकती है। विचलित करने वाले अन्धविश्वासी हैं, धर्माध हैं, वे पूरे समाज मैं अन्धकार फैलाना चाहते हैं। - राजा राम मोहन राय

अंधविश्वास, झुठ, पाखंड, अवैचारिक जीवनशैली, रूढिवादिता, गलत परम्पराओं का हमारे जीवन में प्रवेश, हमारे मनमस्तिष्क कि सोच की शुन्य अवस्था को प्रकट करता हैं। आंख बंद करके मैं और आप आज भी और कल भी इन अंधविश्वासों को स्वीकार्य कर रहे है तो इसका मतलब यह नहीं की हम मरें हुए जीवित हैं, ब्लकि इसका मतलब यह हे कि हम जीवित होकर मृत प्राय हो चुके हैं। विवेक शुन्यता, एवं भाग्यवादिता के कारण हमारे द्वारा इसे और अधिक पोषण प्रदान किया जाता हैं। सामाजिक रूप से पुरानी रूढिवादि विचारों से प्रभावित अंधविश्वास एक सामाजिक बुराई एवं अपशब्द हैं।

सूचना क्रान्ति , आधुनिकता, के युग में जहाँ हम विकास के नये आयाम स्पर्श कर रहे हे फिर भी समाज का बहुत बडा विशेष कर, शिक्षित समाज का हिस्सा अंधविश्वास, आडम्बर, रूढिवादिता, झूठी परम्पराएँ, मान्यताएँ, कई पाखंडियों के समूह के भँवर जाल में इस तरह फंसा हुआ हे कि बिना औचित्य के हमारे द्वारा भी इन अंधविश्वासों, परम्पराओं को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाता हैं। आधुनिक विकास के युग में भी जहां हम इन सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने में दस कदम पीछे हट जाते हैं, वहीं 18 वीं शताब्दी के दौरान समाज में प्रचलित इन सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के प्रबल समर्थक राजाराम मोहन राय इन समाज कि बुराईयों के प्रवाह के विरूद्ध अकेले खडे हुए थें। 

राजा राम मोहन राय

(22 मई 1772 -27 सितंबर 1833) राजा राममोहन राय एक भारतीय सामाजिक शिक्षा सुधारक थे, जिन्हें “आधुनिक भारत के निर्माता” और “आधुनिक भारत के पिता”और “बंगाल पुनर्जागरण के पिता” के नाम से भी जाना जाता था। जिन्होंने 18 वीं शताब्दी के दौरान समाज में प्रचलित सामाजिक बुराइयों को खत्म करने में बहुत योगदान दिया था।

सामाजिक सुधारक राजा राम मोहन राय धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांडों के प्रबल विरोधी थे । जिन्होंने भारत को बदलने के लिए सहरानीय प्रयास किए और पुरानी हिंदू परंपराओं को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई थी। उन्हें उस समय महिलाओं के अधिकारों के लिए, उनकी लड़ाई के लिए याद किया जाता है जब देश कठोर सामाजिक मानदंडों और परंपराओं से पीड़ित था जिसमें सती प्रथा भी शामिल थी। सामाजिक और शैक्षणिक सुधारक राजा राम मोहन राय एक दूरदर्शी थे जिनका भारत के सबसे अंधेरे सामाजिक चरणों के दौरान जन्म हुआ था। वह ब्रह्मा समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता थे।

उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और पत्रकारिता के कुशल संयोग से दोनों क्षेत्रों को गति प्रदान की थी। उनके आन्दोलनों ने जहाँ पत्रकारिता को चमक दी वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का भी कार्य किया था। राम मोहन को मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने राजा की उपाधि दी थी। उनका प्रभाव राजनीति, लोक प्रशासन शिक्षा और धर्म के क्षेत्र में स्पष्ट था। उन्हें सती और बाल विवाह की प्रथाओं को खत्म करने के प्रयासों के लिए जाना जाता था। 2004 में रॉय को बीबीसी के अब तक के सबसे महान बंगाली पोल में 10 वें स्थान पर रखा गया था। 

