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चलना और बस चलते रहना हर अदबें मंजिल की और लगातार...!!

चलना और बस चलते रहना हर अदबें मंजिल की और लगातार...!!

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"हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं"।

- जिगर मुरादाबादी

ये और ज़रूर बात है कि आंधी हमारे बस में नहीं,मगर चिराग जलाना तो हमारे इख्तियार में ही है। इसलिए तो जिंदगी की भी तो यहीं तो रीती है, हार के बाद ही तो जीत भी तय होती है। कहां भी है न,जो थक कर बैठ गये हैं उसे मंजिल भी मुनासिब नहीं होती हैं...!!

"चलो चलिएं कि चलना ही दलील ए कामरानी है,

जो थक कर बैठ जाते हैं वह मंजिल भी पा नहीं सकते। "

 - हफीज़ बनारसी

इसलिए तो चलना और बस चलते रहना हर अदबें मंजिल की और लगातार...!!

यद्यपि जीवन संघर्षों से भरी दास्तां है, फिर भी गमों को नासूर न बनने दें। चोट ख़ाना और फिर भी खुलकर इस तरह मुस्कराना, मगर इस अदा से की जमाना भी रो दे। इसलिए तो उठो तो इस तरह से उठ जाएं की, फर्क है बुलंदी को भी, और झुक जाएं तो इस तरह से झुक जाएं की बंदगी भी नाज करें। क्योंकी नवाज़ देवबंदी के शब्दों में...

अगर सफर में मुश्किलें और आएं तो, हिम्मत और बढ़ती है, कोई और अगर रास्ता भी रोकें तो जुर्रत और बढ़ती है,अगर बिकने पर आ जाएं तो घटते हैं दाम अक्सर, और ना बिकने का इरादा हों तो, किमत और बढ़ती है। - नवाज़ देवबंदी।

साहिर लुधियानवी ने भी अपने शब्दों में कहां है..

इल्म ओ तहज़ीब तारीख़ ओ मंतिक़ लोग सोचेंगे इन मसअलों पर

ज़िंदगी के मशक़्क़त-कदे में कोई अहद-ए-फ़राग़त तो आए

हम क़यामत के ख़ुद मुंतज़िर हैं पर किसी दिन क़यामत तो आए

हम भी सुक़रात हैं अहद-ए-नौ के तिश्ना-लब ही न मर जाएं यारो

ज़हर हो या मय-ए-आतिशीं हो कोई जाम-ए-शहादत तो आए

एक तहज़ीब है दोस्ती की एक मेयार है दुश्मनी का

दोस्तों ने मुरव्वत न सीखी दुश्मनों को अदावत तो आए

रिंद रस्ते में आंखें बिछाएं जो कहे बिन सुने मान जाएं

नासेह-ए-नेक-तीनत किसी शब सू-ए-कू-ए-मलामत तो आए

इल्म ओ तहज़ीब तारीख़ ओ मंतिक़ लोग सोचेंगे इन मसअलों पर

ज़िंदगी के मशक़्क़त-कदे में कोई अहद-ए-फ़राग़त तो आए

साहिर लुधियानवी के ही शब्दों में ...

"हजार बर्क गिरें,लाख आंधियां उठें,

वह फूल खिल कर रहेगें जो खिलने वाले थे।"

इसलिए तो जीवन चल रहा है, चलेगा और चलता रहेगा,पर जरा तो तहज़ीब और लियाकत भरी तमीज से ठहराव तो लाओं, कुछ ऐसा कर जाओं की...!!

"बारे दूनिया में रहो गम -जदा या शाद रहो

ऐसा कुछ करके चलों की यां कि आप बहुत याद रहों।"

"हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं"। - जिगर मुरादाबादी


Dr. Tarannum  Jahan Sheikh

I am an expert in journalism and visual arts. An experienced teacher with a Ph.D. in Urdu language. I enjoy writing, storytelling, and public speaking. Urdu gravitates me and inspires me to do more research work in the literature and to write novels.

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