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जीवन का आनंद लें। वर्तमान में जीये

जीवन का आनंद लें। वर्तमान में जीये

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       "जीवन बहुत सरल है पर हम इसे मुश्किल बनाने में लगे रहते हैं।"-कन्फ्यूशियस

जीवन ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है। इसे पूरे आनन्द तथा संपूर्णता से जीना चाहिए। जीवन में परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहती। सुख-दुख, उतार चढ़ाव, मिलना बिछड़ना ये तो जीवन का हिस्सा है। प्रत्येक कार्य का एक समय निश्चित होता है। समय से पहले उसके लिए परेशान और चिंतित होने से कोई लाभ नहीं। हां, हम उसके लिए योजना बना सकते हैं, समाधान ढूंढ सकते हैं। परंतु उसे अपने ऊपर इतना भी हावी ना होने दें कि अपने आज को ही जी ना सकें। कभी भविष्य की चिंता, कभी अतीत की यादें, कभी वर्तमान का तनाव इसी में उलझे रहते हैं और जीवन का वास्तविक आनंद नहीं ले पाते। हालांकि ऐसा होना स्वाभाविक है। पर यही जीवन की वास्तविकता है। बिना संघर्ष और चुनौतियों के जीवन में क्या मज़ा है। जीवन किसी के लिए भी इतना आसान नहीं होता। यह तो गुलाब का बिछौना है, जिसमें कांटे तो होंगे ही। उन कांटों के बीच भी गुलाब अपनी खुबसूरती और खुशबू से महकता रहता है। इसी प्रकार हमें भी चुनौतियों, कठिनाइयों का सामना करते हुए जीवन की सुंदरता को महसूस करना होगा, उसका आनंद लेना होगा। जो पल गुजर गया वह वापस नहीं आ सकता। जरूरत से ज्यादा संभल संभल कर चलना, आने वाले डर से भयभीत रहना,

कठोर अनुशासित नियमों से जीवन को असहज बनाने से हम कभी उसका आनंद नहीं ले पायेंगे। बेब रूथ ने लिखा है," कभी ऐसा न हो कि हारने का डर तुम्हें खेलने से ही दूर कर दे।" चाहे जैसी परिस्थितियां हो उसका सामना धैर्य और सहजता से करें ,तो हम अपने आज का भी आनंद ले पायेंगे। बाद में हमारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचता। फिर हम ये सोच कर दुखी होते हैं कि काश उस वक्त,उस समय मैंने भी जीवन का आनंद लिया होता। वो सब कर लेता जो वास्तव में मैं करना चाहता था। क्यों इतना संभल संभल कर चला। एक कविता याद आती है जो कि प्रेम एस. गुर्जर की लिखी हुई है-

ज़रा सा बहक जाना चाहता हूं।

ज़रा सा बहक जाना चाहता हूं

यूं जीवन भर संभल संभल कर चलना,

मुझे अच्छा नहीं लगता।


मजबूरी है कि इतना गंभीर हूं, वरना

हंसना किसे अच्छा नहीं लगता ?


जीवन पथ है दुर्गम,

कांटो पर चलो तो मिलता है मुकाम,वरना

फूलों का हार किसे अच्छा नहीं लगता ?


एक बार गिर जाने दो मुझे,

यह ठोकर ही ले जायेगी आगे,वरना

संभल संभल कर चलना किसे अच्छा नहीं लगता ‌


अगर चलना ही मुकद्दर में है मेरे तो

बेशक चलूंगा,चलता ही रहूंगा,वरना

ज़रा सा ठहरना किसे अच्छा नहीं लगता ?


ज़रा सा बहक जाना चाहता हूं

यूं जीवन भर संभल संभल कर चलना

मुझे अच्छा नहीं लगता है।

 जीवन में मुश्किलें भी होगी, कांटे भी होंगे, रास्ते कठिन भी होंगे। उन्हें सहज और सहर्ष स्वीकार करने में ही जीवन की सार्थकता है। ठोकर भी लगेगी और गिरेंगे भी पर गिर कर संभलना और आगे बढ़ना ही जीवन का आनंद है। डी. एच. लारेंस ने लिखा है," जीवन जीने के लिए होता है , बचा कर रखने के लिए नहीं।" जीवन इतना गंभीर नहीं होता जितना कि हम उसे बना लेते हैं। जीवन में कितने भी प्रयास करें, कितनी भी कोशिश करें कुछ न कुछ बाकी रह ही जाता है। कुछ न कुछ छूट जाता है। मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं होता। कई बार किसी व्यक्ति के पास सब कुछ होता है फिर भी वह खुश नहीं होता,और अधिक पाने की लालसा बनी रहती है। जो है, उसका आनंद नहीं ले पाता। इसलिए जीवन जैसा भी है,जैसी भी परिस्थितियां हो, जीवन के हर पल का आनंद लें। 

"जीना दुनिया की सबसे नायाब चीज है। ज्यादातर लोग बस मौजूद रहते हैं।" -ऑस्कर वाइल्ड


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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