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हालात से मजबूर :वीरता पुरस्कार से सम्मनित ओमप्रकाश

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ज़िंदा वही है जिसके हौशलों के तरकस में कोशिशों का तीर बचा है चेहरे तो समय के साथ सब बदल लेते है,लेकिन हालतों को बदलने वाला ही, हालातों की बात करता है। यहां हम बात कर रहे हैं भारतीय बाल कल्याण राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार, वीरता पुरस्कार, संजय चोपड़ा पुरस्कार, से सम्मानित उत्तरप्रदेश आजमगढ में रहने वाले ओम प्रकाश यादव की। ओम प्रकाश आप अपने बहादुर अभिनय के साथ लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं। अपनी परवाह किए बिना किसी की मदद करना बहुत बड़ी बात है। इसका जीता जागता उदाहरण आज भी आजमगढ़ में है जिसने 11 साल की उम्र में अपने जान की परवाह किए बिना 8 बच्चों की जान बचाई थी।ओम प्रकाश यादव वर्तमान में उन बच्चों के लिए ज्वलन्त मशाल हैं, जो बच्चे अभिभावकों के हद से ज्यादा स्नेह और प्यार के कारण अपना अधिकांश समय सोशल मिडिया, विडियो गेम्स में व्यस्त रहकर सामाजिक सम्पर्क से दूर रहना ज्यादा पंसद करते हैं।

यूँ तो कोई शिकायत नहीं मुझे मेरे आज से, मगर कभी कभी बीता हुआ कल बहुत याद आता है..!!

ओम प्रकाश यादव का जन्म आजमगढ़ के एक छोटे से गांव में हुआ हैं। परिवार की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं थी। ओम जिनके पिता लालबहादुर ऑटो रिक्षा चालक हैं, इससे प्राप्त कमाई से अपने परिवार का भरणपोण करते हैं। मां संध्या अपनी तीन पुत्रियों और एक पुत्र के साथ आज़मगढ़ के बिलरियागंज इलाके में अत्यधिक गरिब साधारण स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहीं हैं।

उम्मीद के बिना डर नहीं होता, और डर के बिना उम्मीद नहीं होती ।कुछ इस कदर चलो, कि लोग तुम्हारे निशानों पर चलना शुरू कर दें ।

ओम प्रकाश यादव, जो तब 10 साल के थे ने अपने स्कूल के लिए 24 सितंबर 2010 को आजमगढ़ में शुरुआत की। 4 सितंबर 2010 में जब ओम प्रकाश कक्षा सांतवी में पढ़ते थे।यह उस समय की घटना हैं। यह एक दैनिक दिन की शुरुआत नियमित रूप से थी, जब एक स्कूल वैन खचाखच भरकर बच्चों को स्कूल से घर ले जा रहीं थीं। ओमप्रकाश यादव उसी बस में एक विद्यार्थी के रूप में बैठे हुए थे, स्कूल की छुट्टी के बाद वैन से घर जा रहे थे। उस समय वैन में ड्राइवर समेत 9 बच्चे थे। वैन एलपीजी गैस और पेट्रोल दोनों से चल रही थी। लेकिन अचानक गैस किट में शॉर्ट सर्किट की वजह से वैन में आग लग गई। वैन जैसे ही ओम प्रकाश के घर के पास पहुंची उसमें एकाएक लीकेज होने लगा और धुंआ निकलने लगा। देखते ही देखते उसमें आग लग गई। गाड़ी में आग लगते ही ड्राइवर ने तुरंत अपना दरवाजा खोला और फरार हो गया। लेकिन ओमप्रकाश नहीं भागें । बस में आग की लपटे धधक रहीं थी, बच्चो की चित्कारें सुनाई दे रहीं थीं। अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिनाए ओमप्रकाश ने वैन का दरवाजा तोड़ दिया इसके बाद ओम ने तुरंत गाड़ी से बाहर आकर सभी बच्चों को और अन्य लोगों को उसमें से बाहर निकाला,और उन्होंने आठ बच्चों को बचा लिया।

फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग आप पर यकीन करते हैं, या नहीं करते हैं, आपको खुद मैं यकीन होना चाहिए..!!

