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कितना जरूरी है समायोजन? कैसे करे संतुलन?

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"समायोजन एक ऐसी कला है जिसके द्वारा सुखी, संतुष्ट और आनंद प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। -अज्ञात

जीवन में परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहती। उतार चढ़ाव आते रहते हैं। चुनौतियों और संघर्षों का आना जाना लगा रहता है। जितनी अच्छी तरह से हम इन चुनौतियों का सामना करते हैं, उतनी ही अच्छे प्रकार से जीवन में सफलता प्राप्त करके आगे बढते हैं। जिस प्रकार मौसम बदलता है -गर्मी, सर्दी, वर्षा आती है हम उसी प्रकार अपने वस्त्र, खान-पान, जीवन शैली बदल कर अपने आप को मौसम के अनुकूल बना लेते हैं। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी जीवन में भी जब विपरित परिस्थितियां आती है, हम उन परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप को ढालने का प्रयास करते हैं इसी को समायोजन (Adjustment) कहते हैं। एक समायोजित व्यक्ति अपनी महत्त्वाकांक्षाओं, योग्यताओं, कोशिशों और परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखता है, तालमेल बनाए रखता है जिसके कारण वह अनावश्यक तनाव, निराशा एवं चिंता से बचा रहता है। समायोजन की आवश्यकता घर-परिवार, मित्र, पडौसी,समाज, कार्य स्थल प्रत्येक स्थान पर तथा आजीवन चलती रहती है।

"समायोजन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई जीवधारी अपनी आवश्यकताओं तथा इन आवश्यकताओं की संतुष्टि से संबंधित परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखता है।"

-एल.एस. शेफर. 

समायोजन के द्वारा व्याक्ति अपने आप को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालने एवं बदलने का प्रयास करता है। सब प्रकार से समायोजित व्यक्ति वह होता है, जो पहले तो अपने आप से ही संतुष्ट और समायोजित हो तथा दूसरे अपने चारों ओर फैले वातावरण या परिवेश से उसका सही तालमेल हो। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने लिए कल्याणकारी होता है बल्कि वह अपने घर,परिवार, समुदाय या समाज के लिए भी वरदान सिद्ध होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में रहकर सामाजिक रीति रिवाजों, परंपराओं के अनुकूल अपने आप को ढ़ालता है। मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समायोजन करता है और यह जरूरी भी है। जीवन में समायोजन बहुत महत्वपूर्ण है। यदि व्यक्ति समायोजन में कुशल है तो वह विपरीत परिस्थितियों में डट कर चुनौतियों का सामना कर सकता है। अपने संघर्षपूर्ण जीवन को सुखी एवं आनंदमय बना सकता है।

बालक में समायोजन का गुण अधिकतर अपने परिवार और पारिवारिक वातावरण में ही विकसित होता है। यह एक दिन में सिखाया जाने वाला कार्य नहीं है, निरंतर प्रयास और अभ्यास से यह विकसित होता है। इसलिए समायोजन की प्रक्रिया बालपन से ही बालक में विकसित की जानी चाहिए।

जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है,उसकी उम्र बढ़ती है अलग-अलग प्रकार की परिस्थितियां, चुनौतियां उसके सामने आती हैं। वह स्वयं अपनी आकांक्षाओं, योग्यताओं और क्षमताओं का आंकलन नहीं कर पाता। जब तक उसकी आवश्यकताएं पूरी होती हैं परिस्थितियों के साथ उसका संतुलन बना रहता है। लेकिन जैसे ही उसकी आवश्यकताओं और कोशिशों के बीच बाधा आती है, वह तालमेल नहीं बिठा पाता, परिस्थितियों के साथ संतुलन स्थापित नहीं कर पाता। ऐसे में माता-पिता तथा अभिभावकों को प्रयास करना चाहिए कि वह बालक को परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप को ढालने तथा अपने व्यवहार में परिवर्तन करने के लिए प्रेरित करें।उनकी सहायता करें और सही दिशा निर्देश तथा परामर्श दें। समायोजन एक ऐसी क्षमता का भाव है, जो बालक को उसकी क्षमताओं, योग्यताओं के अनुसार उसकी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप उसे आगे प्रगति के मार्ग पर ले जाने में सहायता करती है। यह अनुकूलन क्षमता या समायोजन की क्षमता ही जीवन में बालक का सर्वांगीण विकास, प्रगति, संतुष्टि तथा उसकी खुशी को निर्धारित करता है। 

दैनिक जीवन में अभिभावकों एवं माता-पिता द्वारा कुछ ऐसे प्रयास किये जा सकते हैं जिसके द्वारा बालक को उचित समायोजन के प्रति प्रेरित किया जा सकें, अवसर उत्पन्न किया जा सकें- 

1. अभिभावकों को यह प्रयास करना चाहिए कि वह अपने बालक में आत्मनियंत्रण का भाव विकसित कर सकें।

2. यह ध्यान रखें कि बालक में कभी हीन भावना उत्पन्न नहीं हो। दूसरों से कभी भी बालक की तुलना नहीं करें।तथा परिवार से भावनात्मक सुरक्षा बालक को प्राप्त होनी चाहिए।

3. बचपन से ही बालक में धैर्य और सहनशीलता जैसे गुणों का विकास करें।

4. सामाजिक गुण जैसे- प्रेम,आदर, और सहानुभूति, दूसरों का सम्मान आदि का भाव बालक में उत्पन्न करें। समाज के नियम, रीति रिवाज से परिचित कराएं। तथा सामाजिक क्रियाओं में भागिदारी के अवसर उपलब्ध कराएं जिससे कि बालक को समाज में समायोजित होने में सहायता मिल सकें।

