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आपके बच्चे की आदतें उसका भविष्य बनाती है, उन पर ध्यान दे

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‘‘शिक्षा कार्य सम्बन्धी अर्जित आदतों का संगठन है, जो व्यक्ति को उसकी भौतिक और सामाजिक वातावरण में उचित स्थान देती है।‘‘ -जेम्स

 

मनुष्य के जीवन में आदतों का महत्वपूर्ण स्थान है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ‘आदते‘ मनुष्य के भविष्य को बनाने या बिगाड़ने में निर्णायक-भूमिका निभाती है। मनुष्य का अच्छा या बुरा होना उसकी आदतों पर भी निर्भर है। अच्छी आदतें मनुष्य में उन गुणों का निर्माण करती है जिन्हे सामाजिक एवं नैतिक दृष्टिकोण से उपयोगी समझा जाता है। मनुष्य अपनी आदतों से पहचाना जाता है क्योंकि उसका व्यक्तित्व उसकी आदतों में ही निहित होता है। उसके व्यक्तित्व की सभी अच्छी बुरी विशेषताएं आदतों द्वारा ही निर्मित होती है। प्रारम्भ में जब हम कोई कार्य करते है तो उसके लिए प्रयास करना पड़ता है, बिना इच्छा के करना पड़ता है, परन्तु बार-बार दोहराने से वह सहज क्रिया की तरह ‘स्वचलित‘ बन जाता है और इस प्रकार वह ‘आदत‘ में परिवर्तित हो जाता है। 

गैरेट के शब्दों ‘‘जो व्यवहार बार-बार दोहराये जाने से स्वचलित बन जाता है, उसे आदत कहते हैं।‘‘

रायबर्न के अनुसार, ‘‘आदत किसी क्रिया की लगभग एक ही प्रकार से कई बार दोहराए जाने का परिणाम है। यह काम बिना किसी सचेत विचार के आसानी से एवं अधिकतम इच्छित गति से सम्पन्न होता है।‘‘

यह एक ऐसी विशेषता है जो अर्जित की जाती है वे जन्मजात तथा वंशानुगत नहीं होती। आदतों से हमारें काम में यथार्थता, सटीकता आती है। 

शिक्षा के क्षेत्र में भी आदतों का बहुत महत्व है। अच्छी ‘आदतें‘ आसानी एवं सुविधा के साथ ज्ञान प्राप्त करने में, शिक्षित करने में सहायक होती है। छात्र जीवन मनुष्य के निर्माण और विकास की आधारशिला है। इस अवस्था में वह जैसी आदतें अर्जित कर लेगा वह उसके व्यक्तित्व को संवारने में मदद करेगी। बालक की रूचियाँ, अभिवृत्तियाँ, उसके विश्वास‚ विचार सभी उसकी आदतों द्वारा प्रभावित एवं नियन्त्रित होते है। बालक जो कुछ बनेगा वह उसकी क्रियाओं‚ विचारों तथा भावनाओं की आदतों पर आधारित है। जो बालक स्कूल में पढाई पर अपना ध्यान केन्द्रित करने की आदत ड़ाल लेता है तो उसे घर पर अधिक समय नहीं लगता वह आसानी से उसे ग्रहण कर सकता है।

हमें बालकों में ऐसी आदतें विकसित करनी चाहिए जिससे बचपन से ही उनमें तर्क करने की, चिन्तन करने, निर्णय लेने तथा नियमित रूप से काम करने की आदतें विकसित हो जिसके कारण वह सुविधापूर्वक वातावरण के अनुरूप अपने आपको ढ़ाल सकते है और थोड़े समय में ही आवश्यक शिक्षा एवं ज्ञान प्राप्त कर सकें। जैसे - हम उनमें यह आदत डाले कि वह प्रतिदिन अपनी दिनचर्या की कोई विशेष बात लिखे, दूसरों के साथ या छात्र आपस में वार्तालाप करें। पत्र-पत्रिकाएं पढ़े। उस पर विचार करे तथा उस पर आपस में बातचीत करे। अपने आस-पास के वातावरण में होने वाली घटनाओं को समझने का प्रयास करे, उस पर अपनी प्रतिक्रिया दें। जरूरी नहीं कि केवल विद्यालय के पाठ्यक्रम को नियमित और निश्चित समय से पढ़ना ही अच्छी आदत है क्योंकि केवल पाठ्यक्रम को रटना या आत्मसात करना ही जीवन का आधार नहीं है।

