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शिक्षा बाल्टी का भरना नहीं है, बल्कि अग्नि का प्रकाश है

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शिक्षा दिवस की आप सबको बहुत बहुत शुभकामनाएं। 11 नवंबर भारत के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद जी के जन्म दिन के अवसर पर शिक्षा के लिए किये गये उनके योगदान के लिए देश में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है। शिक्षा मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। यह जन्म से मृत्यु तक निरंतर चलती रहती है। शिक्षा का अर्थ व्यापक है। अनेक शिक्षाविदों ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएं दी है। शिक्षा को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। शिक्षा अर्थात संपूर्णता। शिक्षा में समस्त शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, संवेगात्मक, बौद्धिक, चारित्रिक, एवं भौतिक विकास आदि समाहित है। शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है। शिक्षा से अभिप्राय केवल विद्यालयी शिक्षा से नहीं है। विद्यालय की शिक्षा तो शिक्षा का अंग मात्र है। यह वह शिक्षा है जो शिक्षार्थियों को विद्यालयों में दी जाती है।

शिक्षा द्वारा जो ज्ञान शिक्षार्थियों को दिया जाता है वह ज्ञान आज केवल सूचनाएँ एकत्र करने से रह गया। ज्ञान का अर्थ अगर सूचना या जानकारी के रूप में लिया जाए तो ज्ञान का दायरा छोटा हो जाता है। ज्ञान अर्थात् सूचनाओं का संकलन अपने आप में निर्जीव वस्तु सादृश्य है। बड़े-बड़े ग्रंथालय इसका प्रमाण है। यदि ग्रंथालय में ग्रंथ मात्र से वह ज्ञानी हो जाये, तो ग्रंथालय से बड़ा विद्वान कौन होगा, फिर उसके सम्भालकर्ता-पुस्तकालयाध्यक्ष, सेवक आदि निरन्तर ग्रंथालयों में रहते है, ग्रंथों का स्पर्श कर उनके सम्पर्क में रहते है, वे सब विद्वानों की श्रेणी में माने जाने चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है, हाँ पुस्तकालय के वे कार्यकर्ता जिन्हें अध्ययन के प्रति रूचि हो वह ज्ञानवान हो सकते है। ज्ञान से ज्यादा आवश्यक है ज्ञान के रचनात्मक उपयोग की। परन्तु आज ज्ञान केवल सूचनाएँ रह गई है। जिसके मस्तिष्क में जितनी अधिक सामग्री भर दी गई, वह उतना ही बडा विद्वान माना जाने लगा। आखिर इन सूचनाओं की बालक के जीवन में कितनी उपयोगिता है? जिसके पास जितनी डिग्रियां है वह उतना ही ज्ञानी है।

शिक्षा स्वतंत्रता के स्वर्ण द्वार खोलने के कुंजी है. - जार्ज वाशिंगटन करवर

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था ‘‘आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते है जिसने कुछ परीक्षायें पास कर ली हो तथा जो अच्छें भाषण दे सकता हो। पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जन-साधारण को जीवन-संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं कर सकती, जो समाज सेवा की भावना को विकसित नहीं कर सकती तथा जो शेर जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ है?" विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा का अर्थ केवल उन सूचनाओं से नहीं है जो बालकों के मस्तिष्क में बलपूर्वक ठूंसी जाती है। उन्होंने लिखा है - "यदि शिक्षा का अर्थ सूचनाओं से हेाता, तो पुस्तकालय संसार के, सर्वश्रेष्ठ संत होते तथा विश्वकोष ऋषि बन जाते।"

