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क्या आपका बच्चा सृजनात्मक है?

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"हर बच्चा एक कलाकार होता है, समस्या यह है की, आप बड़े हो जाने पर, अपने अन्दर के कलाकार को जिंदा कैसे रखें।-पाब्लो पिकासो"

सृजनात्मकता मानव के क्रिया कलापों एवं निष्पति के लिए आवश्यक है। सृजनात्मकता किसी भी व्यक्ति के क्रियाओ में हो सकती है। समाज में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के कार्य या व्यवसाय में सृजनात्मकता का बोध होता है। बढ़ई लकड़ी से मनचाही कलात्मक मेंज कुर्सी बना सकता है। चित्रकार रंगों से मनचाही कलाकृति की रचना करता है। सभी प्राणियों में एक ही स्तर की सृजनात्मक योग्यता नहीं होती है। रुचि एवं क्षमता के अनुसार सृजनात्मकता का क्षेत्र अलग-अलग होता है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति अनुपम है, इसलिए सभी प्राणियों में एक जैसी सृजनात्मकता नहीं हो सकती। सृजनात्मकता सार्वभौमिक होती है और बाल्यकाल से ही कुछ न कुछ मात्रा में इसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि सृजनात्मकता प्रत्येक प्राणी में प्रकृति प्रदत्त, जन्मजात होती है, ईश्वर प्रदत्त होती है। परंतु इसके विकास में शिक्षा एवं वातावरण का बहुत महत्व होता है। यदि बालक को उचित अवसर, वातावरण एवं शिक्षा नहीं मिले तो आगे चलकर इनका पोषण, अंकुरन एवं विकास भली-भांति नहीं हो पाएगा। विद्वानों ने सृजनात्मकता की अलग अलग अनेक परिभाषाएं दी है, सभी का निष्कर्ष यह है कि सृजनात्मकता व्यक्ति की वह योग्यता है जिसके द्वारा वह किसी नए विचार या नयी वस्तु का निर्माण करता है या किसी नयी वस्तु की खोज करता है। और भी आसान शब्दों में समझें तो सृजनात्मकता में निम्न बातें महत्वपूर्ण है-

  1. सृजनात्मकता में नवीन तथा मौलिक विचार निहित होते हैं।
  2. वही कार्य सृजनात्मक होता है, जो उपयोगी हो तथा जिसे सामाजिक मान्यता मिली हो।
  3. सृजनात्मकता में नूतन सहचर्य का अनोखा प्रतिबोध होता है।
  4. सृजनात्मक विचारों का प्रादुर्भाव अक्समात, अदभुत रूप में प्रकट होता है।
जीवन के सभी पहलुओं के बारे में जिज्ञासा, मेरे अनुसार, महान रचनात्मक लोगो का रहस्य है” लियो बर्नेट

प्रशन उठता है कि बालक में सृजनात्मकता की पहचान कैसे करें? वैसे तो इसके लिए मनोवैज्ञानिक परीक्षण होते हैं, परंतु यहां हम केवल कुछ सामान्य विशेषताओं की बात करेंगे।

1. ऐसे बालक जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते हैं। आत्मविश्वासी होते हैं।

2. उनमें स्वयं निर्णय लेने की क्षमता होती है। प्रत्येक समस्या एवं स्थिति को वह अपने अनुभव के आधार पर देखते हैं, अपने तरीके से प्रकट करते हैं।

3. एक सृजनात्मक बालक अपनी रचना के आधार पर ही अपनी अभिव्यक्ति करता है। उसकी अभिव्यक्ति

   स्वतंत्रत होती है।

4. उनके विचारों में नवीनता और मौलिकता तथा चिंतन में विविधता और प्रगतिशीलता होती हैं।

5. वह आसानी से सभी परिस्थितियों में अपने आप को  समायोजित कर लेता है। बालक के दैनिक क्रिया कलापों में भी उसकी सृजनात्मकता​ देखी सकती है।    

