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दुविधा | जो प्राप्त है, वही सुख है

दुविधा | जो प्राप्त है, वही सुख है

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हर कोई भाग रहा है। एक होड़ लगी है एक दूसरे से आगे निकलने की। जो पास है उससे और अधिक पाने की लालसा में। इस इस दौड़ में व्यक्ति इतना तल्लीन हो जाता कि पीछे मुड़कर यह देखने तक की फुर्सत नहीं होती कि उसने क्या पाया है और क्या पीछे छूट गया है। कुछ तो ऐसे भी हैं जो इस दौड़ में सिर्फ इसलिए शामिल हैं क्योंकि सब भाग रहे हैं। जीवन में सुख और प्रसन्नता केवल अधिक धन कमाने एवं अधिक संसाधनों को जुटाने मात्र से ही प्राप्त नहीं हो जाती। व्यक्ति अकारण ही जीवन भर दुविधा में जीता रहता है। यह दौड़ उसे ना जाने कहां ले जाएगी।

"जो प्राप्त है, वही सुख है।"

एक अजीब सी दुविधा में जी रहा हूं ।

अपने ही अंतर्द्वंद में फंसा एक प्रश्न हूं।

अब तक ना जान पाया कि मैं कौन हूं।

वैसे कहने को तो मैं वर्षों से जी रहा हूं।

पर कहीं- कहीं शायद मरा हुआ सा हूं।

सांस चल रही है बस इस लिए जिंदा हूं।

मेले में तो नहीं और अकेला भी नहीं हूं।

कोई रंग नहीं जीवन में,बेरंग भी नहीं हूं।

गम तो पास नहीं और खुश भी नहीं हूं ।

अपना भी नहीं कोई, पराया भी नहीं हूं।

वफा तो नहीं निभाई पर बेवफा नहीं हूं।

फुर्सत बिल्कुल नहीं है व्यस्त भी नहीं हूं।

काबिल ना बन सका नाकाबिल नहीं हूं।

जीता नहीं कभी खेल में,हारा भी नहीं हूं।

मोम तो नहीं रहा अब, पत्थर भी नहीं हूं।

दोस्त नहीं रहा कोई,दुश्मन भी तो नहीं हूं।

उलझा तो नहीं, सुलझा हुआ भी नहीं हूं।

खबर नहीं कहीं बीच में ही अटका सा हूं।

दुनिया की भीड़ में बस चलता जा रहा हूं।

थमते है जब लोग, तो मैं भी रुक जाता हूं।

बेवजह अनजान राहों में भटके जा रहा हूं।

अपने अस्तित्व को मैं खोजना चाहता हूं।

मंजिल की तलाश में पथ भूला पथिक हूं।

कुछ देर कहीं राह मेंं ठहर जाना चाहता हूं।

पीछे मुड़कर अपने अपनो को तलाशता हूं।

बस, अब नहीं ,भागते-भागते थक चुका हूं।

ऐ जिंदगी ठहर, तुझे जीभर जीना चाहता हूं।

फिर भी अनजाने सफर में चलते जा रहा हूं।

बस इसी अजीब सी दुविधा में मैं जी रहा हूं।

कौन हूं और किस की तलाश में भागता हूं।


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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