उच्चतम स्तर तक की शिक्षा पाने वाला व्यक्ति वास्तव में ज्ञानी भी हो यह आवश्यक नही है, वह साक्षर हो सकता है। कई बार देखा गया है कि एक ग्रेजुएट धारक अपने प्राईमरी कक्षा के बालक के गृहकार्य में मदद करने में असमर्थ होता है। केवल अक्षर, अंकों और भाषा का ज्ञान ही वास्तविक अर्थो में ज्ञान नहीं है। एक बालक को राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय स्तर तक की घटनाओं का ज्ञान होता हैं रूस, अमेरिका के प्रधानमंत्री का नाम उसे रटा है, देशों की राजधानी के नाम उसे पता है परंतु कई बार उसे यह नहीं पता होता है कि उसके गली मोहल्ले में रहने वालों के नाम क्या है, उसके परदादा परदादी के क्या नाम थे। अर्थात् शिक्षा द्वारा ऐसा ज्ञान प्रदान किया जा रहा है जिससे वह आगे चलकर प्रतियोगिता परीक्षाऐं पास करके अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकें। व्यवहार में बालक को शिक्षा के द्वारा हम कमाई का साधन ही मान रहे हैं। बालक को शिक्षा के द्वारा ऐसा ज्ञान परोसना है जो उसे अच्छी जगह बिठा सके, अच्छा पैंकेज मिले, उसकी तरक्की बढ़ती रहें।

शिक्षा का मकसद है एक खाली दिमाग को खुले दिमाग में परिवर्तित करना. - मैल्कम फ़ोर्ब्स

इस ज्ञान के बल पर उसका पूरा भविष्य निश्चित हो जाए। लेकिन यदि वह इस ज्ञान के द्वारा यह प्राप्त नहीं कर पाता है, तो वह तनाव में आ जाता है। बहुत सी ऐसी घटनाएं समाचार पत्रों में पढ़ने और आस-पड़ौस में सुनने को मिलती है कि कम अंक आने पर छात्र ने आत्म हत्या कर ली। बडे-बडे कोचिंग सेंटरों में छात्र आत्महत्या कर लेते है। मनचाहा पैंकेज ना मिलने पर वह तनाव ग्रस्त हो जाता है। क्या शिक्षा का उद्देश्य इतना ही है कि रोजगार के लिए विद्यार्थियों में ज्ञान ठूँसना यह ज्ञान यह नहीं सिखाता है कि विपरित परिस्थितियों में किस प्रकार खड़े रहना है, समाधान निकालना है। वास्तव में ज्ञान वह है कि जो भी शिक्षा द्वारा ज्ञान (सूचनाएं) हमें प्रदान किया जाता है उसका जीवन में उपयोग कैसे किया जाए, कैसे हम विपरित परिस्थितियों में उस ज्ञान का प्रयोग करके अपने जीवन में सफल बन सकें, खुश रह सके।ज्ञान को किसी सीमा में नही बांधा जा सकता, कोई निश्चित दायरा नहीं है ज्ञान का। ज्ञान हमें short cut नहीं सिखाता, जीवन से पलायन करना नहीं सिखाता। वस्तुतः केवल ज्ञान का संकलन करना शिक्षा नहीं हैं, इस ज्ञान का अपने जीवन में उपयोग कर जीवन को बेहतर तरीके से जीना, अपना जीवन संवारना शिक्षा है।

प्राचीन काल से अब तक भारत में ऐसे अनेक व्यक्तियों के उदाहरण है जिन्हें लिखना, पढ़ना नही आता था, किन्तु मानवता के लिए उदाहरण बने। निरक्षर किसान खेत की धरती, जीव जन्तुओं के व्यवहारों में अन्तर, हवा का रूख और नमी तथा गर्मी-ठंडक आदि जलवायु को देख और महसूस कर बीज बोता है और सफलता से फसल उगाता है। प्रेमचंद ने एक स्थान पर लिखा है, "कभी कभी हमें उन लोगों से शिक्षा मिलती है, जिन्हें हम अभिमानवश अज्ञानी समझते हैं

बच्चों को ये सिखाया जाना चाहिए कि कैसे सोचें, ना कि क्या सोचें. -मार्गरेट मीड

आज का विद्यार्थी पढना लिखना तो जानता है, परन्तु परिवार व समाज में कैसे "रहना" क्या "कहना" और करना है वह नहीं जानता। वर्तमान शिक्षा ऐसी है जिससे प्राप्त ज्ञान से बालक वर्तमान जीवन और समाज से तालमेल नहीं बिठा पाता है। ज्ञान के लिए ज्ञान निरर्थक है। व्यर्थ है। ज्ञान को जीवन में उतारना महत्वपूर्ण है। ज्ञान व्यवहार और आचरण में भी आनी चाहिए।

