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घूंघट या पर्दा प्रथा के लिए क्या अमर्यादित दृष्टिदोष जिम्मेदार हैं?

घूंघट या पर्दा प्रथा के लिए क्या अमर्यादित दृष्टिदोष जिम्मेदार हैं?

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आधुनिक विकसित परिवेश में जहाँ हम वैचारिक दृष्टि से सुदृढ मनमस्तिष्क के सोपान पर स्वयं को समुन्नत समझते हैं वहीं कुछ विशेष मान्यताएँ, रीति रिवाज, परम्पराएँ हे जो आज भी हमें अपनी मजबुत विकास की नींव से पीछे की और खींचती हैं और शिक्षित होने पर भी हमें असफल सिद्ध करती हैं। इन्हीं में से कुछ स्थायी परम्पराएँ ऐसी हे जिसे हम चाह कर भी नहीं छोडना चाहते हैं। अगर हमारे द्वारा छोडने का प्रयास भी किया जाएगा तो विशेष समाज के पक्षों द्वारा हमारा ही विरोध करना प्रारम्भ हो जाएगा कि, नहीं यह तो हमारे समाज का प्रचलन है जो कि अनिवार्य हैं, हम इसे नहीं छोडेगें और तुम छोडना चाहोगें तो हम तुम्हे छोड देगें।

इस तरह से येन केन प्रकारेण स्थायी गलत परम्पराओं, प्रथाओं का विरोध करने पर कभी कभी ऐसे व्यक्तियों को समाज के द्वारा भी गलत सिद्ध करके समाज से ही बहिष्कृत कर दिया जाता हैं। इन सब के पीछे हमारी कुछ मानसिक कुंठित मनोवृत्तियां, कुछ विचारों का प्रदुषण तो, कुछ हमारे स्वयं की अधुरी लालसाएं, कुछ गलत अश्लील अमर्यादित दृष्टिदोष भी जिम्मेदार होता हैं। इन गलत कुप्रथाओं मे घूंघट या पर्दा प्रथा भी हे जो एक स्त्री की मौलिक स्वतन्त्रता का पूर्णतया दोहन करतीं है।

1. घूंघट या पर्दा प्रथा के लिए क्या अमर्यादित दृष्टिदोष जिम्मेदार हैं?

हमें उन कुप्रथाओं का भी विरोध करना चाहिए जिसमें एक स्त्री को अन्य पुरूष के सामने अपने चेहरे पर से भी पर्दा उठाने की भी स्वीकृती नही मिलती है। जिसमें औरत की मौलिक स्वतन्त्रता का हनन तो होता ही है, वहीं स्त्री इस कुप्रथा के परिणाम स्वरूप अपने मनमस्तिष्क में अधीन भावना से पुरूष की आश्रिता,संरक्षिता हो जाती हैं। अधिकांशतय भारत की स्त्रियों में कायरता, निर्बलता और भीरूता की कमजोरियां विद्यमान है, उसका एक बडा कारण यहीं है कि उसे सदियों से दूसरों की निगाह से बचा कर रहना सिखाया जाता है, हमेशा घूंघट या पर्दे में रह कर कमजोर और अविश्वसनीय होने का अहसास कराया जाता हैं। पर इसका मतलब यह नहीें हे की हम अश्लीलता अथवा फुहडता का समर्थन करते हो।

2 घूंघट या पर्दा प्रथा के लिए ,नारी,पुरूष,व समाज तीनों की सहभागिता होती हैं।

घूंघट या पर्दा रखने के लिए मात्र पुरूष समुदाय ही जिम्मेदार नहीं हैं,इस कुप्रथा में स्त्री समुदाय व समाज की भी बराबर सहभागीता है, जो इस प्रथा को अनिवार्य रूप से अनवरत बनाए रखने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नारी को घूंघट या पर्दे में रखना मतलब किसी अमर्यादित पुरूष की निगाह के गुनाहों की सजा किसी निर्दोष स्त्री को देने की परिपाटी हमारे अवैचारिक दृष्टिकोण को अंकित करती हैं। कई जगह तो लम्बा घूंघट डालने के पश्चात महिलाएँ अपनी असहजता को शब्दों में भी अभिव्यक्त नहीं कर पाती हैं। परिणाम स्वरूप योग्य व प्रतिभावन स्त्री स्वयं के व्यक्तित्व को ही खो देती हैं। वर्तमान समय में भी शिक्षित समाज में स्त्रियों को बाहर के किसी भी पुरूष से न तो बात करने की इजाजत प्रदान की जाती है, और नहीं बराबर के दर्जे पर बैठाया जाता हैं,ज्यादातर रूप में जब उस स्त्री के द्वारा विरोध किया जाता हे तब उस स्त्री का समाज और परिवार के द्वारा ही फुहड मजाक बना कर, घूंघट या पर्दा करवाकर उसे अलग कमरे में बैठा दिया जाता हैं।

