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मैं अपने आप में श्रेष्ठ हूं

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"दिन में कम से कम एक बार खुद से जरूर बात करें अन्यथा आप एक उत्कृष्ट व्यक्ति के साथ एक बैठक गवा देंगे।" -स्वामी विवेकानंद

यह बिल्कुल सही है कि जितना बेहतर हम स्वयं को जानते हैं, उतना कोई दूसरा हमें नहीं जान सकता। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में श्रेष्ठ है और कोई भी व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ ना कुछ कमी होती है। अपने आप की तुलना किसी से करना बेकार है। किसी के जैसा बनना समय की बर्बादी है। हम ये क्यों सोचे कि हमें किसी के जैसा बनना है। हम यह क्यों न सोचे कि कोई हमारे जैसा बनें​। हर व्यक्ति की शारीरिक बनावट, रंग रूप, मानसिक, बौद्धिक योग्यता, क्षमता, प्रतिभा अलग-अलग होती है, फिर दूसरों से तुलना कैसीे।

हम जो हैं, हमारे पास जो है वह सर्वश्रेष्ठ है। चाहे हम मोटे हैं, पतले हैं,काले हैं, गोरे हैं, सुंदर है या साधारण है, वही हमारी वास्तविकता है। जैसे हैं वैसे रहते हुए ही जीवन में आगे बढ़ना,सफलता प्राप्त करना हमारी श्रेष्ठता है। अपने आपको जैसे हैं उसी परिस्थिति में स्वीकार करने में, और उसी को श्रेष्ठ बनाने में ही हमारी श्रेष्ठता है ना कि दूसरों से तुलना करके अपने आप को दूसरों से कम या बेहतर आंकने में। दूसरों के पास क्या है, यह सोचने में समय लगाने से बेहतर है कि हम यह खोजें कि हममें क्या अच्छा है, क्या बुरा है जिसे हम बदल सकते हैं, सुधार सकते हैं। खुद से बात करें तभी अपने आप को बेहतर जान सकते हैं इसलिए हर व्यक्ति अपने आप में श्रेष्ठ हैं।

किसी से तुलना करने से हम हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं, जो हमारी सफलता में, आगे बढ़ने में सबसे बड़ी रुकावट है। जब भी हमें कोई दुविधा हो, कोई परेशानी हो, सबसे पहले अपने आप से पूछो, खुद से बात करें। खुद से ही प्रश्न पूछें, खुद ही उसका जवाब दें क्योंकि अपनी परिस्थिति, अपनी समस्या अपने आप से बेहतर कोई नहीं जान सकता। किसी ने लिखा है, "कभी कभी मेरा खुद से मिलने का मन करता है, काफी कुछ सुना है मैंने अपने बारे में।" कोई दूसरा आपको ज्ञान दे सकता है। प्रेरणा दे सकता है, आपके प्रश्नों का जवाब भी दे सकता है, पर आप संतुष्ट नहीं होते। ऐसा नहीं है कि सामने वाला व्यक्ति गलत है। वह अपनी बुद्धि और विवेक से सही कह रहा है या कह रही है लेकिन यह आप बेहतर निर्णय ले सकते हैं आपका विवेक ही तय कर सकता है कि आपके लिए इन परिस्थितियों में सबसे बेहतर क्या है।

आप संतुष्ट खुद से ही होंगे। क्योंकि आप अपनी क्षमताओं, योग्यताओं, समस्याओं को दूसरों से बेहतर जानते हैं। स्वयं को ना जानना भी असफलता का एक कारण है और खुद को जानना आगे बढने और सफल होने की शुरुआत है। हमारी प्रेरणा हमारे अंदर ही है जब तक हम अपने को नहीं जान पाएंगे तब तक प्रेरित नहीं हो सकते। अपनी प्रेरणा आप स्वयं बनें। प्रेरणा कोई सीमाओं में बंधी हुई वस्तु नहीं है जिसका हम मिलने का इंतजार करें। हमारे आसपास छोटी-बड़ी चीजों में, वातावरण, मनुष्य, यहां तक कि पत्थर से भी प्रेरित हो सकते हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम कैसे प्रेरित होते हैं और यह तभी संभव होगा जब हम दूसरों से​ अपनी तुलना करने के बजाय जो हमारे पास है, जैसे हम हैं उसी में खुद को साबित करें।

