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दोस्ती | एक कविता | FailWise

दोस्ती | एक कविता | FailWise

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जीवन भर चलने वाली एक प्रक्रिया

हर मोड़ पर मिलते हैं

पर गुम हो जाते हैं धीरे–धीरे जैसे

उजाला दूर जाता अंधेरा होता है वैसे

दुख होता है कुछ क्षण

मन झुंझला उठता है

प्रश्न पूछता है,आखिर क्यूं?

क्या ये सिर्फ मेरे साथ होता है?

क्या मैं अच्छा नहीं?

या मुझमें उनकी बराबरी की क्षमता नहीं?

फिर अगल बगल झांकता हूं

देखता हूं,अनुभव करता हूं

जीवन के कुछ पड़ाव तक

महसूस करता हूं

शायद मन को शांति भी मिली है

जानकर कि

इस दोस्ती के कांच के घेरे में

मैं अकेला नहीं

जो क्षणिक भर में टूट जाता है।।

✍️ प्रदीप सिंह ‘ग्वल्या’ 



Pradeep Singh ' ग्वल्या '

I am pradeep from pauri garhwal uttarakhand,I am double MA and also have a B.Ed degree.

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