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जरूरतें एवं सपनों के बीच गुम होते जीवन के मायने

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नित जीवन के संघर्षों से

जब टूट चुका हो अंतर्मन ,

तब सुख के मिले समंदर का 

रह जाता कोई अर्थ नहीं।.   


जब फसल सूख कर जल के बिन 

तिनका तिनका बन गिर जाये, 

फिर होने वाली वर्षा का 

रह जाता कोई अर्थ नहीं।


संबंध कोई​ भी हों लेकिन 

यदि दुख में साथ न दें अपना,

फिर सुख में उन संबंधों का

रह जाता कोई अर्थ नहीं।


छोटी - छोटी खुशियों के क्षण

निकले जाते हैं रोज जहां​,

फिर सुख की नित्य प्रतिक्षा का 

रह जाता कोई अर्थ नहीं।


मन कटुवाणी से आहत हो

भीतर तक छलनी हो जाये,

फिर बाद कहे प्रिय वचनों का 

रह जाता कोई अर्थ नहीं।


सुख- साधन चाहे जितने हों 

पर काया रोगों का घर हो,

फिर उन अनगिनत सुविधाओं का 

रह जाता कोई अर्थ नहीं।   


राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर 

दिनकर जी की यह कविता मैंने पढ़ी तो बहुत बार है परंतु इसकी गहराई को शायद कभी समझ नहीं पाई। हम जीवन भर भागते रहते हैं उस कल को सुंदर बनाने के लिए जिसने हमसे हमारा आज, हमारा वर्तमान छीन लिया।हम सब जीवन में कोई न कोई सपना, कोई न कोई लक्ष्य अवश्य देखते हैं और उसे पूरा करने के लिए तन मन से प्रयास करते हैं। कड़ा परिश्रम करते हैं, रिश्ते-नाते, मौज मस्ती, नादानियां सब पीछे छूट जाते हैं। जो सामने है उसे जी नहींं पाते और उसको सफल और सुरक्षित बनाने निकल पड़ते है जो अभी आया ही नहीं है। हम यह भूल जाते हैं कि बीत रहा है वह अब इस जीवन में वापस नहीं आ सकता। जीवन भर भागते रहते हैं। अच्छी पढ़ाई करने का सपना, अच्छी नौकरी मिल जाए, अच्छे घर में शादी हो जाएं, बच्चे हो जाएं, आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाएं, बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी हो जाएं, यह सब पूरा करते करते हम उन सपनों को,उन खुशियों को जीना भूल जाते हैं जो कब के हमारे जीवन में आएं और चलें गये। उन सपनों ने हमारे जीवन में दस्तक दी थी लेकिन भविष्य के सपनों ने उनकी दस्तक को सुनने ही नहीं दिया। संघर्ष और कर्म तो निरंतर चलते रहेंगे, जब तक सांस चलती रहेगी। जीवन में जरूरतें कभी खत्म नहीं होती।

 गुलज़ार साहब ने लिखा है: 

"थोड़ा सुकून भी ढूंढिए जनाब, ये जरूरतें तो कभी खत्म नहीं होगी।"

हम अपने जीवन में कभी कभी इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने माता-पिता, साथियों, रिश्तेदारों से फोन पर भी बात करने का समय नहीं मिल पाता। हम यह भूल जाते हैं कि उन्हें हमारी जरूरत अभी है। आज मैं चाहकर भी बरसात के पानी में नाव नहीं चला सकती, भाई-बहनो के साथ रूठने मनाने का खेल नहीं खेल सकती, किसी चीज के लिए माता-पिता से हठ नहीं कर सकती, वो गलतियां, नादानियां, वो नासमझी मैं अब नहीं कर सकती जो मैंने संभाल कर रखी थी कि पहले कुछ बन जाऊं फिर करूंगी। आज जो मैं बनना चाहती थी बन गई, वह सब मेरे पास हैं जो मैंने चाहा था लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर अब वे गलतियां, नादानियां चाहकर भी नहीं कर सकती। अब आंसू भी आए तो उसे दिखाना नहीं है, छुपाना है क्योंकि अब मैं परिपक्व हो गई हूं। बचपन से ही समझदार बनने का शौक पाल रखा था पर अब वो बचपन वाली नासमझी अच्छी लगती है जो मैंने कभी की ही नहीं । वो समय अब वापस नहीं आ सकता। ना तो अब उम्र रही ना ही वह वक्त। अब वो चीजें मिल भी जाए तो कोई मायने नहीं रखती।  

गुलज़ार साहब की पंक्तिया याद आती है:

"ना जाने कब खर्च हो गए पता ही नहीं चला 

वो लम्हे जो बचा के रखें थे जीने के लिए।"

सपने देखना गलत नहीं है, आगे बढ़ना, सपनों को पूरा करना जीवन को सक्रिय बनाता है। जीवन में कुछ करने, कुछ बनने का अहसास ही जीवन को सार्थक बनाता है। सपने देखिए, बेहिसाब देखिए पर उनको पूरा करने के लिए जो आज हमारे पास है, उनको अनदेखा ना करें, स्थगित ना करें। आज मुझे ऐसा महसूस होता है कि जो भी हमें मिला है, जो भी हमारे पास है उसका शानदार ढंग से उपयोग करना,उसको जीना भी किसी सपने को पूरा होते हुए देखने से कम नहीं है। मुझे प्रेरणा देते हैं ऐसे लोग जो अपने आने वाले कल के लिए सपने भी देखते हैं, उन्हें पूरा करने का प्रयास भी करते हैं और साथ ही साथ अपने आज को भी शानदार ढंग से जीते है। एक संतुलन बनाए रखते हैं, अपने आज और आनेवाले कल में। यही जीवन की सार्थकता भी है। पानी की कीमत तभी पता चलती है जब आपको प्यास लगी हो, भोजन तभी अच्छा लगता है जब आपको भूख लगी हो, समय पर बरसात न हो तो फसल बेकार हो जाती है। जब जरूरत ही खत्म हो जाती है उसके बाद उन चीजों के मिलने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। असलियत में कल कभी नहीं आता। जब आएगा, अभी बनकर आएगा, आज बनकर आएगा। इसलिए वर्तमान को मजबूत बनाएं, वर्तमान को जीना होगा, फिर आनेवाला कल अपने आप बेहतर होगा।

"जीवन ना तो भविष्य मे है ना ही अतीत में है, जीवन तो केवल वर्तमान में है।"

इसलिए आज इस समय जो हमारे पास है उसे जी भर के जीने में ही समझदारी है। क्योंकि बीता हुआ समय वापस नहीं आ सकता। बाद में वह चीजें, वह पल हमें मिल भी जाए, तो हो सकता है हमें उनकी जरूरत ही ना हों। उनका मिलना हमारे जीवन में कोई अर्थ ही न रखें। किसी भी वस्तु की असली कीमत तभी पता चलती है जब वह समय पर मिल जाए जब हमें उनकी जरूरत हो। किसी ने बहुत खूब लिखा है:

"अब उस मुकाम पे आ गई है जिंदगी जहां,

मुझे कुछ चीजें पसंद तो है पर चाहिए नहीं।"

इसलिए अपने आज को भी जी भर कर जिएं ।साथ ही आनेवाले भविष्य के सपने भीे देखे और उन्हें पूरा करने का प्रयास भी करें।

सुयश के पीछे नहीं दौड़ना, धन के पीछे नहीं दौड़ना जो मिला सो मेरा, जो नहीं मिला वह किसी अधिकारी मानव - बंधु का है। -श्री रामधारी सिंह दिनकर


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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