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शांति के लिए शिक्षा जरूरी : महात्मा गांधी

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 "If we want to reach real peace in this world, we should start educating children"-M. K. Gandhi

30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है। 1948 में इसी दिन गांधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। गांधी जी केवल राजनीतिज्ञ ही नहीं थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक और साथ-साथ एक शिक्षा शास्त्री भी थे। उनका मानना था कि एक आदर्श राज्य के लिए एक आदर्श और शिक्षित समाज आवश्यक है, क्योंकि बिना सामाजिक उन्नति एवं उत्थान के एक आदर्श राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं है और इसके लिए शिक्षा महत्वपूर्ण साधन है। उनका शिक्षा दर्शन उनके जीवन दर्शन पर ही आधारित है। गांधी जी सत्य, अहिंसा, त्याग, निष्ठा आदि गुणों में विश्वास करते थे। उनके अनुसार इन गुणों को शिक्षा के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। वह शिक्षा की उपयोगिता को समझते थे और एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहते थे जिसमें भारतीय जनता के हृदय तथा मन को पवित्र कर के शोषण विहीन समाज की स्थापना की जा सके।

"शिक्षा से मेरा तात्पर्य शिशु और मनुष्य में शरीर, मन और आत्मा जो कुछ सर्वोत्तम है उसकी सर्वांगीण अभिव्यक्ति है। साक्षरता शिक्षा का लक्ष्य नहीं है और ना ही उससे शिक्षा प्रारंभ ही होती है। वह तो उन अनेक साधनों में से एक है जिससे स्त्री-पुरुष शिक्षित किए जाते हैं। साक्षरता स्वयं शिक्षा नहीं है।"-महात्मा गांधी

सर्वप्रथम गांधी जी ने ही तात्कालीन भारतीय जीवन और वातावरण को पहचान कर उसके अनुरूप शिक्षा योजना प्रस्तुत की थी। उनकी शिक्षा योजना जो की बेसिक शिक्षा के रूप में जानी जाती है अत्यंत ही बहुमूल्य स्थान रखती है। देश में व्याप्त निर्धनता तथा बेरोजगारी को दूर करने के लिए उन्होंने शिक्षा को हस्तकला और उद्योग पर केंद्रित करने का सुझाव दिया था। इसके द्वारा वह बालकों को मजदूर बनाना नहीं चाहते थे, बल्कि स्वावलंबी बनाना चाहते थे। जिससेे कि प्रत्येक बालक कमाते हुए कुछ सीखें और सीखते हुए कुछ कमाए।इसलिए वह शिक्षा को स्वावलंबी बनाना चाहते थे। बालक के जीवन से संबंधित करना चाहते थे। उनके शिक्षा के उद्देश्य प्रचलित शिक्षा के उद्देश्यों से अलग थे।

उस समय की शिक्षा विषय प्रधान थी, वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ थी। इसलिए गांधीजी ने स्थानीय उद्योगों को शिक्षा का केंद्र बिंदु माना। वह चाहते थे कि बालक को किसी स्थानीय उद्योग के माध्यम से शिक्षा दी जाए जिससे उसके शरीर मन तथा आत्मा का विकास हो सके और वह भविष्य में अपनी आर्थिक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा कर सके, आत्मनिर्भर बन सकें। दूसरे गांधी जी मातृ भाषा में शिक्षा देने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने से बालकों के स्वाभाविक विकास में बाधा पड़ती है और उनकी मौलिकता नष्ट होती है। उनके शब्दों में, "बालकों पर अंग्रेजी को लादना उनके प्राकृतिक विकास को कुंठित करना है और संभवतया उनमें मौलिकता को नष्ट कर देना है।" इसलिए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए।

वह ऐसी शिक्षा में विश्वास करते थे जो कि बालक के मन, मस्तिष्क तथा आत्मा का विकास कर सकें और उसके मानसिक, भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में सामंजस्य स्थापित करके उसे एक संतुलित व्यक्ति तथा पूर्ण मानव बना सकें। गांधीजी शिक्षा को बालक प्रधान एवं क्रिया प्रधान बनाने में विश्वास करते हैं उनके अनुसार बालक की रूचि, आवश्यकताओं के अनुरूप उसे शिक्षा दी जानी चाहिए। हस्तकला को चुनते समय बालक के सामाजिक तथा प्राकृतिक परिवेश को ध्यान में रखा जाना चाहिए। बालक में क्रियाशीलता तथा करके सीखना सिद्धांत को विकसित करने के लिए ही उन्होंने पाठ्यक्रम में हस्तकला के विषय को जोड़ा। यही उनकी बुनियादी शिक्षा है।

ऐसा नहीं है कि गांधीजी अन्य शिक्षण विषयों के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने हस्तशिल्प के साथ-साथ सामाजिक अध्ययन, सामाजिक विज्ञान, रासायन विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, शारीरिक शिक्षा, संगीत, चित्रकला, गणित, मातृभाषा, कला आदि को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया है। उनका मानना था कि बालक को समस्त विषयों की शिक्षा किसी हस्तशिल्प या कार्य के माध्यम से दी जाएं तथा सभी विषयों में समन्वय स्थापित होना चाहिए। हस्तकला को अन्य विषयों के साथ संबंधित करके सिखाया जाना चाहिए। गांधीजी बालकों को पुस्तकीय और अव्यावहारिक शिक्षा के स्थान पर मूलभूत उद्योग पर आधारित व्यावहारिक और सर्वांगीण विकास की शिक्षा देना चाहते थे।

पुस्तकीय शिक्षा केवल मस्तिष्क की शिक्षा देती है। हस्तकौशल द्वारा शिक्षा में बालक शारीरिक परिश्रम करता है। शारीरिक प्रशिक्षण बुद्धि को बढ़ाने का भी एक साधन है तथा सामूहिक रुप से हस्तकौशल करने से उनमें सामाजिक गुणों, नैतिकता आदि का भी विकास होता है। बालक स्वाबलंबी होगा तभी समाज भी स्वाबलंबी एवं आत्मनिर्भर हो सकेगा। स्वाबलंबन से गांधीजी का तात्पर्य केवल आर्थिक स्वावलंबन ही नहीं बल्कि नैतिक, सामाजिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक स्वावलंबन भी है जिससे कि वह कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय लें सकें और चुनौतियों का सामना कर सकें।

गांधीजी का मानना था कि बिना आत्मनिर्भरता के व्यक्तित्व का कोई भी पक्ष विकसित नहीं हो सकता तथा इसके अलावा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं भौतिक क्षेत्र में भी विकास असंभव है। गांधी जी के शब्दों में, "शिक्षा को बालकों को बेरोजगारी के विरुद्ध एक प्रकार की सुरक्षा देनी चाहिए।"

अंत: गांधी जी ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जिससे बालक के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ बालक को अपने भावी जीवन में निश्चित रूप से आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाया जा सके और वह जीवन के अंतिम लक्ष्य 'सत्य' को प्राप्त कर सकें, क्योंकि उनके अनुसार शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य सत्य अथवा ईश्वर की प्राप्ति है। अन्य सारे उद्देश्य इस उद्देश्य के अधीन है। गांधी जी का शिक्षा दर्शन आज भी उतना ही उपयुक्त एवं उपयोगी है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके विचार अदि्वतीय है। वर्तमान में उनके शैक्षिक विचारों की प्रासंगिकता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि नई शिक्षा नीति 2020 बदलती वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप गांधी जी के शैक्षिक विचारों से प्रेरित और प्रभावित है।

"जिस शिक्षा से आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक मुक्ति मिलती है, वही वास्तविक शिक्षा है।"- महात्मा गांधी


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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