1. राजा राममोहन राय का संक्षिप्त जीवन परिचय

राम मोहन राय का जन्म राधानगर, हुगली जिले, बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था। उनके परदादा कृष्णकांता बंद्योपाध्याय एक दुर्लभ कुलीन, कुलीन ब्राह्मण थे। 12 वीं शताब्दी में बल्लाल सेन द्वारा कन्नौज से आयात किए गए ब्राह्मणों के छह परिवारों के कुलीन ब्राह्मण, वंशज के बीच, 19 वीं सदी में कई महिलाओं से शादी, बहुविवाह करके दहेज के लिए जीवित रहने के लिए कुख्यात थे। कुलीनवाद, बहुविवाह और दहेज प्रथा का पर्याय था। जिसके खिलाफ राममोहन ने अभियान चलाया था। उस समयए देश कई सामाजिक.आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से पीड़ित था, जिसने धर्म के नाम पर विवाद पैदा कर रखे थे। तथ्यों के अनुसार राम मोहन रॉय का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जो धार्मिक विविधता प्रदर्शित करता था। उनके पिता, रामकांता एक वैष्णव थे, जबकि उनकी माँ तारिणी देवी भारतीय इतिहास के सबसे अंधाकारमय युग में रह रहीं थीं,और एक शैव परिवार से थीं।

 2. शिक्षा व रचनात्मक कार्य

 राम मोहन संस्कृत, अरबी, फ़ारसी,अंग्रेज़ी, ग्रीक, हिब्रू भाषाओं के महान विद्वान थे । हिन्दू, ईसाई, इस्लाम और सूफ़ी धर्म का भी उन्होंने गम्भीरता से अध्ययन किया था। 17 वर्ष की अल्पायु में ही वे मूर्ति पूजा विरोधी हो गये थे।। धर्म और समाज सुधार उनका मुख्य लक्ष्य था। वे ईश्वर की एकता में विश्वास करते थे और सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांडों के विरोधी थे। अपने विचारों को उन्होंने लेखों और पुस्तकों के के माध्यम से भी प्रकाशित करवाया था।

राजाराममोहन राय ने 1814 में नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। हिंदू धर्म के रूढ़िवादी विचारों का विरोध करते हुए उन्होंने वैज्ञानिक स्वभाव का समर्थन किया था। हिन्दू धर्म में मूर्तिपूजा, बहुविवाह, बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, बहुविवाह के खिलाफ भी अभियान चलाया। इस बीच उन्होंने वेदान्त सूत्र उपनिषद का बंगला अनुवाद किया। 1823 में हिन्दू नारी के अधिकारों का हनन नामक पुस्तक लिखी, जिसमें यह मांग की गयी कि हिन्दू नारी को अपने पति की सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए । 1827 में वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध वजसूचि नामक पुस्तक लिखी।

उन्होंने कोलकाता में 1816 में भारत का पहला अंग्रेजी माध्यम स्कूल शुरू किया जो बाद में एंग्लो-हिंदू स्कूल के रूप में जाना जाने लगा। 1822 में, राम मोहन राय ने फ़ारसी में मिरात-उल-अकबर पत्रिका का प्रकाशन किया और समाचार पत्र सम्बाद कोमुड़ी की स्थापना की।1828 में ब्रह्म समाज की,आत्मीय सभा की स्थापना की।

राजा राम मोहन राय केवल हिन्दू पुनरुत्थान के प्रतीक नहीं थे अपितु सच्चे अर्थ में वे धर्म निरपेक्षता वादी थे। 1802 में उन्होंने एकेश्वरवाद के समर्थन में फारसी भाषा में पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक की भूमिका उन्होंने अरबी भाषा में लिखी। 1816 में उनकी पुस्तक वेदान्त सार का प्रकाशन हुआ, जिसके माध्यम से उन्होंने ईश्वरवाद और कर्मकाण्ड की घोर आलोचना की।