शिक्षा से हमेशा यह अपेक्षा की गई है कि उससे समूचे व्यक्तिव का विकास हो, चरित्र निर्माण हो तथा शिक्षा के माध्यम से सामाजिक जिम्मेदारी की भावना उत्पन्न हो। शिक्षा ही वह माध्यम है जो व्यक्ति को सम्मानजनक एवं भयमुक्त जीवन जीने को बोध कराता है। दूसरों को अपने ही समान समझना, दूसरों के दुःख सुख में साथ देना, सबकी सहायता करना, चुनौतियों का सामना करना, जीवन जीने की कला आदि के लिए केवल ज्ञान नहीं बल्कि उसके व्यावहारिक अभ्यास की जरूरत है। वास्तव मे ज्ञान का अभिप्राय केवल यह नहीं है कि आपने कितने स्तर तक की डिग्रियां प्राप्त की है। ज्ञान वह है कि जितना भी आपने सीखा है, जितना आपके पास है उसका उपयोग आप कैसे करते है, जीवन की परिस्थितियों, चुनौतियौं का सामना किस प्रकार करते है।

बुद्धि और चरित्र – यही सच्ची शिक्षा का लक्ष्य है. - मार्टिन लूथर किंग जूनियर

हर व्यक्ति की जीवन की परिस्थितियाँ, चुनौतियाँ, अलग अलग होती है। कई बार देखा देखा गया है कि एक दसवी पास व्यक्ति विपरित परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त कर लेता है जबकि बडी-बडी डिग्री धारक उन स्थितियों में पलायन कर लेते है। अतः शिक्षा द्वारा दिया गया ज्ञान ऐसा हो जिसमें बालक समाज में रहते हुए, किसी भी परिस्थिती में अपनी बुद्धि का सदुपयोग करके प्रसन्न चित जीवन जी सकें। वास्तव में विद्यार्थी का मूल्यांकन समाज में ही होगा। ज्ञान का विस्तार आज इतनी तेजी से हो रहा है कि यह असम्भव है कि केाई भी बालक, व्यक्ति सब कुछ पढ़ सके और याद रख सकें। इसीलिए विद्यालय, माता-पिता, शिक्षक का यह प्रयास होना चाहिए बालक को ऐसी शिक्षा प्रदान की जाए जिसमे उसके ज्ञान का सदुपयोग करना सिखाना ही प्रधान कार्य हो, दिमाग को विश्वकोष बनान बेकार है। ज्ञान को अपने जीवन में उतारना महत्वपूर्ण है।

आज की शिक्षा, जानकारी ज्ञान और कौशल तो प्रदान करती है लेकिन भावनात्मक रूप से मजबूत नहीं बना पा रही है। उस ज्ञान की क्या सार्थकता जो जीवन की विपरीत परिस्थितियों में आप में साहस ना जुटा पाएं। शिक्षा द्वारा आज ऐसा ज्ञान दिया जा रहा है जो सिर्फ बालक में पाने के लिए पाया जाता है, जीने के लिए नहीं। शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है इसे केवल येनकेन प्रकारेण अर्थोपार्जन का साधन बनाना उचित नहीं है। बल्कि आज ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे प्राप्त ज्ञान हमारे अन्दर जीवन की समझ पैदा कर सके। विचारों में श्रेष्ठता व भावना में उत्कृष्टता ला सके। जीविकोपार्जन के साथ साथ जीवन में समझदारी पैदा करने वाला ज्ञान ही वास्तविक शिक्षा है। अतः शिक्षा का उद्देश्य ऐसा ज्ञान प्रदान करना होना चाहिए जो बालक को जीवन व्यवहार सिखाती है तथा जीवन संघर्ष के लिए तैयार करती है। शिक्षा को जनसाधारण के जीवन तथा परिवेश से क्रियात्मकरूप से सम्बन्धित होना चाहिए। वस्तुतः प्रत्येक प्राणी के जीवन का अनुभव ही शिक्षा है।

ज्ञान ही शक्ति है। जानकारी स्वतंत्रता है। प्रत्येक परिवार और समाज में शिक्षा, प्रगति का आधार है। -कोफी अन्नान


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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