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मां, मातृ दिवस विशेष

मां, मातृ दिवस विशेष

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"कैसे पढ़ लेती है मेरे सारे गम तू ,

तू तो अनपढ़ थी ना मां ।" -गुलजार

करुणा जल्दी-जल्दी रसोई का काम निपटा रही थी। उसकी एक आंख घड़ी पर ही टिकी थी। एक बजते ही दोनों बच्चे भूख भूख चिल्लाने लगेंगे। एक बजे तक उनकी ऑनलाइन क्लासेस चलती थी। जब से स्कूल बंद हुए हैं करुणा का तो काम और भी बढ़ गया था। बच्चों की फरमाइशें पूरी करते करते थक कर चूर हो जाती थी। बड़ा बेटा 9th में और छोटी बेटी 7th में है लेकिन मजाल है कि वह कोई काम खुद कर ले। करुणा हमेशा समझाती थी कि थोड़ा बहुत काम खुद करने की आदत डालो, पर बच्चे एक न सुनते। यहां तक कि उन्हें बैठे-बैठे पानी भी करुणा को ही देना पड़ता था। वह प्यासे बैठे रहते आखिर झक मारकर करुणा को ही उठ कर उन्हें पानी पकड़ाना पड़ता था। यहां तक की क्लास के समय उनकी किताबें, पैन, पेंसिल भी करूणा ही उन्हें लाकर देती और वहीं वापस क्लास खत्म होने के बाद रखती। कभी-कभी तो वह इतना थक जाती कि रोने लगती। उसने पति सौरभ से भी उसकी शिकायत की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मन ही मन बड़बड़ाती रहती और अपना काम करती रहती यही उसकी दिनचर्या बन गई थी।

एक दिन दोपहर को अचानक सौरभ घर जल्दी आ गया। उसे बुखार जैसा लग रहा था। दो-तीन दिन तक जब बुखार नहीं उतरा तो उसने टेस्ट करवाया वह कोरोना पॉजिटिव आया। तब करुणा ने घर के सभी सदस्यों का टेस्ट करवाया। शुक्र था कि बच्चों की रिपोर्ट नेगेटिव थी लेकिन करूणा कोरोना पॉजिटिव आई, सो दोनों पति-पत्नी एक अलग कमरे मे क्वारंटाइन हो गए। करुणा का रो-रो कर बुरा हाल था। उसे कोरोना होने का इतना दुख नहीं था जितनी चिंता इस बात की थी कि अब उसके बच्चों का क्या होगा। कौन उनके बच्चों को खाना देगा, पानी देगा। उनका काम कौन करेगा। उसके कमरे में एक कांच की खिड़की थी जिसमें से वह बाहर देखती रहती थी। अपने बच्चों को खुद काम करता देख उसका कलेजा फटा जा रहा था। अपने आप कोई कपड़े धो रहा था, कोई मैगी बना रहा था, अपने आप पानी लेकर के पी रहा था।अपने बच्चों को इस तरह काम करता देखकर करुणा बेचैन हो रही थी। उसके आंसू रुक नहीं रहे थे। अपनी सारी चिंता छोड़कर बस वह खिड़की के पास उन्हें निहारती और रोती रहती ।अपने आपको कोसती कि वही कहती थी कि अपना काम खुद करो , अपने बच्चों को रोज वही भला-बुरा कहती थी।" मैने ही अपने बच्चों को मुसीबत में डाला है।" दिन-रात यही बड़बड़ाती खिड़की के पास रोती रहती। सौरभ ने उसे खूब समझाया पर वह कहां रुकने वाली थी। आखिर एक दिन सौरभ के सब्र का बांध टूट गया उसने गुस्से में झल्लाते हुए कहा, " आखिर तुम चाहती क्या हो, पहले तुम खुद शिकायत करती थी कि वह अपना काम खुद नहीं करते। अब कर रहे हैं , सीख रहे हैं तो तुम्हें उसमें भी परेशानी। तुम पागल तो नहीं हो गई हो।" करुणा ने रोते-रोते जवाब दिया, " नहीं सिखाना मुझे काम मेरे बच्चों को। जब तक मैं जिंदा हूं कोई जरूरत नहीं मेरे बच्चों को काम करने की। आप रहने दो ,आप नहीं समझोगे यह सब बातें।" गुस्से में सौरभ ने कहा ," हां मुझ में इतना दिमाग नहीं कि मैं तुम्हारी बातों को समझ सकूं।"

सच में मां की ममता को कोई नहीं समझ सकता, उसके लिए दिमाग की नहीं दिल की जरूरत होती है। कोई क्या समझे एक मां के दिल को। एक मां अपने बच्चें पर गुस्सा भी करती है तो उसके पीछे भी बच्चे का भला ही छुपा होता है। मां की ममता और प्रेम छुपा होता है । मां कभी भी अपने बच्चे का बुरा नहीं चाहती। वह अपनी सब तकलीफ भूल कर अपने बच्चे के सुख की ही दुआ करती है। ऐसा त्याग एक मां ही कर सकती है। मां बिना कुछ कहे औलाद के दर्द को महसूस कर लेती है। निदा फ़ाज़ली ने लिखा है,

 "मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार।

दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार।"

बच्चा मां से चाहे कितनी भी दूर रह रहा हो अगर बच्चे को कोई तकलीफ है तो मां सिहर उठती है। वो महसूस कर लेती है अपने बच्चों के तकलीफ को। इस दुनिया में आने से पहले ही वह अपने बच्चे के सपने देखने लग जाती है। जिस मां ने हमें बोलना सिखाया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया बड़े होने के बाद उसी मां को जब बच्चे कहते हैं, "आप रहने दो, आप नहीं समझोगे।" उस मां के मन पर क्या बीतती होगी। अपनी सफलता और कामयाबी को हासिल करने में कभी कभी बच्चे इतना आगे निकल जाते हैं कि मां पीछे रह जाती है। वह अपने बच्चे की एक मुस्कान के लिए, उसे देखने के लिए तरस जाती है। वो बदले में अपने बच्चों से कुछ नहीं चाहती। अपने बच्चों की एक मुस्कान ही काफ़ी है उसके लिए। आज की इस व्यस्त जीवन शैली में हर दिन एक छोटी सी प्यारी सी मुस्कान तो अपनी मां को दें ही सकते हैं।

  "हैप्पी मदर्स डे"

"खुदा के दर पर सब ने अपने हिस्से की खुशियां मांगी,

  पर मां ने फिर से अपने औलाद की दुआ ही मांगी।"


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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