3. राजाराम मोहन राय के प्रमुख विचार जो उस समय की परिस्थितियों पर कठोर प्रहार के रूप में थे।

i. मैं हिन्दू धर्म का नहीं, उसमें व्याप्त कुरीतियों का विरोधी हूँ।

ii. प्रत्येक स्त्री को पुरूषों की तरह अधिकार प्राप्त हो, क्योंकि स्त्री ही पुरूष की जननी है, हमें हर हाल में स्त्री का सम्मान करना चाहिए।

iii. हमारे समाज के लोग यह समझते हैं कि नदी में नहाने से, पीपल की पूजा करने से और पण्डित को दान करने से हमारे पाप धुल जाएँगे,जो ऐसा समझते हैं, वे भूल कर रहे हैं,यदि उन्हें नदी में स्नान करने से कभी मुक्ति मिल सकती, है तो वे अंधविश्वास के अँधेरे में भटक रहे हैं।

iv. किसी भी धर्म का ग्रन्थ पढने से जाति भ्रष्ट होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मैंने तो कई बार बाइबिल और कुरानेशरीफ को पढ़ा है। मै न तो ईसाई बना और न ही मुसलमान बना, बहुत से यूरोपियन गीता और रामायण पढ़ते हैं, वे तो हिंदू नहीं हुए

v. सभी धर्मों में एकेश्वरवाद का ही प्रचलन है। इसलिए वे धर्मों की मौलिक एकता पर विश्वास करते थे। सभी धर्मों में व्याप्त आडम्बर और अंधविश्वास त्याज्य हैं। जबकि सभी धर्मों के सार स्वीकार्य है। इस आधार पर उन्होंने हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा व अंधविश्वास का खुलकर विरोध किया। जिसके परिणामस्वरूप इन्हें माता पिता के साथ ही पत्नी के गुस्से का भी शिकार होना पड़ा।

vi. इसी तरह उन्होंने ईसा मसीह के दैवी होने तथा मानव को अभिमंत्रित व अभिशापित में विभाजित करने वाली इस्लाम की अनन्यता की भी आलोचना की। धर्म के संदर्भ में उनके बारे में मॉनियर विलियम्स ने लिखा है,राजा राममोहन राय सम्भवतः तुलनात्मक धर्मशास्त्र के प्रथम सच्चे अन्वेषक थे।

vii. उत्कृष्टता वो कला है जो प्रशिक्षण और आदत से आती है। हम इसलिए सही कार्य नहीं करते कि हमारे अन्दर अच्छाई या उत्कृष्टता है ,बल्कि वो हमारे अन्दर इसलिए हैं क्योंकि हमने सही कार्य किया है,हम वो हैं जो हम बार बार करते हैं। इसलिए उत्कृष्टता कोई कार्य नहीं बल्कि एक आदत है।

viii. सभी जाति के मनुष्यों को ईश्वर की पूजा का अधिकार प्राप्त है। समाज सुधारक राजा राम मोहन राय का मानना था राजनीतिक विकास का तब तक कोई मूल्य नहीं है जब तक समाज का सुधार या विकास नहीं होगा। समाज सुधार में स्त्री शिक्षा के वे पक्षधर थे। अतः नारी शिक्षा और स्त्रियों के अधिकारों पर विशेष बल दिये । राजा राम मोहन राय पहले भारतीय हैं जिन्होंने ये कहा कि पिता की सम्पत्ति में बेटी का भी कानूनी हक होना चाहिये।

x. नारी पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ राम मोहन राय ने सबसे पहले आवाज उठाई थी। विधवा विवाह के समर्थक थे। बाल विवाह के विरोधी थे। 

xi. राजाराम मोहन राय परम्परा के खिलाफ थे, क्योंकि उनका कहना था कि परम्परा के तहत कई बार अविवेक पूर्ण कार्य को श्रद्धा का विषय बना दिया जाता है। सामाजिक समस्याओं के प्रति सदैव जागरूक रहे। वे जमींदारों को किसानों का शोषक कहते थे।