शिक्षित लोगो की यह दशा हे तो अशिक्षित लोगो की क्या दशा होती होगी, यह तो कहने का ही प्रश्न नहीं उठता हैं। आज भी राजस्थान, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश जैसे राज्योें में यह कुप्रथा ज्वलंत रूप से विद्यमान है। मर्यादा और लज्जाशीलता के नाम पर स्त्री के लिए चौबीस घंटे मूंह ढककर रहने की विवशता स्थूल दृष्टि से कोई बडी बात नहीं है, पर उसके मूल में जो संस्कार छिपे हैें, और इस आधार पर जो मान्यताएं थोपी जाती हैं, वे नारी के मन में कितनी ही हिनता की ग्रन्थियां उत्पन्न कर देती हैं जो परिणामगत न केवल स्त्री के अस्तीत्व को प्रभावित करती हैं, बल्कि इसके माध्यम से स्त्री को कमजोर और अविश्वसनीय होने का अहसास भी अनवरत कराया जाता हैं। साथ ही यह मनुष्य व समाज पर भी एक बडा कलंक सिद्ध करते हैं।

3. स्त्री में स्वपोषित आत्मविश्वास ही दुराचार को रोक सकते है घूंघट या पर्दा नहीं।

सामान्य रूप से प्रश्न यह उठता हे कि क्या महिलाएँ सचमुच में मजबुत और सफल बनी हैं ? क्या स्त्री का लम्बे समय का संघर्ष समाप्त हुआ हैं ? क्या महिलाएँ प्राचीन ऐतिहासिक काल के अनुसार विकास के सुदृढ मापदंडो पर स्थिर हैं? बडा सवाल यह हे कि किसी संस्कारी स्त्री के खुले मूँह या खुले सिर रहने से क्या उसकी मर्यादा भंग हो जाएगी? क्या सिर्फ घूंघट का बंधन या पर्दे का अवरोध किसी स्त्री के दुराचार को होने से रोक सकता हैं ? दुराव या छिपाव हमेशा उस डर से किया जाता हे जब किसी पर भरोसा न हो। और जहाँ सम्मान व चरित्र का उल्लंघन हो। क्या महिलाएँ घूंघट में रहकर अपनी सफलता को निर्धारित कर लेगीं?

क्या चेहरे पर घूंघट या पर्दा नहीं करने पर हमेशा ही महिलाओं को पुरूष व स्त्री के अश्लील कटाश और फुहड परिहास का इसी तरह से सामना करना पडेगा कि वह महिला अंत में मजबुरी वश पुनः अपने चेहरे को घूंघट या पर्दा से ढंकना प्रारम्भ करने लग जाएगी और इस प्रथा का विरोध किए बिना वहीं स्त्री घूंघट या पर्दा में अपनी खंडित सुरक्षा निर्धारित करने लग जाएगीं। अगर नारी को दुराव छिपाव और मात्र रखरखाव की वस्तु माना जाता रहेगा, तो वह पुरूष की सच्ची सहचरी कैसे सिद्ध होगी? घूंघट या पर्दा रखने का अनुबंध दुराचार को रोक सकता है यह सोचना व्यर्थ हैं, स्त्री में स्वपोषित आत्मविश्वास ही दुराचार को रोक सकते है घूंघट या पर्दा नहीं। यद्यपि शिष्टाचार विनय का स्वाभाविक फल हैं,किन्तु घूंघट या पर्दा प्रथा शिष्टाचार कि विडम्बना ही तो हैं।

