X
नारी कोमल है कमजोर नहीं

नारी कोमल है कमजोर नहीं

584 views Save

"नारी के बिना पुरुष का बचपन असहाय है, युवावस्था सुख रहित है और बुढ़ापा सांत्वना देने वाले सच्चे और वफादार साथी से रहित है।"- जौन


नारी सृष्टि का एक अनमोल उपहार है। समाज का एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है। समाज की धुरी है।सभ्य एवं सशक्त समाज के निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है। यह सही है कि आज महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में अपनी बुद्धि, कार्यकुशलता एवं क्षमताओं का परचम लहरा रही है। आज पहले की तुलना में महिलाएं अधिक सजग, शिक्षित, आत्मनिर्भर एवं सक्षम है और सभी क्षेत्रों में पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। राजनीतिक, सामाजिक , आर्थिक ,खेल जगत, फिल्म जगत ,या विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों​ में महिलाओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज की है। महिलाएं अबला नहीं हैं।

महात्मा गांधी के शब्दों में, "नारी को अबला कहना उसका अपमान करना है।" वह सशक्त हैं। शक्तिशाली हैं, अपने मन से, विचारों से , कर्मों से और अपने हौसले से। बस उसे एक सुरक्षित वातावरण चाहिए जिसमें वह निर्भय होकर आगे बढ़ सके। जी. डी. एंडरसन ने लिखा है, "नारीवाद महिलाओं को सशक्त करने की विचारधारा नहीं है। महिलाएं तो है ही सशक्त। यह तो दुनिया का नजरिया बदलने की पहल है।" जिस मजबूती से महिलाएं आज आगे बढ़ रही है उसके बावजूद भी उनके प्रति होने वाले अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। शारीरिक तथा यौनशोषण, दुष्कर्म, भ्रूणहत्या, भेदभाव, दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा सभी समाज में बड़ी संख्या में बढ़ रहें है। इन सभी यातनाओं और पीड़ाओं को झेलती हुई महिलाएं आगे बढ़ रही है, उनका जज्बा कम नहीं हुआ है। परंतु इन सभी अपराधों, अत्याचारों के बावजूद एक अपराध ऐसा है जिसकी तरफ अधिकतर हमारा ध्यान नहीं जाता या महिलाए स्वयं इससे अनभिज्ञ रहती है।

कई बार वे यह समझ ही नहीं पाती है कि उनके साथ जो हो रहा है वह एक तरह से अपराध है, और वह है - मानसिक प्रताड़ना, मानसिक अत्याचार। मानसिक क्रूरता को परिभाषित करना कठिन है क्योंकि प्रत्येक महिला की मानसिक परिस्थितियां अलग-अलग होती है। इसका कोई निश्चित पैमाना नहीं है। महिलाओं पर लगातार आरोप लगाना, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना, उन्हें अपने पसंद से नौकरी न करने देना, पढ़ाई लिखाई छुड़वा देना, कहीं आने-जाने पर रोक लगाना, उन्हें आगे बढ़ने से रोकना, उनकी अवहेलना करना, छोटी-छोटी बातों पर उन्हें बेइज्जत करना आदि अलग-अलग प्रकार की परिस्थितियों से अधिकतर महिलाओं को गुजरना पड़ता है। यह एक ऐसी क्रूरता है जो अधिकतर महिलाएं छुपाती है। वह अपनी मानसिक स्थिति को किसी के सामने कहने से डरती है। उनकी भावनाओं को किसी ना किसी तरह से आहत किया जाता है। मानसिक अत्याचार शारीरिक अत्याचार से भी अधिक गहरा और घातक है। 

"नारी शारीरिक रूप से कमजोर नहीं होती हैं, इन्हें मानसिक रूप से कमजोर पुरुष समाज ने बनाया है।"

अधिकतर शिक्षित, संभ्रांत परिवार की महिलाएं अपने परिवार एवं बच्चों की भलाई तथा घर, परिवार में शांति बनाए रखने के लिए अपने दर्द को अभिव्यक्त नहीं करती। और यदि कोई महिला अपने साथ हुए इन अत्याचारों को अभिव्यक्त करती है तो उसे ही गलत समझा जाता है। "अच्छा खानदान है, पैसा है, जमीन जायदाद है, पति भी ऊंचे पद पर है, फिर भी पता नहीं इसे क्या चाहिए, इसी में ही खोट है।" अक्सर ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं। इसलिए महिलाएं अधिकतर अपनी मनोदशा व्यक्त नहीं कर पाती।