xii. समाचार पत्रों को पिछड़ी जातियों तक पहुंचाया जाए, जिससे कि वे ज्ञान के प्रकाश से सराबोर हो सके।13.पूजा बाहरी कर्मकाण्डों से नहीं वरन् आत्मा की शुद्धता से होती है। वह एकेश्वरवादी थे। धार्मिक विवादों को सुलझाने के लिए उन्होंने एकेश्वरवाद को अपनाया। राजा राममोहन राय सांसारिक समस्याओं के समाधान में विश्वास करते थे। वह इसके लिए धर्म या ईश्वर पर निर्भर रहने के विरोधी थे। इस प्रकार उन्होंने भारत में एक नवीन वैचारिक क्रांति का शुमारम्भ किया था।

4. कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष

राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरी लड़ाई उनकी अपने ही देश के नागरिकों से थी। जो अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल विवाह ,सती प्रथा, जातिवाद,कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया।

उन्होंने महिलाओं के लिए पुरूषों के समान अधिकारों के लिए प्रचार किया। जिसमें उन्होंने पुनर्विवाह का अधिकार और संपत्ति रखने का अधिकार की भी वकालत की। धर्म प्रचार के क्षेत्र में अलेक्जेंडर डफ्फ ने उनकी काफी सहायता की। देवेंद्र नाथ टैगोर उनके सबसे प्रमुख अनुयायी थे। आधुनिक भारत के निर्माता,सबसे बड़ी सामाजिक,धार्मिक सुधार आंदोलनों के संस्थापक,ब्रह्म समाज,राजा राम मोहन ने राय सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही अंग्रेजी,आधुनिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी और विज्ञान के अध्ययन को लोकप्रिय करने और भारतीय समाज में विभिन्न बदलाव की भी वकालत की। 

5. राममोहन राय और सती प्रथा का अन्त 

सती प्रथा का पाखंड रोकने वाले राजाराम मोहन राय एक तरफ नये क्रूर प्रसंगों का विकास तो दूसरी तरफ पुराने प्रसंगों का लौट कर आना स्त्री के प्रति दोहरी बर्बरता का स्त्रोत बन गया है। वर्तमान समय में भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा नहीं मिल पाया है और आज भी वे इसके लिए लगातार संघर्ष कर रही है। लेकिन लगभग 200 साल पहले जब सती प्रथा जैसी बुराइयों ने समाज को जकड़ रखा था तब राजा राम मोहन राय जैसे सामाजिक सुधारकों ने समाज में बदलाव लाने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक तुहपत अल-मुवाहिद्दीन लिखीं, जिसमें उन्होंने धर्म की वकालत की और उसके रीति,रिवाजों और अनुष्ठानों का विरोध किया।

उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया, जिसमें एक विधवा को अपने पति की चिता के साथ जल जाने के लिए मजबूर किया जाता था। प्राचीन परिवेश में विघ्न मानसिकता की उपज स्त्री प्रताड़ना का विभत्स रूप सती प्रथा थी। सती कुछ पुरातन भारतीय समुदायों में प्रचलित एक ऐसी धार्मिक प्रथा थी, जिसमें किसी पुरुष की मृत्त्यु के बाद उसकी पत्नी उसके अंतिम संस्कार के दौरान उसकी चिता में स्वयमेव प्रविष्ट होकर आत्मत्याग कर लेती थी। महिलाओं के इस बलिदान को याद रखने के लिए उक्त स्थान पर मंदिर बना दिये गए और उन महिलाओं को सती कहा जाने लगा। तभी से सती के प्रति सम्मान बढ़ गया और सती प्रथा प्रचलन में आ गई। इस प्रथा के लिए धर्म नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियां और लालचियों की नीयत जिम्मेदार थी। जिसमें जीवित विधवाओं को जिन्दा उसके पति के साथ जलाया जाता था, और सतीत्व का दर्जा दिया जाता था, और यदि यहीं स्त्री विरोध करती थी, सती नहीं होती थी तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर उसे कुलटा की उपाधि से सुशोभित किया जाता था।