4. 21 वीं सदी के आधुनिक गतिशील समाज और घूंघट,व पर्दा प्रथा।

घूंघटऔर पर्दे की ओट में घुटती सांसे, अंधकार में खोता हुआ नारी का सम्पूर्ण अस्तित्व,समुचे मानव समुदाय पर सवाल उठाता हैं। हमें यह निर्धारित नहीं करना हे कि पर्दा या घूंघट प्रथा कब ,क्यों, और कैसे आयी है। सवाल यह हे की हम अपने मन, मस्तिष्क ,विचारों की नकारात्मकता पर पर्दा डालने का प्रयास क्यों नहीं करते हैं और अगर करते भी हे तो उसे स्थायी रूप से अपने परिवेश में कब स्थिर करेगें। 21 वीं सदी के आधुनिक गतिशील समाज में जब इस तरह की पाबंदिया नजर आती है तब यह चिन्तन का विषय हो जाता हे कि एक और लोकतंत्र मे महिलाओं की भागीदारी के नाम पर पंचायत और निकायोें में महिलाओं को आरक्षण दिया जाता हैं।

वहीं दूसरी और निर्वाचित होने के बाद यहीं महिलाएँ लम्बे घूंघटो में नजर आती हैं। निर्वाचित विजेता महिलाओं का लम्बा घूंघटा हमारे ही लोकतंत्र का खुला मजाक बनाता हैं, कहीं कहीं पर तो घूंघट या पर्दा हटाने पर पंचायत द्वारा उस महिला और परिवार पर जुर्माना तक लगाया जाता है,जो कि एक आश्चर्यजनक सच है प्रश्न यह उठता हे कि ग्रामीण, शहरी, परम्परागत पारिवारिक परिवेश में जब वह अपना घूंघट तक ऊँचा करने का हक हासिल नही कर पाती हैं तो गाँव , शहर के विकास में अपनी भूमिका का निर्वाह कैसे करती होगी। आज भी भारत के उत्तरी भाग में घूंघट,व पर्दा प्रथा मजबुती से अपनी जडें जमाए हुए हैं। इसे समाप्त करना अती आवश्यक हैं। घूंघट,व पर्दा प्रथा स्त्री की मूल चेतना को अवरू़द्ध कर उसे गुलामी का अहसास कराती हैं

5. स्त्रियाँ की प्राचीन स्वतन्त्र जीवनशैली और घूंघट,व पर्दा प्रथा की अनुपस्थिती।

भारत के संदर्भ में यदि ऐतिहासिक तथ्यों का अवलोकन किया जाए तो प्राचीन समय में स्त्री का सामाजिक सम्मान वर्तमान से ज्यादा मजबुत था। 500 वर्ष पूर्व रचित निरूक्त में भी घूंघट,व पर्दा प्रथा का कहीं भी वर्णन नहीं मिलता हैं। क्योंकी निरूक्त में सम्पत्तियां सम्बन्धी मामले निपटाने के लिए न्यायालयों में स्त्रियों के आने जाने का पूर्ण उल्लेख मिलता हैं। न्यायालयों में उनकी उपस्थिती के लिए किसी घूंघट,व पर्दा प्रथा का विवरण ईसा से 200 वर्ष तक भी नहीं मिलता हैं। यहाँ तक की प्राचीन वेदों ,संहिताओं,रामायण,महाभारत, हमारे प्राचीन ऐतीहासिक भित्ती अभिलेखों, अंजता और सांची की कलाकृतियों में भी यह स्वरूप ही दृष्टिगोचर होता हे कि स्त्रियाँ किसी भी स्थान पर घूंघट,या पर्दा का प्रयोग नही करती थी और स्वतन्त्र जीवनशैली अपनाती थी। 

 हमारे देश की संस्कृति के अनुसार प्राचीनकाल में स्त्रियां बिना घूंघट,व पर्दा के सभी क्षेत्रों में काम करतीं थी और विद्याअध्ययन, योग्यता अभिवर्धन और अपनी प्रतिभा से समाज को लाभान्वित करने की उसे पूर्ण छुट थी। ऋग्वेद में तो एक मंत्र का सार यह भी दर्शाता हे कि कन्या अतिशुभ हे, मंगलमय हैं। बडों के द्वारा आर्शिवाद, छोटो के द्वार स्नेह प्रदान किजिएं न कि उपहार में घूंघट,व पर्दा प्रथा स्थानान्तरित किजिए। यद्यपि याज्ञवल्क्य ,मनु ने स्त्रियों की जीवन शैली के सम्बन्ध में कई नियम बनाए हुए हे परन्तु कहीं भी यह नहीं दर्शाया गया हे कि स्त्रियों को घूंघट,व पर्दाे में छिपा कर रखा जाए। अरब यात्री अबू जैद ने अपने लेखन के जरिए यह बात स्पष्ट करी हे कि 10 शताब्दीं के प्रारम्भ काल में भारतीय राज परिवार में स्त्रियाँ बिना घूंघट,व पर्दे के सभा में व राजघराने में भ्रमण करती थी। वर्तमान का स्वरूप इससे भी ज्यादा अविकसित हैं।यदि इन सब बातो का पूर्ण विश्लेषण करे तो हम पाएगें की प्राचीन समय की तात्कालिन परिस्थितियां,दृष्टिकोण, मानसिक संतुलन ,परम्पराएं, और हमारी ऐतिहासिक संस्कृति वर्तमान परिप्रेक्ष्य से कितनी समुन्नत थी।