5. बालक में आत्मविश्वास उत्पन्न करना जिससे कि विपरीत परिस्थितियों में वह विचलित नहीं हो तथा वातावरण के साथ संतुलन स्थापित कर सकें।

6. बालक के आक्रमक, असमाजिक, एवं समस्यात्मक व्यवहार को पहचानना और उसका निराकरण करना।

7. किसी भी प्रकार की मानसिक अस्वस्थता एवं मानसिक विकार से बालक ग्रस्त है, तो उसके साथ प्रेम, स्नेह से पेश आएं और सहयोगी वातावरण में उसे समझने का प्रयास करें।

8. परिवार के सदस्यों में आपस में भी पारस्परिक सहयोग एवं तालमेल होना चाहिए जिससे बालक को भी समायोजित होने में सहयोग मिलें।

9. माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि बालक की व्याक्तिगत और भौतिक आवश्यकताओं जैसे- भूख, प्यास, नींद, आराम, दैनिक जरूरतें, प्यार, सम्मान आदि का ध्यान रखें। क्योंकि व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति बालक के समायोजन के लिए बहुत आवश्यक है।

10. किसी भी परिस्थिति में समायोजित होने के लिए संवेगात्मक रुप से मजबूत होना जरूरी है। अत: बालक को संवेगात्मक रुप से परिपक्व बनाएं। इसके लिए आवश्यक है कि बालक उचित समय पर अपने संवेगो को अभिव्यक्ति करें, अन्यथा वह संवेगात्मक रुप से अस्थिर हो जाएगा और समायोजन में कठिनाई उत्पन्न हो जाएंगी।

11. प्रत्येक व्यक्ति,बालक की अपनी सीमाएं, योग्यताएं तथा क्षमताएं होती है।कई बार माता-पिता भी अपने बालकों से उनकी क्षमताओं से अधिक अपेक्षाएं रखते हैं। बालक जब अपनी और अभिभावकों की उम्मीद पर खरा नहीं उतरता तो उसमें निराशा, तनाव उत्पन्न हो जाता है। और वह उन परिस्थितियों के साथ संतुलन नहीं बना पाते तथा कुसमायोजन की ओर बढ़ने लगता है। अत: माता-पिता का यह कर्तव्य है कि बालक को अपने लक्ष्य को अपनी योग्यता और परिस्थितियों के अनुरूप घटाने, बढाने संसोधित एवं परिवर्तित करने के लिए प्रेरित करें। जैसी परिस्थिति हो उसी के अनुरूप अपने व्यवहार, काम करने के तरीके ,अपनी इच्छाओं तथा लक्ष्यों में तब्दीली करें। जितनी अच्छी प्रकार से वह इस परिवर्तन को अपना लेता है, उतना ही वह समायोजन में कुशल होगा और जीवन में सफल होगा।

12. उचित समायोजन के लिए यह बहुत आवश्यक है कि बालक शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक रूप से स्वस्थ हो तथा घर, परिवार एवं आस-पड़ोस का वातावरण, माहौल सकारात्मक तथा अनुकूल हो।

13. बात बात पर बालक की आलोचना और कमियों को प्रदर्शित नहीं करें बल्कि उसकी अच्छाइयों, क्षमताओं से उस को परिचित कराएं। अपनी बुराई, कमजोरियों आदि को जानने और समझने का अवसर दें तथा अपनी क्षमताओं और सामर्थ्य को स्वीकार करना सिखायें।

14. माता-पिता को प्रयास करना चाहिए कि बालक का सभी क्षेत्रों में संतुलित और सर्वांगीण विकास हो। व्यक्तित्व के सभी पक्षों को विकसित होने के समान अवसर बालक को प्राप्त हो। तभी वह अपने आप से तथा अपने वातावरण से समायोजित हो सकेगा।

15. जब भी बालक के सामने कोई चुनौती या समस्या आए तो अभिभावकों को चाहिए कि बालक में ऐसी समझ विकसित करें, उन्हें ऐसे अवसर दें कि वह स्वयं उनका सामना करें। माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों को उन्हें उचित परामर्श और मार्गदर्शन ही देना चाहिए जिससे कि बालक में अपने आप वातावरण के साथ समायोजित होने में आवश्यक मदद मिल सकें।

अत: समायोजन व्यक्ति की एक प्रकार की मनोदशा है, जिसके द्वारा वह जीवन की आवश्यकताओं और मांगों को अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार अनुकूलन करके चलता है। जो इस प्रकार के मनोविज्ञान अनुकूलन में जितना समर्थ होगा वह उतना ही अच्छी प्रकार से विपरीत परिस्थितियों में भी अपने जीवन को सफलतापूर्वक जी सकता है। समायोजन संबंधी गुण परिस्थितियों के अनुरूप हमें अपने आप को ढालने में पूरी मदद करता है। इतना ही नहीं समायोजन में इतनी शक्ति और सामर्थ्य होता है कि वह हमें परिस्थितियों को ही बदल कर अपने अनुकूल या इच्छानुसार बनाने में मदद करता है। इस प्रकार जीवन में सुखी एवं संतुष्ट रहने की कुंजी समायोजन की प्रक्रिया में निहित है।


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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