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मृत्युभोज या मृत्युबोझ? एक अवांछनीय सामाजिक बुराई

मृत्युभोज या मृत्युबोझ? एक अवांछनीय सामाजिक बुराई

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जब समुदाय विशेष में अनेक व्यक्ति एक साथ एक ही तरह के उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रयत्न करते है तो वह एक सामूहिक घटना होती हैं जिसे जनरीति कहते हैं। यह जनरीति एक पीढी से दूसरी पीढी हस्तान्तरित होती हैं। इस हस्तान्तरण की प्रकिया में समूह की अधिकाधिक अभिमति प्राप्त होती हैं। क्योंकी प्रत्येक पीढी का सफल अनुभव इसे और भी दृढ बना देता हैं।

कभी कभी हम इन रीतियों का पालन कानून के समान करने लग जाते हैं। क्योंकी हमें भय होता हे समाज का, हमें भय होता हे लोक नींदा का और भय होता हे सामाजिक बहिष्कार का। सामान्यतः इसे हम इसलिए भी स्वीकृत करते क्योंकि अधिकतर लोग बहुत दिनों से इसी विधि के अनुसार कार्य करते आ रहे हैं। चूंकि यह रीतियाँ, रूढिवादिता, अंधविश्वास से युक्त हे, इस कारण इसे सरलता से बदला नहीं जा सकता हैं।

यद्यपि विशाल देश भारत की पहचान अनेकता में एकता हे, फिर भी अनेकता में एकता अनेक समस्याओं कि जननी भी हैं। इनमें प्रमुखतया कुछ सामाजिक समस्याएँ ऐसी भी हे जो जीवन के विकास क्रम को एक पीढी पीछे धकेल देती हैं। इसी सामाजिक समस्याओं में मृत्युभोज भी वह सामाजिक समस्या हे जो कि परम्परा के रूप में आ रही हे जिसमे व्यक्ति को एक तरफ तो आडम्बरों का शिकार तो होना ही पडता वहीं दूसरी तरफ प्रियजनों को खोने का दुःख, जिस वजह से यह परम्परा मृत्यू भोज न होकर मृत्युबोझ बन कर दंड बन जाती हैं।

सामान्य रुप से माने तो ऐसी सामाजिक समस्याएँ लम्बे समय के सामाजिक, सांस्कृतिक परम्पराओं के माध्यम से विकसित होकर वर्तमान समय में भी जारी हैं। जिसमें बहुत ज्यादा धन खर्च करने की मांग समुदाय विशेष के द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं। उच्चवर्ग का व्यक्ति सम्पन्नता दिखाने के लिए इस मांग को स्वीकृत कर लेता हैं। वहीं मध्यम वर्ग के साधारण परिवार अंत समय तक इस सम्बन्ध में कर्ज ही चुका रहे होते हैं। हालात यह हो जाते हे कि न तो वे मौत को भूलते है न ही कर्ज चुकाने की परम्परा को। निम्न वर्ग का व्यक्ति तो मौत को भूलकर कर्ज तले आने वाली समस्याओं पर शोक मनाता रहता हैं। परिस्थिति वश सामाजिक तौर पर सामाजिक दबाव बनाते हुए इस परम्परा को जबरदस्ती अपनाने के लिए जोर दिया जाता हे और यह परम्परा नहीं अपनाने पर या तो समाज का या फिर पाप पूण्य का डर बैठाया जाता है, जिसमें मजबुरी वश होकर परिवार वालों को यह बात माननी ही पडती हैं

