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रूकना नहीं, बस चलते रहना ... नंदन निलेकणी  -

रूकना नहीं, बस चलते रहना ... नंदन निलेकणी -

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, हमें अपने विकास की रणनीति खुद बनानी होगी। एक ऐसी रणनीति, जिसमें डिजिटलाइजेशन, डाटाकनेक्टिविटी, कैशलेस व पेपरलेस इकोनाॅमीऔर नए नए स्टार्टअप्स के साथ साथ इको सिस्टम का एक मज़बूत तानाबाना हो। आमतौर पर यह माना जाता है कि देश का विकास निर्यात विनिर्माण क्षेत्र और बड़े व्यापारों की प्रगति से ही संभव है, पर मुझे लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का उत्थान घरेलू उपभोग, सेवा क्षेत्र में विस्तार और छोटे व्यापारिक संगठनों की तरक्की से ही हो पाएगा  

- नंदन निलेकणी"

‘‘नन्दन निलेकणी एक जाने माने आई.टी.कंपनी के सह संस्थापक होने के साथ ही आधार कार्ड के प्रणेता भी हैं। वे केवल कुशल टेक्नोक्रेट ही नहीं, बल्कि एक सक्षम प्रबंधक भी हैं। दृष्टि संपन्न लेखक के रूप में भी लोग उन्हें पहचानते हैं। वर्षो बाद नंदन सीधे तौर पर आई.टी. इंडस्ट्री में फिर से सक्रिय हुए हैं। साथ ही, आजकल नंदन के दिमाग की उपज आधार कार्ड भी निजता के सवाल पर चर्चा में हैं। नंदन भारत के सुंदर व सक्षम भविष्य के बारे में बिल्कुल स्पष्ट राय रखते हैं और हर संभव अवसर पर वह अपने विचारों को लोगों के साथ खुलकर साझा करते हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग उस मुहिम का हिस्सा बन सकें, जो देश को स्वर्णिम भविष्य के पथ पर ले जाने के लिए ज़रूरी हैं।

मुश्किलों में भी चलते रहने की क़वायद -

नंदन के पिता मोहन राव निलेकणी मैसूर एंड मिनर्वा मिल्स बैंगलोर में काम करते थे। छोटा, सुखी और हंसता खेलता परिवार था। पर वस्त्र उद्योग में आई मंदी के कारण नंदन के पिता को नौकरियाँ बदलनी पडीं, एक शहर से दूसरे शहर भटकना पड़ा। मोहन राव ने हिम्मत नहीं हारी। वे संकटों के इस दौर में भी बिना रूके चलते रहे। नंदन की शिक्षा प्रभावित न हों, इसलिए उन्हें धारवाड़ में रिश्तेदारों के घर भेज दिया गया। मुश्किलों के उस दौर में नंदन को भी यह बात समझ में आ गई की उन्हें रूकना नहीं हैं, बस चलते रहना हैं

नंदन ने पूरी मेहनत, हिम्मत के साथ अपनी पढ़ाई लिखाई जारी रखी। शिक्षा खत्म करने के बाद नंदन आई.आई.टी. से इंजीनियरिंग पढ़ना चाहते थे। परन्तु आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण नंदन निलेकणी के पास प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए न तो ज़रूरी संसाधन थे, न ही कोई दिशा निर्देश देने वाला योग्य व्यक्ति था। वे रूके नहीं। हिम्मत नही हारी। इन्हीं के परिवार के दूर के रिश्तेदार थे जो बाहर रहकर आई.आई.टी. में प्रवेश की तैयारी कर रहे थे, उनसे किताबों की मदद लेकर नंदन निलेकणी स्वयं आई.आई.टी. बाॅम्बे में प्रवेश पाने में सफल रहे।

वैसे तो नंदन की कहानी एक आम मध्यवर्गीय भारतीय की कहानी है, पर एक खास बात नंदन को औरों से अलग करती है कि नंदन ने दूविधाओं के दोहराने पर भी हमेशा चलते रहना ही चुना और उसी रास्ते के हमराही बने रहे, जो समय के उस मोड़ पर उन्हें अपने लिए सही लगा। पूरी हिम्मत के साथ खुद पर बुलंद भरोसे के साथ उन्होंने राह में मिलने वाली सभी मुश्किलों का डटकर सामना किया, उनसे लोहा लिया और आगे बढ़कर सफलता का वह मुकाम हासिल किया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए ऊर्जां और प्रेरणा का एक अबाध स्रोत हैं।

ज़रूरी है नवोन्मोषों की आहटों को सुनना

पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश नंदन को बाॅम्बे (अब मुंबई) में ही एक कंपनी पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स में ले गई, जहांँ उनका इंटरव्यू एन.आर. नारायण मूर्ति ने लिया। यह उनकी पहली नौकरी थी। 1978 में शुरू हुआ नंदन का केरिअर उस वक्त फिर से दोराहे पर आ पहुंचा, जब नारायण मूर्ति ने नंदन सहित छह सहकर्मियों के सामने अपनी एक नई कंपनी शुरू करने का प्रस्ताव रखा। एक अच्छी खासी नौकरी को छोड़कर एक ऐसी मुहिम से जुड़ना बड़ा मुश्किल काम था, जहाँं दिलों में जज्बात, आंखों में सपने, मन में हौसलों के समंदर और कुछ कर गुजरने के संकल्प के अलावा हाथों में कुछ भी न था।

1981 में मूर्ति और नंदन के साथ पांच साथियों ने मिलकर इंफोसिस की नींव रखीं। कड़े संघर्ष और दिन रात की मेहनत के बाद इंफोसिस ने जो रूतबा कमाया, वह इतिहास में दर्ज़ हैं। साल दर साल, नंदन कंपनी के विभिन्न पदों पर काम करते रहे ,कभी प्रबंध निदेशक, तो कभी अध्यक्ष ओर कभी मुख्य परिचालन अधिकारी। मार्च 2002 में उन्हें कंपनी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया। और अपने 5 साल के कार्यकाल में उन्होंने कंपनी को छह गुना बढ़त देते हुए कंपनी के व्यापार को करीब 3 अरब यू.एस. डाॅलर पार पहुंचा

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प्रकाशित स्रोत - राजस्थान पत्रिका

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रूकना नहीं, बस चलते रहना ... नंदन निलेकणी -


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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