6. ऐसे बालकों में आसान कार्यो की बजाय जटिल कार्यों में रूचि होती है।

7. अन्य बालकों की तुलना में इनमें अपने आत्मसम्मान तथा अहम की तुष्टि की भावना अधिक होती है। अपनी सृजन की हुई वस्तुओं एवं विचारों में उन्हें गौरव एवं संतुष्टि का बोध होता है।

8. सृजनात्मक बालक उच्च बौद्धिक क्षमता रखते हैं। यह आशावादी होते हैं तथा चुनौतियों से डरते नहीं हैं।

9. इनमें अच्छी स्मरण शक्ति, कल्पना शक्ति तथा एकाग्रता होती हैं। यह दूरदृष्टी वाले होते हैं।

10. ऐसे बालक अपने सीखें हुए ज्ञान का एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थितियों में आसानी से स्थानांतरण कर लेते हैं। हर स्थिति में ज्ञान का उपयोग करने की क्षमता इनमें होती है।

सृजनात्मकता का विकास-

यह सही है कि बालकों में सृजनात्मकता जन्मजात होती हैं ईश्वर की देन होती है परंतु यदि इनकी प्रतिभा को उचित दिशा एवं अवसर नहीं मिले तो वह उस मुकाम पर नहीं पहुंच सकता जहां वास्तव में उसे होना चाहिए। उसके अहम को यदि संतुष्टि ना मिले, अभिव्यक्ति ना मिले तो वह भटक भी सकता है। शिक्षा तो एक माध्यम है ही। इसके अतिरिक्त माता-पिता, अभिभावक भी अपने दैनिक जीवन में बालकों को ऐसे अवसर तथा वातावरण​देकर उनमें सृजनात्मकता को विकसित करने में योगदान दें सकते हैं,जो इस प्रकार है:

1. सर्वप्रथम माता पिता को यह समझना होगा उनके बच्चे की सृजनात्मकता किस क्षेत्र में है। दो बच्चों की सृजनात्मक रुचि या प्रतिभा एक जैसी हो यह आवश्यक नहीं है इसलिए उसकी नैसर्गिक प्रतिभा को पहचानना होगा। उस पर प्रतिभा को थोपना नहीं है।

2. इसके पश्चात बालक को अपने विचारों और रचनात्मकता को प्रदर्शित करने तथा अपनी अभिव्यक्ति देने के अधिक से अधिक अवसर तथा वातावरण​ प्रदान करना चाहिए।

3. अधिकतर माता पिता को बच्चों का प्रश्न पूछना पसंद नहीं आता। वह चाहते हैं कि हम जो कहे बच्चे वह मान ले परंतु इससे उनकी सृजनात्मकता दब जाती है विकसित नहीं हो पाती है बल्कि माता-पिता को उन्हें प्रेरित करना चाहिए कि वह अधिक से अधिक प्रश्न पूछें। उनकी जिज्ञासा को दबाना नहीं है। ऐसा वातावरण उत्पन्न करें कि बच्चे की जिज्ञासा शांत हो सके।

4. विचारों की स्वतंत्रता प्रत्येक बालक को मिलनी चाहिए किसी भी समस्या को देखने का हर बच्चे का अपना अलग नजरिया होता है। अलग दृष्टिकोण होता है। एक सृजनात्मक बालक के लिए बंधा हुआ चिंतन उसके मार्ग में रुकावट पैदा करता है।

रचनात्मकता तो बस चीजों को जोड़ना है। जब आप रचनात्मक लोगों से पूछ्तें हैं की आपने यह कैसे किया, तो वे थोड़े शर्मिंदा महसूस करतें हैं, क्यों की वास्तव में उन्होंने यह नहीं किया होता है, उन्होंने कुछ देखा। कुछ समय बाद उन्हें अपना काम सामान्य लगने लगता है। -स्टीव जॉब्स