पहली आदत: आज के बदलते परिवेश और प्रतियोगिता के इस युग में हमें अपने बच्चों में जो महत्वपूर्ण आदतों का निर्माण और विकास करना चाहिए उसमे से पहली है - असफलता को स्वीकार करना सिखाएं। हार से कभी निराश न हो, असफलता से कभी घबराएं नहीं, बल्कि लगातार कोशिश करते रहे जब तक कि सफलता प्राप्त न हो जाए। बच्चें में हार को स्वीकार करने की आदत होनी चाहिए इसलिए नहीं कि वह जीत नहीं सकता बल्कि इसलिए कि वह तनाव ग्रस्त न हो, उसमें कुण्ठा उत्पन्न न हो अन्यथा बड़ा होकर समाज के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पायेगा और तनाव से पीड़ित हो जायेगा। व्यक्ति जब तनावग्रस्त हो जाता है तो किस प्रकार के विचार उसमें उत्पन्न होते है उससे हम सब परिचित है। उनमें आदत विकसित करनी है कि तब तक प्रयास करें, मेहनत करें जब तक कि वह सफल नहीं हो जाता, उसको प्रोत्साहित करें, उसके प्रयासों को दिशा दें। ऐसा करके हम उसे भविष्य के लिए तैयार करे। 

‘‘यदि हार की कोई संभावना ना हो।

तो जीत का कोई अर्थ ही नहीं ।‘‘

दूसरी आदत जो छात्र जीवन से ही उन्हें सिखानी चाहिए वह कि गलती करने से नहीं ड़रे और ना ही गलतियों को छुपायें। हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि बच्चा कुछ गलती करें तो बिना डरे उसे अभिव्यक्त कर सके।एक गलती को छिपाने के लिए वह दूसरी गलती करेगा, झूठ बोलेगा। इसलिए बच्चे को गलती करने दे, क्योकि अभी उसके सिखने की उम्र है उसे गलती करने का पूरा अधिकार है। गलती करते है तभी तो सिखते है। जरूरत है उसे गलती का अहसास कराने की, उसको सुधारने की और गलती तो हम बड़े भी करते है। 

‘‘गलती इंसान के जीवन का एक हिस्सा है,

इसके बिना अधूरा हर एक किस्सा है।‘‘

कई बार बच्चों पर अभिभावकों और विद्यालयों का दबाव होता है कि वह गलती तथा हार के ड़र से आगे नही आ पाते। और कभी कभी उसकी यह आदत बड़े होने के बाद भी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करती है

तीसरी आदत जो बचपन से ही बच्चों को सिखायी जानी चाहिए वह है अपनी भावनाओं को व्यक्त करना, जो भी मन में है उसे दबा कर नहीं रखे बल्कि खुल कर अभिव्यक्त करें। भावनाओं को दबाना नहीं सिखाएं। अपनी भावनाओं और संवेगों को सही समय पर प्रकट करना बहुत आवश्यक है। तथा उन भावनाओं को रचनात्मक दिशा की और मोड़ना अभिभावक की जिम्मेदारी है। साथ ही भावनाओं को नियंत्रित करने की आदत भी बच्चे में होनी चाहिए। यह उत्तरदायित्व विद्यालय तथा अभिभावक दोनों का है। छात्र जीवन के लिए हम सिर्फ यही सोच लेते है कि समय पर उठना, विद्यालय जाना, ग्रह कार्य समय पर करना, पाठ्यवस्तु समय पर याद कर लेना, यही अच्छी आदतें है। लेकिन केवल इतना ही बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं है, समाज में सफल होने और समाज से सामंजस्य बनाने के लिए।

अधिकतर हम देखते है कि बच्चे पढ़ाई में असफल होने, कम अंक आन,से अच्छा रोजगार न मिलने तथा अन्य कई कारणों से तनाव में आ जाते है। यहां तक कि आत्महत्या तक का रास्ता भी चुन लेते है। वह इसलिए क्योकि उनमें हार को स्वीकार करने की आदत नहीं होती। अपने आप को अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं इसलिए छात्र जीवन से ही उनमें यह आदतें विकसित करनी चाहिए कि वह विफलता को चुनौती की तरह ले। अधिक प्रयास करें, अपने प्रयासों की दिशा बदलें। कभी हार न मानने की आदत ही एक दिन जीत की आदत बन जाती है।

एक बार गलत आदतें विकसित होने के पश्चात् उन्हें दूर करना कठिन होता है। गलत आदतें विकास के मार्ग में बाधा डालती है और आगे चलकर स्वयं के लिए, समाज के लिए खतरनाक हो सकती है। अतः जीवन निर्माण की इस अवस्था से ही छात्रों में अच्छी आदतों का निर्माण करने के अवसर उपलब्ध करवाएं। उन्हें अभ्यास एवं पुनरावृत्ति के पर्याप्त अवसर प्रदान करें। ऐसे व्यक्तियों के उदाहरण दे जिन्होंने विफलताओं के बावजूद समाज में सफलता का स्थान प्राप्त किया है वास्तव में यही शिक्षा का एक उद्देश्य भी है। इसलिए छात्र जीवन से ही हमें बच्चों मे यह आदतें विकसित करनी चाहिए जिससे भविष्य में वह अपने और समाज दोनों के लिए सफल जिम्मेदार, नागरिक बन सकें।

आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते, पर आपनी आदतें तो बदल सकते हैं! और बदली हुई आदतें आपका भविष्य बदल देंगी! – ए पी जे अब्दुल कलाम


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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