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व्यावहार में लाए बिना ज्ञान व्यर्थ है।

व्यावहार में लाए बिना ज्ञान व्यर्थ है।

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"ज्ञान समझदारी के बिना मूर्खता है, व्यवस्था के बिना व्यर्थ है, दया के बिना दीवानापन है तथा धर्म के बिना मृत्यु है।"-ली

एक बार की बात है भगवान बुद्ध एक गांव में डेरा डाले हुए थे। वह प्रतिदिन प्रवचन दिया करते थे। दूर-दूर से गांव के आसपास के लोग उन्हें सुनने आते थे। उनके प्रवचनों में एक तरह का प्रवाह था। तत्वज्ञान था। श्रोताओं में एक व्यक्ति ऐसा था जो बिना नागा किए प्रतिदिन भगवान बुद्ध के प्रवचन सुनने आता था। कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा, लेकिन उसने खुद में कोई बदलाव महसूस नहीं किया। एक दिन प्रवचन के पश्चात वह रुका और भगवान बुद्ध से अपने मन की बात कही ।

उसने कहा "भगवन मैं इतने दिनों से प्रतिदिन प्रवचन सुनने यहां आता हूं, इन प्रवचनों में जीवन का सार छुपा है, परन्तु मुझे स्वयं में कोई बदलाव महसूस नहीं हो रहा है।"

यह सुनकर बुद्ध मुस्कुराएं और बोले, "तुम कौन से गांव से आए हो।"

उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि, "मै पीपली गांव से आया हूं।"

फिर बुद्ध ने पूछा कि, "तुम्हारा गांव यहां से कितना दूर है।"

तो व्यक्ति ने जवाब दिया, "करीब आठ कोस।" 

बुद्ध ने फिर से पूछा, "तुम यहां से अपने गांव कैसे जाते हो।"

तो वह बोला कि, "मैं पैदल ही जाता हूं।"

बुद्ध ने कहा, "क्या यह संभव हो सकता है कि तुम यहां बैठे बैठे अपने गांव पहुंच जाओ?" 

उस व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा, "ऐसा कैसे संभव हो सकता है। मुझे तो वहां पैदल चलकर जाना पड़ेगा, बिना चले मैं वहां कैसे पहुंच सकता हूं?" 

तब बुद्ध ने कहा, "तुम्हारे प्रश्न का उत्तर स्वयं तुम्हारे पास ही है यदि तुम्हें अपने गांव का रास्ता पता है। उसकी जानकारी है, परंतु फिर भी बिना कोई, कार्य या प्रयत्न किए तुम वहां तक नहीं पहुंच सकते हैं। उसी तरह यदि तुम्हारे पास ज्ञान है तुम उसको अपने जीवन में जब तक प्रयोग में नहीं लाओगे तब तक तुम अपनेे अंदर बदलाव महसूस नहीं कर सकते। ज्ञान को अपने व्यवहार में प्रयोग में लाना बहुत आवश्यक है। कोरा ज्ञान व्यर्थ है।"

ज्ञान हमें उचित अनुचित का बोध कराता है तथा कार्य करने की क्षमता का विकास करता है। वास्तव में सच्चा ज्ञान व्यक्ति के जीवन को सफल और सुखी बनाने में पूर्ण सहयोग प्रदान करता है , परंतु यह तभी संभव है जब ज्ञान केवल सुना हुआ, प्राप्त किया हुआ ही नहीं हो, बल्कि व्यक्ति स्वयं अपने अनुभव के आधार पर भी खोज निकाले और उस अर्जित ज्ञान का जीवन में प्रयोग करें तभी उस ज्ञान से व्यक्ति की उन्नति और विकास संभव है। केवल ज्ञानार्जन से ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है बल्कि उसके प्रयोग से है। ज्ञान का प्रयोग करके ही व्यक्ति अपने भावी जीवन में आने वाली जटिल समस्याओं को आसानी से सुलझाने में सफल होता है। ज्ञान को साधन मानना ही उचित है परंतु उसे साध्य मानना अनुचित है। जिस ज्ञान से मानव का कल्याण ही ना हो वह व्यर्थ है।

वाइटहेड (whitehead ) के अनुसार, "केवल ज्ञानी व्यक्ति परमात्मा की पृथ्वी पर सबसे व्यर्थ का अभद्र मनुष्य होता है।"