यह मानकर चलें कि हम अपने आप में श्रेष्ठ हैं और अपने कार्यो सें इसे साबित करें। इसलिए सबसे पहले आप खुद से बात करके देखिए, इससे हमें सुकून मिलेगा। हमारे अंदर एक आत्मविश्वास उत्पन्न होगा। परंतु इस आत्मविश्वास को अंहकार ना बनने दें। आत्मविश्वास और अहंकार में फर्क होता है। हम अपने आप में श्रेष्ठ हैं, लेकिन यह न सोचें कि केवल हम ही श्रेष्ठ हैं। क्योंकि यह हमें अहंकार की ओर ले जाता है। पतन की ओर ले जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में श्रेष्ठ है, पर दूसरों की तुलना में नहीं। हमें स्वयं को जानना़ है, स्वयं से बात करना है जिससे कि हम अपनी अच्छाइयों और कमजोरियों को जान सकें, अपने में सुधार कर सकें। अपनी प्रेरणा स्वयं बन सकें। अपना सर्वश्रेष्ठ दें सकें।

वैसे भी आज प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में भागदौड़ है। किसी के पास दूसरों के लिए वक्त नहीं है। सब अपने में उलझे हैं। अपना सुख दुख बांटने के लिए वक्त ही नहीं है। जब कोई हमारे मन की बात सुनने वाला नहीं होता या हम अपने आप को अभिव्यक्त नहीं कर पाते तो हम अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं, तनाव में आ जाते हैं। जीवन में निराशा, कुण्ठा उत्पन्न हो जाती है। अपने आप को अकेला महसूस करते हैं। ऐसे में हम खुद ही अपना सबसे अच्छा मित्र, शुभचिंतक बन सकते हैं, अपने आप से बात करके। इस भागती-दौड़ती जिंदगी में थोड़ा समय अपने लिए निकालें। अपना मूल्यांकन स्वयं करें। अपनें एकांत को अपनी ताकत बनाएं। एकांत में अपने आप को जानने, पहचाने का प्रयास करें। अपनी श्रेष्ठता को स्वयं में खोजें, अपनी गलतियों, कमियों को पहचाने। 

जे. कृष्णमूर्ति​ ने कहा है, "एकांत सुंदर अनुभूति है। एकांत में होने का अर्थ अकेले होना नहीं है। इसका अर्थ है मस्तिष्क समाज द्वारा प्रभावित और प्रदूषित नहीं है।"  

इसलिए अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजें। खुद को महत्व दें। खुद से प्रेम करें। आप जैसे है, अपने आप में श्रेष्ठ है यह महसूस करें और जीवन में आगे बढें। जो आपके पास नहीं है उसके लिए दुखी ना हो, जो आपके पास है उसी को श्रेष्ठ बनाए और खुश रहें। सीमित संसाधनों में भी व्यक्ति एक अच्छी, बेहतर जिंदगी जी सकता है। यह मेरा व्यक्तिगत मत है। आवश्यक नहीं कि सब इससे सहमत हो। लेकिन एक बार कोशिश जरूर करें। जब हम यह मान लेंगे कि 'मैं अपने आप में श्रेष्ठ हूं और अपनी सबसे अच्छी मित्र हूं।' तो हमारे अंदर एक आत्मविश्वास उत्पन्न होगा जो हमें प्रेरणा देगा। अपनी प्रेरणा हम स्वयं बनेंगे।

"जब खुद से दोस्ती हुई तो पता चला मुझे, मुझसे बेहतर मुझे और कोई नहीं जानता।" (अज्ञात )


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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