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स्त्रीत्व और आधुनिकता

स्त्रीत्व और आधुनिकता

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वह ऊष्मा है, ऊर्जा है,

उमंग है, उत्साह है

वह लय है, लोरी है, 

तरंग है, त्वरित है

वह साकार है, सहज है

प्रकृति है, पृथ्वी है

क्योंकि वह स्त्री है।

-डॉ. शरद सिंह


कल से चैत्र नवरात्रि पर्व शुरू होने वाला है, जिसमें मां आदि शक्ति दुर्गा की उपासना की जाती है। आदि शक्ति ही संसार के उद्गम का स्त्रोत है। सृष्टि का निर्माण आदि शक्ति से ही हुआ है। आदिशक्ति स्त्री रूपा है। प्रकृति में सृजन क्षमता स्त्री को ही प्राप्त है। मां दुर्गा के नौ रूप स्त्री के नौ कलाओं की परिचायक है। स्त्री में भी सृजन, पालन और संहार की शक्ति विद्यमान है। स्त्री शक्ति का प्रतीक है और नवरात्र का पर्व एक स्त्री की वास्तविक शक्तियों को दर्शाता है। भारतीय संस्कृति में स्त्री को लक्ष्मी, सरस्वती, काली , दुर्गा का रूप माना गया है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी स्त्री शक्ति की गौरव गाथाए मिलती है। 'मार्कंडेय पुराण' के अनुसार जब देवता असुरों से पराजित हुए तब उन्होंने प्रार्थना की और नारी रूप में शक्ति का आविर्भाव हुआ और उसी शक्ति ने असुरों का संहार किया। 

"नारी सदैव अजेय रही है।" -महादेवी वर्मा 

 स्त्री दया की देवी है। उसका धर्म है- क्षमा तथा शीलता। वह सहिष्णु, उदार और सहकारी है। वह विविध सांस्कृतिक परंपराओं, संस्थाओं की पोषक रक्षक तथा प्रसारक है। घर परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र के विकास में उसका महत्वपूर्ण योगदान है। वक्त आने पर वह समाज का मार्गदर्शन और नेतृत्व भी करने का सामर्थ्य रखती है, इतिहास इस बात का साक्षी रहा है। प्राचीन काल से ही स्त्री का जीवन अनेक उतार चढ़ाव से भरा हुआ रहा है। आज स्त्री के कार्यक्षेत्र, शिक्षा तथा उसकी भूमिका में बहुत परिवर्तन आया है। उनके प्रति लोगों की सोच बदली है। अब वह अपनी बेटियों को शिक्षित कर रहें हैं, उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं। समाज की कई कुरीतियों एवं रूढ़ियों को तोड़कर आज वह स्वतंत्र होकर आगे बढ़ रही है। स्त्रीशिक्षा, पुनर्विवाह, विधवा विवाह, अंतरजातीय विवाह समाज में आज सहज स्वीकार किए जा रहे हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि स्त्री ने आज अपनी शक्ति को पहचान लिया है। आज वह आत्म निर्भर है, स्वतंत्र है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां स्त्रियां नहीं पहुंची है और अपना लोहा न मनवाया हो। अपनी स्वयं की योग्यता, अनुभव, प्रतिभा और मेहनत के बल पर हर क्षेत्र में स्त्रियों ने अपने आप को साबित किया है। आज वह मजबूती से पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। हालांकि इसके लिए उसने लंबा संघर्ष किया है और कर रही है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों और वर्गों तक ये बदलाव, विकास और शिक्षा नहीं पहुंची है, वहां भी स्त्रियों को सभी दृष्टि से सशक्त बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्हें आगे बढ़ने के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रयास हो रहे हैं।

आज जो परिवर्तन, बदलाव स्त्रियों के जीवन में आया है, उसके कारण उनके कार्यक्षेत्र, कर्तव्यों, रहन-सहन, जीवन शैली में बहुत परिवर्तन आ गया है। समाज में कई बार देखा गया है कि इस बदलते परिवेश में कई स्त्रियों में धीरे धीरे अहम और अहंकार का समावेश हो रहा है। स्वतंत्रता स्वच्छंदता में परिवर्तित हो रही है। उनके कर्तव्यों में बदलाव आने लगे हैं। हालांकि यह स्वच्छंदता और अहम की बयार सभी स्त्रियों पर लागू नहीं होती है। आज आवश्यक है कि ऐसी स्त्रियां स्वयं अपने प्रति अपने कर्तव्यों को पहचाने। अपनी वास्तविक जिम्मेदारी को समझें। अपने बढ़ते कदमों का स्वयं आंकलन करें। उसका ये बदलाव और उन्नति तर्कपूर्ण हो। वह दिशा भ्रमित ना हो। वह जो भी करें वह उसके स्त्रीत्व एवं आत्म सम्मान के अनुरूप हो।

