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भाषा का पिछड़ना संस्कृति का पिछड़ना है

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"निज भाषा उन्नति अहे ,सब भाषा को मूल,

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन,  

पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन। "

भारतेंदु हरिश्चंद्र

भाषा मानव का सर्वोत्तम सृजन है। भाषा केवल भावों एवं विचारों के आदान-प्रदान का साधन मात्र ही नहीं है अपितु मानव के चिंतन एवं सोचने का साधन है। मनुष्य की भाषा ही उसके भाव, विचारों को स्पष्टता, पूर्णता एवं सुनिश्चितता​ प्रदान करती है। बिना भाषा मनुष्य का विचार करना सोचना भी बंद हो जाता है। अतः भाषा एवं विचार का अटूट संबंध है। वर्षों से भाषा से या भाषा द्वारा मनुष्य और समाज दोनों का निरंतर विकास होता आया है, हो रहा है और होता रहेगा।

मनुष्य और भाषा का पारस्परिक टकराव ही नए चिंतन, नई संस्कृति, नई सोच और नए समाज को जन्म देता है। भाषा अर्जित संपत्ति है। मनुष्य, जिस परिवार ,समाज में जन्म लेता है उसी भाषा का अर्जन करता है। भाषा ज्ञान एवं शिक्षा का आधार है। भाषा के द्वारा ही मनुष्य समाज के विभिन्न क्षेत्रों के बारे मे, सभी ज्ञानानुशासनो की जानकारी प्राप्त करता है। भाषा मानव, मानव समाज तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने वाली श्रृंखला है। भाषा ज्ञान प्राप्त करने का एक साधन है। भाषा हमारे मूल्यों ,संस्कारो ,परंपराओं से जुड़ी हुई होती है। 

     " भाषाओं का ज्ञान बुद्धिमता का मार्ग है।"

आज हमारे जीवन में अंग्रेजी का बहुत अधिक महत्व है और यह आवश्यक भी है। आज के समय जिसे अंग्रेजी बोलनी नहीं आती वह अपने आप को पिछड़ा हुआ महसूस करता है और अंग्रेजी जानने वाला श्रेष्ठ लगता है। अंग्रेजी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। यह एक ऐसी भाषा है जो हमें विश्व से जोड़ती है। कंप्यूटर, इंटरनेट, सोशल मीडिया, शिक्षा, नौकरी में आज अंग्रेजी बहुत आवश्यक हो गई है। इसे ग्लोबल लैंग्वेज भी कहा जाता है।

वैश्वीकरण तथा आधुनिकता के इस दौर में अंग्रेजी बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि जो अंग्रेजी नहीं जानता वह ज्ञानी नहीं है। भाषा तो ज्ञान प्राप्त करने का एक माध्यम है। हिंदी मीडियम से पढ़ने वाले चाहे उनके पास कितनी भी डिग्रियां हो अंग्रेजी बोलने वाले के सामने अपने आप को हीन समझता है। अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में हिंदी बोलने पर पाबंदी है लेकिन स्कूलों के बाहर भी अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी में ही बात करने की नसीहत देते हैं। यहां तक की जो बच्चे हिंदी बोलते हैं, उनके साथ खेलने और बात करने में भी पाबंदी लगा दी जाती है इससे हिंदी माध्यम वाला बच्चा अपने आप को हीन समझता है। कई बार अंग्रेजी ना आने के कारण पढ़ें लिखे लोग भी निराश हो जाते हैं, कुंठित रहते हैं। भाषा कोई भी बेकार नहीं होती, बल्कि अधिक से अधिक भाषाओं का ज्ञान होना अच्छा है लेकिन अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिए हम अपनी भाषाओ को नीचे नहीं गिरा सकते। 

"मैं दुनिया की सभी भाषाओं की इज्जत करता हूं पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत ना हो, यह मैं सह नहीं सकता" -आचार्य विनोबा भावे

हम आज अंग्रेजी भाषा में अपनी उत्कृष्टता ​दिखाते हैं, परंतु हमारे जीवन के अधिकांश हिस्सों में अपनी मातृभाषा, स्थानीय भाषा का बाहुल्य है। फिर भी अपनी भाषा से हीनभावना क्यों। केवल अंग्रेजी बोलना हमारी उत्कृष्टता का निर्धारण नहीं कर सकता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज के समय मे, बदलते दौर में विश्व के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान बहुत आवश्यक है। परंतु यदि बालक या व्यक्ति अंग्रेजी के अलावा अन्य स्थानीय, एवं मातृभाषा को भी समान महत्व देता है तो उसमें हर्ज क्या है। अंग्रेजी के साथ साथ अगर वह हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं को भी बोलता है या अपनी कोई मातृभाषा बोलता है तो उसे पिछड़ा हुआ क्यों समझा जाए।

यहां मैं एक उदाहरण देना चाहती हूं। सोनी टीवी पर एक बहुत प्रसिद्ध शो "कौन बनेगा करोड़पति "आता है। उसमें श्री अमिताभ बच्चन जी हिंदी तो बोलते ही है परंतु कभी कभी वह प्रतियोगियों की स्थानीय भाषा में बोलने का भी प्रयास करते हैं। उस समय दर्शक ताली बजाते हैं, सराहना करते हैं। अच्छा लगता है उन्हें सुनकर।अखबारों में भी उनकी प्रशंसा की जाती है, इससे उनका मान कहीं भी कम नहीं होता। परंतु यही काम हम अपने दैनिक जीवन में क्यों नहीं करते। हमें लगता है लोग हमें पिछड़ा समझेंगे।  

"वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।" -पीर मुहम्मद मूनिस

हमारी भाषा हमें अपनापन महसूस कराती है। भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करती है। माता के अलावा बच्चों के लिए संस्कार का स्त्रोत उसका प्राकृतिक व सामाजिक परिवेश है, जिसमें उसका पालन पोषण होता है। उसी भाषा से हमारे संस्कार जुड़े होते हैं। हमारी वर्तमान पीढ़ी अपनी भाषा से दूर होने के साथ ही संस्कारों से भी दूर होती जा रही है। जिस भाषा को महत्व देते हैं, जिस भाषा में हम सोचते हैं, वही संस्कृति हम सीखते हैं और उसी का अनुकरण भी करते हैं, इसलिए बच्चों को अपनी भाषाओं​ से जोड़े रखना बहुत आवश्यक है। अपनी भाषा हमें अपनी जड़ों, परंपराओं, मूल्यों, संस्कारों से जोड़ती है। अपने पूर्वजों से जो संस्कार मिले हैं, भाषा के द्वारा ही आने वाली पीढ़ी तक पहुंचेंगे। कम से कम आपसी बोलचाल में परिवार, समाज, समुदाय में हम हिंदी या अपनी मातृभाषा भाषा या स्थानीय भाषा का प्रयोग जरूर कर सकते हैं।

संपूर्ण विश्व में भारत अपनी सभ्यता संस्कृति के लिए जाना जाता है और कहीं ना कहीं इसके पीछे हमारी भाषा ही है। हमारी परंपराएं ही हैं। स्थानीय भाषा तो बहुत दूर की बात है, हिंदी बोलने में भी लोग पिछडे महसूस करते हैं। पढ़े लिखे उच्च वर्गीय, अंग्रेजी माध्यम में पढ़ें व्यक्तियो में हिंदी बोलना लगभग खत्म होता जा रहा है। आज अंग्रेजी भाषा का ज्ञान मजबूरी हो गया है। समाज में अपनी अच्छी पहचान बनाने के लिए अपने आप को सभ्य दिखाने के लिए अंग्रेजी में वार्तालाप आवश्यक हो गया है। बच्चे आज नमस्ते और प्रणाम की जगह हाय, हेलो बोलने लगे हैं।

भारतीय कला और संस्कृति बहुत समृद्ध है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाषा, कला और संस्कृति से अटूट रूप से जुड़ी हुई है। हमारी संस्कृति हमारी भाषाओं में ही निहित है। किसी भी राष्ट्र की संस्कृति के संरक्षण संवर्धन और प्रसार के लिए उस संस्कृति की भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन बहुत आवश्यक है।

"नई शिक्षा नीति 2020 में इस तथ्य को स्वीकारा गया है। इसके अनुसार पिछले 50 वर्षों से 220 भाषाओं को समुचित देखभाल न देने के कारण खो दिया गया है। यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्त प्राय घोषित किया है इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएं है, वह भी कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना कर रही है। इस नीति में भारतीय भाषाओं के शिक्षण और अधिगम को स्कूल और उच्चतर शिक्षा के प्रत्येक स्तर के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। भाषाओं को प्रासंगिक और जीवंत बनाए रखने के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। भाषाओं को अधिक व्यापक रूप में बातचीत और शिक्षण अधिगम के लिए प्रयोग में लिये जाने की बात की गई हैं। इतना ही नहीं पांचवी कक्षा तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा या स्थानीय भाषा करने पर भी बल दिया गया है। तथा मातृभाषा को कक्षा आठ और आगे की शिक्षा के लिए प्राथमिकता देने का सुझाव भी है।"

वर्तमान परिस्थितियां ऐसी है जिसमें केवल ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में ही स्थानीय एवं क्षेत्रीय भाषा अधिकतर बोली जाती है। हर भाषा अपना एक विशेष स्थान रखती है। उसका अपना गौरव है, संस्कार है। भाषा का पिछड़ना अपने संस्कारों से पिछड़ने जैसा है, संस्कारों से दूर हो जाना है। हम अंग्रेजी को समाप्त करने के पक्ष में नहीं है, नाही अंग्रेजी से हमें कोई विरोध है। क्योंकि इस बात को नकारा नही जा सकता कि विश्व में आज अंग्रेजी भाषा का कितना प्रभाव है और यह कितनी आवश्यक है। विश्व के साथ जुड़े रहने के लिए यह भी जरूरी है। परंतु अंग्रेजी के साथ-साथ अपनी भाषाओं को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए। आधुनिकता का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने संस्कारो, मूल्यों, भाषाओं और संस्कृति को भूल जाए। बल्कि वास्तविक आधुनिकता वह है जिसमें हम अपनी संस्कृति, संस्कार, अपनी भाषा को साथ लेकर आगे बढ़े। उस पर गर्व करे। तथा विश्व में अपनी अलग पहचान को कायम रखे ।

ड़ा राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, "जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।"


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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