उन्नीसवीं सदी में एक नवजात कन्या उस परिस्थिति में जन्म लेकर हर्षित होकर जच्चा गृह के कोने में जलाई गई आग इसलिए देख रही है कि उसे आगे चलकर उसे सती होना है। सतीत्व के नाम पर विभ्रम की स्थिति पैदा की जाती थी। स्त्री सती नहीं होना चाहती थी। परन्तु लोग सती करने में आमद थे। सती मैया की पूजा , सती स्थलों पर लगाऐ गए मेलें उस समय के अंधविश्वास को और ज्यादा मजबुत करतें थे ।

6. राजा राम मोहन राय के जीवन की वह घटना जो सती प्रथा के उन्मूलन के लिए उत्तरदायी रहीं।

यहां पर यदि इन कुप्रथाओं को भेदकर एक आधुनिक समाज बनाने की अगर किसी ने कल्पना की थी तो वे भारतीय नवजागरण के अग्रदूत राजा राम मोहन राय थे। आधुनिक भारत के निर्माता राजा राम मोहन राय को सबसे अधिक इस बात के लिए भी जाना जाता है कि उन्होंने ताउम्र महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और समाज में व्याप्त बुराइयों को नष्ट करने का प्रयास किया। राजा राम मोहन राय सती प्रथा को अमानुषिक मानते थे। उनके अनुसार सह मरण का सिद्धान्त शास्त्र के अनुसार सत्य नहीं है अपितु ये सोच विकृत कुसंस्कार है। आपके प्रयासों का ही परिणाम है कि लॉर्ड बैंटिक ने 4 दिसम्बर 1829 को एक आदेश जारी किया जिसके तहत सती प्रथा पर रोक लगाई गई।

7. समाज के ठेकेदारों का निर्मम रूप सती प्रथा 

सती प्रथा के मिटने से राजा राममोहन राय संसार के मानवतावादी सुधारकों की सर्वप्रथम पंक्ति में आ गये थे। उस वक्त सती के नाम पर बंगाल में महिलाओं को जिंदा जला दिया जाता था। उस समय बाल विवाह की प्रथा भी थी। कहीं कहीं तो 50 वर्ष के व्यक्ति के साथ 12 से13 वर्ष की बच्ची का विवाह कर दिया जाता था, और फिर अगर उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी तो उस बच्ची को उसकी चिता पर बिठा कर जिंदा जला दिया जाता था। जिसमें जलती हुई महिलाओं की चीखों और उनके दर्द की पीड़ा पर कोई भी ध्यान नहीं देता था।

राजा राम मोहन राय को महिलाओं के प्रति दर्द उस वक्त एहसास हुआ जब उन्होंने अपने ही घर में अपनी ही भाभी को सती होते देखा। राम मोहन ने कभी यह नहीं सोचा था कि जिस सती प्रथा का वह विरोध कर रहे हैं और जिसे समाज से मिटाना चाहते हैं, उनकी भाभी भी उसी का शिकार हो जाएंगी। इसके बाद मोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ अपने आंदोलन को तेज कर दिया। राजा राम मोहन राय को किसी काम से इंग्लैण्ड जाना पड़ा। उनके जाने के बाद बड़े भाई जगमोहन की अचानक मृत्यु हो गई उस समय समाज में सतीप्रथा अपनी जड़ें जमा चुकी थी। पति की मृत्यु के बाद राजा राम मोहन राय की भाभी सती नहीं होना चाहती थीं परन्तु उस समय धर्म के ठेकेदारों ने उनकी भाभी को जिन्दा जलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब यह घटना घटी उस समय राम मोहन राय विदेश में थे, माना जाता है कि गांव के लोगों ने नगाड़े की तेज़ आवाज में भाभी की चीत्कारआर्तनाद को दबा दिया गया था। जोर जोर से नगाड़े बजा कर घर से खींचते हुए भाई की चिता के साथ ही उनकी पत्नी को चिता पर बैठा दिया गया। उनकी भाभी को चिता में बांध कर आग लगा दि गई। माना जाता है कि इस घटना से पहले भाभी ने राजा राममोहन राय के लिए एक पत्र भी लिखकर छोड़ा था। कुछ समय बाद राजा राममोहन राय विदेश से वापस आए अपने कमरे में जाते ही भाभी द्वारा लिखे उस पत्र को पढ़ कर उन्हें कैसा लगा होगा इसकी कल्पना करना बेहद कठिन है।