एक स्त्री चाहें कितनी भी ऊंचाईयों पर पहुंच जाएं, सबसे पहले वह एक स्त्री है। एक मां, एक पत्नी है। अपने परिवार का आधार स्तम्भ है। रिश्तों में अहम, टकराव, बिखराव आज परिवारों को तोड़ रहें हैं। अपनी सहनशीलता के कारण ही स्त्री को पृथ्वी की संज्ञा दी गई है। परंतु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह अत्याचार सहन करती रहें , या घर की चारदीवारी में बंद रहें। प्रत्येक स्त्री का अपना भी निजी जीवन होता है, रूचियां होती है। उसे भी अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए अवसर और स्वतंत्रता की आवश्यकता है। चिंता इस बात की है कि आधुनिकता की दौड़ में वह अपने स्त्री होने के अस्तित्व को कहीं खो ना दे। स्त्री की स्वतंत्रता स्वच्छंदता में परिवर्तित नहीं होनी चाहिए। अपनी मर्यादाओं में रहते हुए उसे आगे बढ़ना है। परिवार की आधारशिला स्त्री के त्याग पर ही निर्भर है। आधुनिक भारतीय स्त्री का आदर्श इससे अलग नहीं हो सकता। स्त्री एक मां, बेटी, पत्नी और बहन का कर्तव्य बखूबी निभाती है। वह सबसे अच्छी मित्र है। एक स्त्री का स्त्रीत्व उसकी लज्जाशीलता, कौमार्य और विनम्रता के साथ साथ उसकी निर्भीकता में निहित है। ममता, करुणा, श्रद्धा, सात्विकता, पवित्रता, त्याग, और प्रेम एक स्त्री के नैसर्गिक गुण है। इन्हीं संस्कारों और शील गुणों के साथ स्त्री को आगे बढ़ना है, आधुनिक बनना है। अपने अधिकारों का सदुपयोग करना है। कर्तव्यों को निभाना है।

प्रेमचंद ने लिखा है, "नारिया इसलिए अधिकार चाहती है कि उनका सदुपयोग करें और पुरुषों को उनका दुरुपयोग करने से रोके।"

स्त्री की स्वतंत्रता और आधुनिकता उसकी स्वछंदता, बाहरी दिखावे और आडंबर से नहीं है, बल्कि बौद्धिक, वैचारिक और आर्थिक स्वतंत्रता से है। विचारों में उत्कृष्टता आधुनिक होना है। अत्याचार एवं अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना आधुनिकता है और शिक्षित एवं आत्मनिर्भर बनना आधुनिकता है। स्त्री सशक्तिकरण एवं आधुनिकता का अर्थ है उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार लाना और उन्हें ऐसे अवसर देना जिससे वह अपने से जुड़े हर निर्णय स्वयं ले सके। अपने आत्मसम्मान, अपने अस्तित्व तथा नैसर्गिक शील गुणों की रक्षा करते हुए आगे बढ़ना ही आधुनिकता है। अतः स्त्री अपने संपूर्ण विकास के लिए अपने भीतर के गुणों को पहचाने तथा स्वाभिमान व आत्म सम्मान के साथ आत्मनिर्भर बनें। क्योंकि, "महिलाएं समाज की वास्तविक वास्तुकार होती है।"

एक स्त्री चाहें तो घर को स्वर्ग बना सकती है। एक संस्कारी स्त्री घर परिवार का आधार होती है। बच्चे की प्रथम गुरु होती है। एक पुरुष की प्रेरणा है। एक उन्नत समाज और राष्ट्र का विकास स्त्रियों की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता से ही संभव है। नेपोलियन बोनापार्ट ने राष्ट्र के विकास में स्त्रियों के महत्व को दर्शाते हुए कहा है, "कि मुझे एक योग्य माता (स्त्री) दे दो, मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूंगा।" इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय स्त्रियों की बदलती भूमिका देश की प्रगति और विकास का द्योतक है। एक उन्नत राष्ट्र की कल्पना सशक्त, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर स्त्रियों के बिना संभव नहीं है।

"नारी की करुणा अंतर्जगत का उच्चतम विकास है जिसके बल पर समस्त सदाचार ठहरे हुए हैं।" -जयशंकर प्रसाद


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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