समस्या का गुलाम बनने वाले कभी खुद के भाग्य का निर्माता नहीं बन पाते। हर दिन एक ऐसी चीज करें जो आपको डराती है…!!

जब तक ओमप्रकाश यादव कुछ समझ पाता तब तक आग की लपटें उसके चेहरे, कान, पीठ और बाहों तक फैल गई थीं, जिससे उसे चोट लग गई थी।वह बुरी तरह से आग में झुलस चुका था।ओमप्रकाश का चेहरा बच्चों को जलती वैन से बाहर निकालने में जल गया था। जिसके बाद स्थानीय लोगों ने उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया, जहां से डॉक्टरों ने उसे बीएचयू रेफर कर दिया था।वह 18 दिनों तक वहां भर्ती रहे और डिस्चार्ज होने से पहले उन्होंने आजमगढ़ के एक अस्पताल में 42 दिन गुजारे। इस हादसे में जलने के कारण ओमप्रकाश के दोनो हाथ पीछे कमर से चिपक गये थे,चेहरा बहुत बुरी तरह से झुलस चुका था जो पहचान में भी नहीं आ पा रहा था। पहली सफल सर्जरी 2014 में वाराणसी में की गई थी जहाँ डॉक्टरों ने ओमप्रकाश के दाहिने हाथ को अलग कर दिया था, उस सर्जरी में लगभग 2 लाख रुपये का खर्च आया था। दो महीने की सर्जरी के बाद में ओमप्रकाश को ड्रेसिंग के लिए आजमगढ़ से वाराणसी ले गया। डॉक्टरों ने उनके चेहरे और पीठ पर प्लास्टिक सर्जरी की सलाह दी।

मिली थी जिन्दगी, किसी के काम आने के लिए पर वक्त बित रहा है, कागज के टुकड़े कमाने के लिए…!!

“ हालांकि ओम के पिता लाल बहादुर यादव ने कहा कि वह सर्जरी के लिए धन की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं मैंने पहले ही अपने बेटे के इलाज के लिए आजमगढ़ में निजी व्यक्तियों से 2 लाख रुपये का ऋण लिया है। हम गरीब हैं और हमारे लिए सर्जरी के लिए कोई और कर्ज लेना संभव नहीं होगा। ओमप्रकाश को तब राष्ट्रपति से 1 लाख रुपये और प्रधानमंत्री द्वारा 40000 रुपये मिले थे।यह पैसा ज्यादातर उनकी दवा पर खर्च किया गया था।ओमप्रकाश के पिता ऑटो चलाते थे इसलिए उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि इसका इलाज करा सके तब उन्होंने ढाई लाख का लोन भी लिया था।

 प्रसन्नता वो पुरस्कार है जो हमे हमारी समझ के अनुरूप सबसे सही जीवन जीने पर मिलती हैं।

परन्तु ओमप्रकाश को प्राप्त पुरस्कार उनकी जीवन की प्रसन्नता का निर्धारण नहीं कर सकें।

सरकार ने अवार्ड दिया लेकिन नहीं मिली कोई मदद ।

ओम को शासन और प्रशासन की तरफ से कोई आर्थिक मदद नहीं मिली थी, बस अवार्ड दे दिया गया था। लेकिन आज वह इस हालात में है जिसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा। मदद के लिए इस लड़के ने कई पहल किए लेकिन सरकार भी इसकी मदद के लिए आगे नहीं आई। इस जाबांज ओमप्रकाश के पास आज कॉलेज की फीस भरने के पैसे तक नहीं है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लगाए तमाम ऐसे लोगों के हाथों सम्मानित सर्टिफिकेट और गोल्ड मैडल है जो आज उनके भविष्य की बेहतर बुनियाद के लिए किसी भी काम के नहीं हैं।


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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