यहां ज्ञान से अभिप्राय केवल विद्यालय में दी जाने वाले पुस्तकिय ज्ञान से ही नहीं बल्कि उस समस्त ज्ञान (सूचनाओं तथा जानकारी) से है जो व्यक्ति आजीवन देखकर, सुनकर तथा अपने अनुभव से प्राप्त करता है। इस अर्जित ज्ञान में कोई बुराई नहीं है, पर जब तक उसे जीवन में, व्यवहार में उपयोग में नहीं लाएंगे तो वह केवल सूचनाओं का संग्रह मात्र बनकर रह जाएगी। यह उसी प्रकार है जैसे 'आम' के बारे में सिर्फ सुनकर या देखकर उसके स्वाद का पता नहीं लगा सकते, इसके लिए 'आम' को चखना जरूरी है। गीता, भागवत, रामायण, वेद शास्त्र पढ़ते हैं, सुनते हैं और ज्ञान प्राप्त करते हैं लेकिन जब तक हम उसे अपने आचरण में नहीं लाते, उनमें लिखे सदाचार, नैतिकता, सत्य, मानवीय मूल्यों आदि को जीवन में उतारते नहीं तब तक वह ज्ञान नहीं मात्र सूचनाएं हैं। यह वास्तविक ज्ञान नहीं है। "कार्य को पोषण देने वाला ज्ञान ही वस्तुतः सच्चा ज्ञान है।

कोई भी ज्ञान तभी उपयोगी माना जाता है, जब हम जीवन में उसका उपयोग कर पाते हैं। जिस प्रकार लोहे का उपयोग ना होने पर उसमें जंग लग जाता है उसी प्रकार ज्ञान का उपयोग न किया जाए तो वह धीरे-धीरे क्षीण पड़ जाता है, इसलिए ज्ञान को कार्य रूप में परिणित करना आवश्यक है। ज्ञान का प्रयोग केवल अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए भी उपयोगी होना चाहिए।

"तुम्हारे ज्ञान की कीमत तुम्हारे कामों से होगी। सैकड़ों किताबें दिमाग में भर लेने से कुछ लाभ मिल सकता है। दिमाग में भरे हुए ज्ञान की कीमत उसके अनुसार किए गए काम के बराबर ही है बाकी का सब ज्ञान दिमाग के लिए व्यर्थ का बोझ है।"-महात्मा गांधी 

कई बार व्यक्ति को यह ज्ञान होता है कि क्या सही है क्या गलत है, न्याय-अन्याय, उचित -अनुचित का भेद पता होता है उसके बावजूद भी अपने घर ,परिवार, समाज में इससे संबंधित कोई घटना या परिस्थिति आती है तो वह निर्णय नहीं ले पाता। मूक दर्शक बन जाता है। सच का साथ देने से कतराता है। कई बार कुछ व्यक्ति समाज में भाषण, प्रवचन, व्याख्यानों के माध्यम से अपने ज्ञान का बढ़ चढ़कर प्रसार करतें हैं, प्रदर्शन करते हैं , लेकिन व्यवहार में जब कोई ऐसी परिस्थिति आती है तो वह विचलित हो जातें हैं। कभी कभी जानबूझ कर आगे नहीं आते कि 'हमें बीच में नहीं पड़ना '। 

स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, "बहुत गाल बजाने वाला और बहुत बड़ा आडंबर बनाने वाला पंडित नहीं होता पंडित वह है जो अपने ज्ञान और व्यवहार को एक रखता है।"

व्यक्ति को अपना ज्ञान सही समय पर सही फैसला लेकर, बिना किसी भेदभाव के पूर्ण निष्पक्षता के साथ उपयोग में लाना चाहिए। कई बार हो सकता है व्यक्ति को किसी विषय या घटना के बारे में कोई ज्ञान नहीं हो, किंतु ज्ञान होने के उपरांत भी यदि उचित अनुचित का निर्णय नहीं ले पाता, उस ज्ञान का व्यवहारिक उपयोग नहीं करता तो वह ज्ञान व्यर्थ है। इसलिए केवल ज्ञान का अर्जन पर्याप्त नहीं है बल्कि अपने अर्जित ज्ञान को अपने आचरण में लाना, प्रयोग करना, साथ ही साथ अपने ज्ञान से दूसरों की सहायता, मार्गदर्शन करना समाज के हित में कार्य करना भी आवश्यक है। इसी में ज्ञान की सार्थकता है। केवल ज्ञान का अर्जन व्यर्थ है। ज्ञान प्राप्त करने से अधिक महत्वपूर्ण है अलग-अलग प्रकार से उसको सोचना और उसका प्रयोग करना।

"जब तक ज्ञान को व्यवहार में नहीं लाते हैं, तब तक ज्ञान का कोई महत्व नहीं है।"-एंटोन चेखोव


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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