भाभी का लिखा हुआ पत्र पढ़कर और धर्म के नाम पर चलने वाली इस नृशंसता को देख कर राजा राम मोहन राय का मन चीत्कार कर उठा, वे भाभी को बचा तो नहीं सके लेकिन इस घटना का उनके मन मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि 1885 में सती प्रथा के विरोध में प्रथम धार्मिक लेख लिखा। एक प्रकार से भारतीय समाज में आचार−विचार को स्वतंत्रता का श्रीगणेश यहीं से प्रारम्भ हुआ। यहीं से समाज सुधार की प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई। सती प्रथा के विरोध में यह उनका प्रथम प्रयास था।इसके बाद मोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ अपने आंदोलन को तेज कर दिया। भाभी के त्याग के बाद उन्होंने ठान लिया था कि अब ऐसा किसी महिला के साथ नहीं होने देंगे। भाभी के त्याग ने उन्हें सती प्रथा उन्मूलन एवं विधवा पुनर्विवाह के लिए काम करने पर मजबूर कर दिया था।उन्होंने समाज की कुरीतियों जैसे सती प्रथाए बाल विवाह के खिलाफ खुल कर संघर्ष किया और तब के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक की मदद से 1929 में सती प्रथा के खिलाफ कानून बनवाया।

8. सती प्रथा के खिलाफ प्रयास

इस प्रथा का अन्त राजा राममोहन राय ने अंग्रेज के गवर्नर लार्ड विलियम बैंटिक की सहायता से की ।1829 में अंग्रेजों द्वारा भारत में इसे गैरकानूनी घोषित किया गया । सती प्रथा को भारतीय समाज के ऊपर एक कलंक के तौर पर माना गया। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि सती प्रथा का निवारण थी। उन्होंने अपने अथक प्रयासों से सरकार द्वारा इस कुप्रथा को गैरकानूनी और दण्डनीय घोषित करवाया। उन्होंने इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन समाचारपत्रों तथा मंच दोनों माध्यमों से चला। इसका विरोध इतना अधिक था कि एक अवसर पर तो उनका जीवन ही खतरे में पड़ गया था। वह अपने विरोधी पक्षों के हमले से कभी नहीं घबराये। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था कि 1829 में वह सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सके।

सती प्रथा के समर्थक कट्टर लोगों ने जब इंग्लैंड में प्रिवी कॉउन्सिल में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। तब उन्होंने भी अपने प्रगतिशील मित्रों और साथी कार्यकर्ताओं की ओर से ब्रिटिश संसद के सम्मुख अपना विरोधी प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया। उन्हें तब प्रसन्नता हुई। जब प्रिवी कॉउन्सिल ने सती प्रथा के समर्थकों के प्रार्थना पत्र को अस्वीकृत कर दिया। सती प्रथा के मिटने से राजा राममोहन राय संसार के मानवतावादी सुधारकों की सर्वप्रथम पंक्ति में आ गये। भारतीय समाज के अनेकों समाज सुधारकों जैसे राजा राम मोहन राय आदि के अथक प्रयासों के द्वारा 4 दिसम्बर साल 1829 को समाज को सती प्रथा के कलंक से मुक्ति मिल गई थी । 

9. सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागरूक किया

भारत में ब्रिटिश राज के समय में अंग्रेजों ने सती प्रथा को भारत में एक ठीक प्रथा नहीं माना था लेकिन धार्मिक दृष्टि से मजबूत होने का कारण उन्होंने इसे सीधा समाप्त करने के बजाय इसका प्रभाव धीरे धीरे कम करने का विचार किया। ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागरूक किया। जिसके फलस्वरूप इस आन्दोलन को बल मिला और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार को सती प्रथा को रोकने के लिये कानून बनाने पर विवश होना पड़ा था। अन्त उन्होंने सन् 1829 में सती प्रथा रोकने का कानून पारित किया।