अधिकांश घरों में तो मृत्युभोज परम्परा के नाम पर हालत ऐसे हो जाते हे कि निर्धन परिवार, मृत व्यक्ति से ज्यादा मृत्युभोज पर होने वाले खर्च को सोच, सोचकर बारह दिनों में और भी ज्यादा शोक मनाने लग जाता हैं। सामाजिक मर्यादा और सामाजिक समस्याओं को सामाजिक परम्पराओं का आवरण देकर सुशिक्षित, सुव्यवस्थित समाज, सुनियोजित क्रमबद्ध ढंग से अंधविश्वास और रुढिवादी परम्परा को सुनियोजित ढंग से निभाते हैं। और इसे निभाने में स्वयं को समृद्ध बताते हैं। दूसरे शब्दो में कहें तो कहीं न कहीं धनीक वर्ग धार्मिक व सामाजिक परम्परा व मर्यादा के नाम पर, इसमें मिथ्या प्रशंसा के भागीदार भी बनते हैं। मृत्युभोज को बडे पैमाने पर आयोजित कर के महोत्सव का रुप दिया जाता हैं। और विशाल जनसमुदाय जुटाया जाता हैं। समस्याओं का सैलाब तो जब आता हे जब किसी बीमारी से व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तब एक तरफा तो इलाज करवाने वाले खर्चो के नाम से परिवार जहाँ धन के सम्बन्ध में खोखला हो जाता हैं। धन, जेवर, जमीन तक गिरवी रख दिए जाते हे, वहीं दूसरी तरफ रिश्तेदार द्वारा ही हाथ खींच लिए जाते है। ऐसी स्थिती में मृत व्यक्ति का मृत्युभोज निर्धन की मार और कमर तोडने के समान हो जाता हैं।

शर्मनाक बात तो तब उजागर होती हे जब अगर मरने वाला व्यक्ति किसी विशेष प्रकार के नशे का शौकिन हो तब मृत्युपरान्त उसके लिए अच्छी किस्म का नशा दान करके श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। कभी कभी तो विशेष जगहों पर बारह दिन की प्रक्रिया को शोक का रुप देकर विशेष प्रकार के नशे को यथा शराब, अफिम, गांजा, बीडी, सिगरेट, तम्बाकु इत्यादि को मेहमान नवाजी के तौर पर प्रस्तुत किया जाता हैं। यदि इस परम्परा का विरोध किया जाए तो समाज के ही पद प्रतिष्ठित व्यक्ति या तो उस परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर देंगे या फिर वहीं परिवार गाँव के बाहर निष्कासित कर दिया जाएगा। खर्चो का दोर यहीं नहीं थमता हे वर्ष भर आने वाले कुछ विशेष मौको पर उस व्यक्ति विशेष के नाम का आधार ले कर खुल कर दान किया जाता हे जिसके लिए वह व्यक्ति जीवन भर वंचित रहता हैं

सामान्य रूप से देखा जाए तो सामाजिक परम्परा के नाम पर यह सामाजिक समस्या, झुठी शान, रूढिवादिता के फलस्वरूप अनावश्यक धन की बर्बादी हैं। यदि हम एक प्रकार से सोचे तो अगर हम भोजन कर रहे हे तो सिर्फ हमारा ही पेट भरेगा न की दूसरे का। ठिक वैसे ही यदि हम मृत व्यक्ति के नाम का भोजन किसी और को कराएगें तो क्या मृत व्यक्ति को मिलेगा? नहीं, संभव ही नही हे यह मात्र एक अंधविश्वास हैं। जिसे हम सामाजिक परम्परा के नाम पर रूढिवादिता की वजह से निभाते आ रहे हैं।

उत्तरप्रदेश के अलीगढ जिले के विकास खंड धनीपुर इलाके में किया गया एक जन आन्दोलन मृत्युभोज के खिलाफ कडा प्रहार हैं। तीन दर्जन से ज्यादा गाँवों में लोग इस प्रथा को स्वयं ही खत्म कर देना चाहते हैं। वे शपथ ले रहे हे कि न तो वे मृत्यु भोज खाएगें न खिलाएगें। इसके खिलाफ अधिकांशतय जनजातिय इलाको में कडा कानून भी बनाया गया हैं। सरकार को भी चाहिए की इसके खिलाफ कडा कानून का निर्माण करें।साथ ही समाज के नागरिकों का भी उत्तरदायित्व हे कि वे जागरूक बन कर इस समस्या को खत्म करें।


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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