5. जब बालक स्वयं कोई कार्य करता है, विचार प्रस्तुत करता है तो उसके अहम को संतुष्टि मिलती है इसलिए माता-पिता को चाहिए बालक को उसकी अहम की अभिव्यक्ति अपने तरीके से करने की स्वतंत्रता दे। उन्हें अपना कार्य स्वयं करने दें माता-पिता को केवल सही अवसर तथा दिशानिर्देश ही देने चाहिए।

6. बालक की जो भी अभिव्यक्ति है क्रियाकलाप है, माता पिता को उसे समझना चाहिए, स्वीकार करना चाहिए तथा बालक को प्रोत्साहित करना चाहिए। तथ्यों का अनुकरण करने की बजाय उन्हें स्वयं सोचने के एवं करने के अधिक से अधिक अवसर प्रदान करें।

7. बालक मैं आत्मविश्वास उत्पन्न करें। ऐसे अवसर दें जिससे उनकी झिझक दूर हो जाए और उनकी प्रतिभा खुलकर प्रदर्शित हो।

8. बालक को अधिक से अधिक सक्रिय रखें तथा दैनिक जीवन में उसे अलग-अलग प्रकार के कार्यकलाप अपने तरीके से करने के अवसर प्रदान करें स्वयं अपना उदाहरण दे तथा महान व्यक्तियों के उदाहरण भी उनके सामने रखें जा सकते हैं ।

9. बालक को चिंतन करने के अधिक से अधिक अवसर मिलने चाहिए। उन्हें किसी समस्या का समाधान स्वयं ना बताए बल्कि उन्हें अलग-अलग तरह से चिंतन और मनन करने के अवसर दें।

10. कई बार बाल्यावस्था में बच्चे में जो सृजनात्मकता पाई जाती है या जिस सृजनात्मक क्षेत्र में वह अपनी अभिव्यक्ति देता है कुछ वर्षों पश्चात उसमें परिवर्तन आ जाता है उसकी रूचि एवं उसका सृजनात्मक क्षेत्र परिवर्तित हो जाता है ऐसे में माता पिता को उसे समझना चाहिए और एक अवसर अवश्य देना चाहिए कि वह अन्य क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित कर सके यह जरूरी नहीं है कि बालक में प्रतिभा या सृजनात्मकता केवल एक ही क्षेत्र में हो एक से अधिक क्षेत्रों में भी बालकों में सृजनात्मकता देखी गई है अक्सर सृजनात्मक बालक कई क्षेत्रों में प्रतिभावान होते है।

आपकी रचनात्मकता कभी ख़त्म नहीं हो सकती, जितना आप उसका इस्तेमाल करेंगे वह उतनी ही बढती जाएगी।– माया अन्जेलो 

इस प्रकार माता-पिता अपने दैनिक जीवन में अपने बालकों पर थोड़ा सा ध्यान रख कर, उन्हें अवसर दें कर उनके सृजनात्मकता में विकास कर सकते हैं। उचित समय पर यदि बालकों की सृजनात्मकता की पहचान हो जाए, सही दिशा निर्देश मिल जाए तो भविष्य में वह अपनी एक पहचान बना सकते हैं। अपने और समाज दोनों के लिए लाभकारी हो सकते हैं। परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सृजनात्मकता का विकास बालक पर दबाव डाल कर नहीं करें। प्रत्येक बालक में सृजनात्मक प्रतिभा जन्मजात होती है, अलग-अलग होती है। हमें केवल उन्हें पोषित करना है, विकसित करना है और अवसर तथा स्वतंत्र वातावरण देना है ।

कल्पना शुरुवात है रचना की। आप वह कल्पना करते हो जिसकी आपको इच्छा है, आप वह बन जाओगे जो आप कल्पना करते हो, और अंत में, आप उसकी रचना करोगे जो आप होओगे। - जार्ज बर्नार्ड शॉ


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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