इस प्रकार भारत से सती प्रथा का अन्त हो गया। राजा राम मोहन राय ने ना सिर्फ सती प्रथा का विरोध किया बल्कि उन्होंने समाज के उत्थान के लिए विधवा विवाह को सामाजिक स्वीकृति देना जरूरी बताया। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा की गलत परंपराओं धारणाओं और उसके प्रभावों के साथ उसके निवारण पर हिंदी अंग्रेजी और बांग्ला भाषा में पुस्तकें लिखकर नि: शुल्क बंटवाईं। साल 1829 को लॉर्ड विलियम बेंटिक की अगुवाई और राजा राम मोहन राय जैसे भारतीय समाज सुधारकों के अथक प्रयासों के द्वारा सती प्रथा को भारत में पूरी तरह से अमान्य घोषित किया गया।

10. आधुनिक भारत के जनक और पुनर्जागरण तथा धर्म सुधारक राजा राम मोहन राय की मृत्यु

राजा राम मोहन राय भारत में पुनर्जागरण तथा धर्म सुधार दोनों को एक साथ लाने में सफल हुए। 15 नवम्बर 1830 को समुद्री रास्ते से इंग्लैण्ड के लिये रवाना हुए। अप्रैल 1832 को इंग्लैण्ड पहुँचे जहाँ अंग्रेजों ने आपका स्वागत स्नेह और सम्मान के साथ किया। 1833 में इंग्लैंड के ब्रिस्टल शहर में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। वहां उनकी समाधि है और वहीं के कॉलेज ग्रीन में उनकी एक भव्य मूर्ति भी लगी हुई है। 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल में मैनिंजाइटिस से रॉय की मृत्यु हो गई। उन्हें अरनोस वेले कब्रिस्तान में दफनाया गया, जहां आज भी एक मकबरा खड़ा है। 

राजाराममोहन राय आधुनिक भारत के जनक ही नहीं थे वरन् वह नये युग के निर्माता, आधुनिक सचेत मानव, और नये भारत के ऐसे महान् व्यक्तित्व थे जिन्होंने पूर्व एवं पश्चिम की विचारधारा का समन्वय कर सौ वर्षों से सोये हुए भारत को जागृत किया । राजा राम मोहन राय ने तत्कालीन भारतीय समाज की कट्टरता, रूढ़िवादिता एवं अंध विश्वासों को दूर करके उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया। समाज सुधारक के रूप में राजा साहब विशेष रूप से याद किए जाते हैं। सती प्रथा, बाल विवाह, जाति प्रथा, अस्पृश्यता जैसे दुःसह्य संक्रामक रोगों से ग्रसित और विकृत भारतीय समाज में नवचेतना का संचार कर उसे सुधारने के जो प्रयास उन्होंने किए वह सिर्फ सराहनीय ही नहीं स्तुत्य भी हैं। उनके ही अथक प्रयास के परिणामस्वरूप सती प्रथा जैसी अमानुषिक दानवी का संहार संभव हो सका। मनु स्मृति का संदर्भ पेश करते हुए उन्होंने भारतीय विधवाओं को दहकती चिता से उठाकर सादगी का जीवन व्यतीत करने को प्रेरित किया।

उत्कृष्टता वो कला है जो प्रशिक्षण और आदत से आती है। हम इसलिए सही कार्य नहीं करते कि हमारे अन्दर अच्छाई या उत्कृष्टता है ,बल्कि वो हमारे अन्दर इसलिए हैं क्योंकि हमने सही कार्य किया है,हम वो हैं जो हम बार बार करते हैं।इसलिए उत्कृष्टता कोई कार्य नहीं बल्कि एक आदत है। - राजा राम मोहन राय


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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