इसका एक कारण यह भी है कि बचपन से ही अधिकतर महिलाएं अपने घर में अपनी मां एवं अन्य स्त्रियों को ऐसे ही माहौल में प्रताड़ित होते हुए देखती है और ऐसे ही वातावरण में बड़ी होती है। इसलिए वह भी इस प्रकार की मानसिक क्रूरता की आदी हो जाती है। वह इसी में संतुष्ट रहती है कि कम से कम उनके साथ कोई मारपीट नहीं होती। शारीरिक प्रताड़ना, चोट के निशान दिखाई दे जाते हैं, लेकिन मन के घाव दिखाई नहीं देते। उनका कोई साक्षी नहीं होता। ऐसी मानसिक प्रताड़ना को झेलते झेलते वह कुंठा, मानसिक अवसाद, तनाव की शिकार हो जाती है। केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही काफी नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण है। महिलाओं के ऊपर घर-परिवार, बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी होती है और जो महिलाएं नौकरी करती है ऐसे में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ और प्रसन्न रहें। केवल घरेलू महिलाएं ही नहीं नौकरी करने वाली पढ़ी-लिखी महिलाएं भी इस मानसिक प्रताड़ना का शिकार होती हैं। कई बार इसके कारण योग्य और होनहार महिलाओं पर इसका इतना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है कि वह सब कुछ छोड़ छाड़ कर घर की चारदीवारी में ही कैद हो जाती है। उसका आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है।

असल में आधुनिक दृष्टिकोण रखने वाला और शिक्षित पुरुष प्रधान समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो स्त्री का समर्थन तो करता है , लेकिन वास्तव में उसकी सफलता ऐसे समाज को स्वीकार नही होती। उनके अहम को ठेस पहुंचती है। परिवार एवं समाज में स्त्री का अपने बराबर कदम से कदम मिलाकर चलना कहीं ना कहीं कुछ लोगों को रास नहीं आता, पर क्योंकि वह समाज में अपने आप को आधुनिक एवं संभ्रांत दिखाना चाहते हैं इसलिए​वह अपनी कुंठा को प्रत्यक्ष रूप से उजागर ना करके स्त्री को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। उसे कमजोर बनाने का प्रयास करते हैं। समाज में स्त्री पुरुष दोनों का स्थान समान है। दोनों एक ही रथ के दो पहिए हैं। पुरूषों की आंखों में, मन में नारी के लिए सम्मान होना चाहिए। उसकी सफलता पर गर्व करना चाहिए।

"नारी पुरुष की गुलाम नहीं, सहधर्मिणी, मित्र, अर्धांगिनी (पत्नी ) है।" -महात्मा गांधी

 यह बहुत आवश्यक है कि महिलाएं अपना आत्मविश्वास, आत्मबल बढ़ाएं और ऐसी किसी भी मानसिक प्रताड़ना को अपने ऊपर हावी ना होने दें। सबसे पहले उन्हें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि आपसी मतभेद, विचारों का टकराव और मानसिक प्रताड़ना में फर्क होता है। अपने खिलाफ होने वाले अत्याचार​ पर आवाज़ उठाएं। महिलाओं को स्वयं अपने लिए तथा एक दूसरे के लिए आगे आना होगा। क्योंकि कई बाहर महिलाएं स्वयं भी दूसरी महिलाओं के प्रति इस तरह की क्रूरता में शामिल होती है। जब एक महिला दूसरे महिला के दर्द, मानसिक स्थिति को समझेंगी, उसका सहयोग करेगी तभी पुरुषों की भी महिलाओं के प्रति धारणा बदलेगी। चुपचाप अत्याचार सहन करना समस्या का समाधान नहीं होता। नोरा एफ्रान के शब्दों में, "हर चीज से बढ़कर, अपने जीवन की नायिका बनिए शिकार नहीं।" एक महिला जब शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक रूप से स्वस्थ और सक्षम होगी तभी वह घर, परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति में महत्वपूर्ण और सकारात्मक भूमिका निभा सकेंगी।

"स्त्री पुरुष की सहचरी है। उसकी मानसिक शक्तियां पुरुष से जरा भी कम नहीं है।"।- महात्मा गांधी


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

584 views

Recent Articles