6. गलत विचार ,मूल्य, दृष्टिकोण जो महिलाओं को सुरक्षीत नही असुरक्षीत कर रहे हैं।

एक तरह से यदि हम अपने ही परिवार समाज में देखे तो एक स्त्री अपने पुरूष पति के साथ रहती हैं। चूंकि उसने अपना पुरा जीवन अपने पति के साथ व्यतीत किया हे अतः वह अपने पति के गुणों से भी अवगत हैं इसी समयानुसार अगर परिवार में अन्य स्त्री का आगमन होता है और परम्परागत रूप में घूंघट या पर्दा प्रथा का शुभारम्भ होता हे तो इसमें दोष नव आगन्तुक स्त्री का नहीं हे दोष समक्ष स्थित पुरूष के गलत विचार ,मूल्य, दृष्टिकोण का हैं जो की उसे घूंघट के लिए प्रेरित करते हैं। चूंकि उस परिवार की महिला पुरूष की प्रवृत्तियां को जानती थी उसने इस परम्परा को अनवरत बनाए रखा जो कि गलत था। इसमे आप महिलाओं को सुरक्षीत नही असुरक्षीत कर रहे हैं।

7. महिलाओं में गैर जिम्मेदारी का अहसान कराने वाली यह कुप्रथा नारी के विकास और चेतना को अवरूद्ध करती है।

भारत की 48 प्रतिशत आबादी केवल महिलाओं की हैं। मतलब पूरे राष्ट्र के विकास के लिए लगभग आधी आबादी को सशक्त करना जरूरी है। जरूरत यह हे कि महिलाओं के खिलाफ हमारी पुरानी सोच को बदले और संवैधानिक कानूनी प्रावधानों को मजबुत बनाए। लोगो को जाग्रत करने के लिए महिलाओं को जाग्रत होना जरूरी हे न कि उन्हें पर्दा या घूंघट में ढंकना। यदि एक महिला को सफल और सुशिक्षित, पूर्ण समुन्नत बनाना है तो पहले यह आवश्यक है कि महिलाओं को घर की चारदिवारों से हटाने से पहले महिला की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति हेतु पर्दा या घूंघट प्रथा को हटाना बेहद जरूरी है ,यह वह रीति रिवाज और प्रथा परम्पराएं है जो नारी के व्यक्त्तिव को कुंठित करने में बहुत बडा योगदान प्रदान करतीं हैं।

महिलाओं में गैर जिम्मेदारी का अहसान कराने वाली यह कुप्रथा नारी के विकास और चेतना को अवरूद्ध करती है। चूंकि पुरूष और नारी एक ही समाज के अभिन्न अंग है,तो प्रतिबंध और कानून समान लागू किया जाना चाहिए। यदि समाज का एक पक्ष यह कहता हे कि पर्दा या घूंघट प्रथा नारी की इज्जत और रक्षा के लिए है तो दूसरा पक्ष यह भी कहता हे कि पर्दा या घूंघट प्रथा पुरूष पर भी लागू कि जानी चाहिए, क्योकि दूराचार में हमेशा पुरूष ही आगे रहता हैं। यदि पुरूष पर यह नियम लागू नहीं हे तो महिलाओं पर भी यह नियम लागू नहीं होना चाहिए। तभी महिलाएं सफल हो पाएगीं। महिलाओं को बराबरी का सम्मान देना चाहिए, किसी भी तरह की कोई भी प्रथा महिलाओं पर नहीं डालनी चाहिए, जब तक हम इन कुप्रथाओं को छोडकर उपर नहीं उठेगें, तब तक न तो नारी को सम्मान मिल पाएगा और नहीं वह अपना जीवन सफल बना पाएगीं।

घूँघट इधर है, बुर्क़ा उधर है, इन दोनों के दरमियां औरत किधर है?


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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