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पिछला साल क्या दे गया?

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साथी, नया वर्ष आया है।

वर्ष पुराना ले अब जाता,

कुछ प्रसन्न सा, कुछ पछताता

दे जी भर आशीष ,बहुत ही,

इससे तूने दुख पाया है।

साथी नया वर्ष आया है!

उठ इसका स्वागत करने को

स्नेह बाहुओं में भरने को,

नये साल के लिए देख ,

यह नई वेदनाए लाया है।

साथी नया वर्ष आया है!

उठ , ओ पीड़ा के मतवाले,

ले ये तीक्ष्ण -तिक्त -कटु प्याले,

ऐसे ही प्यालों का गुण तो

तूने जीवन भर गाया है।

साथी नया वर्ष आया है!

(डॉ हरिवंश राय बच्चन)

नव वर्ष की आप सबको बहुत बहुत शुभकामनाएं। आखिर वर्ष 2020 समाप्त हो गया। बहुत बेसब्री से इंतजार था सबको कि ये साल खत्म हो। सभी के जीवन में किसी न किसी तरह की उथल-पुथल रही। हालांकि सुख दुःख जीवन का हिस्सा है। समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। प्रत्येक वर्ष हम पुराने वर्ष को विदाई देते हैं और नव वर्ष का स्वागत करते हैं। पुराने वर्ष का जाना और नये वर्ष का आना यह सिखाता है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। जिंदगी निरंतर चलती रहती है, और चलती रहेगी जब तक सांस चलती रहेगी। जो बीत चुका है उससे हमें सीख लेनी है कि हम अपने आज को बेहतर बना सकें और आने वाले कल के लिए आशा करें। साल भले ही पीछे छूट गया लेकिन अपनों का स्नेह, उनका साथ हमेशा संग रहना चाहिए।नए साल में तभी कुछ बदल सकता है,जब हम अपनी सोच बदलेंगे।

हर जाता हुआ पल,समय हमें कुछ न कुछ दे कर जाता है, चाहे सुख हो, दुख हो, खुशियां हो या फिर सबक। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे किस रूप में देखते हैं। जीवन में सीख अनुभवों से ही मिलती है। जीवन में जो कुछ होता है अच्छे के लिए ही होता है। बुरा वक्त इस लिए आता है कि हम अच्छे वक्त की किमत जान सकें। जीवन में आशावादी होना कई समस्याओं का समाधान अपने आप ही निकाल देता है।

"एक आशावान व्यक्ति नए साल को देखने के लिए आधी रात तक जागता है वही निराशावादी व्यक्ति पुराने साल के जाने को सुनिश्चित करने के लिए जगता रहता है।" -बिल वान

कोरोनावायरस और उसके कारण हुए लॉकडाउन ने पूरे विश्व को प्रभावित किया है। दौड़ती भागती जिंदगी अचानक थम सी गई।सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया। शहर, मोहल्ले, गलियां सूने हो गए।लोग ड़रे सहमे जी रहे थे। फिर इसमें एक आशा की किरण नजर आई। चाहें सामाजिक दुरियां रखनी थी लेकिन अंदर से वह जुड़ रहे थे। जहां तेजी से दौड़ती इस जिंदगी में हर कोई भाग रहा था वहीं अब उन्हें अवसर मिल रहा था अपनों के साथ न सिर्फ रहने का बल्कि उनको समझने का, उनकी भावनाओं से जुडने का। जहां माता-पिता दोनों नौकरी करते थे वे समय के अभाव के कारण बच्चों को समय नहीं दें पाते थे लेकिन अब उन्हें अवसर मिला कि वे अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता सकें। लोगो के ऐसे बहुत से शौक थे, प्रतिभाएं थी जिसे समय के अभाव में पूरा नहीं कर पाएं उन्हें अब इन्हें पूरा करने का मौका मिला। चाहे अंदर से हम ड़रे हुए थे, पर टूटे नहीं। अपना आत्मविश्वास बनाए रखा, संयम बनाए रखा।और इस कठिन समय में सकारात्मक सोच रखते हुए हमने समय का सदुपयोग किया। इस बुरे समय में हमें यह सिख मिली कि जीवन में विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए हमेशा शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। इस समय ने जीवन में अच्छी आदतों का महत्व समझाया। अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया।

इससे पहले​ हम ऐसी जीवनशैली जीते थे जो दूसरों को प्रभावित अधिक करती थी। खुश रहने से ज्यादा जरुरी खुश दिखना था। लोगों के पास इतना भी वक्त नहीं था कि वह यह सोचें कि उन्हें इस दौड़ में कहां तक जाना है। बुजुर्ग घर में अकेले राह तकते, बच्चें अपनी अलग दुनिया में मस्त थे। बड़े अपनी कामयाबी का जश्न मनाने में व्यस्त रहे, अपनी महत्वाकांक्षाओं को साकार करने में लगे थे। किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं था। अच्छे कपड़े, आधुनिक भौतिक सुविधाएं, सामाजिक आयोजन, पार्टी येें सब समाज में अपनी उत्कृष्टता स्थापित करने के लिए आवश्यक हो गया था इसके लिए घर के खर्चों में चाहें कटौती करनी पड़े, बुजुर्गों​ को अनदेखा करना पड़े। लेकिन समाज में अपने आप को सक्षम दिखाना जरूरी था। ऐसा लगता कि हम अपने लिए नहीं जी रहे बल्कि दूसरों को दिखाने के लिए जी रहे हैं।

परंतु जब लॉकडाउन की स्थिति हुई, तब धीरे धीरे महसूस होने लगा कि इन सब भौतिक सुख सुविधाओं का कोई मोल नहीं। जीवन बिना दिखावे के, सादगी से भी जिया जा सकता है। ना बाहर घूमने जाना, ना होटलों में खाना खाने जाना, न किसी समारोह और पार्टी में जाना, ना ही फैशन वाले कपड़े पहन कर दिखावा करना। हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं परंतु किसी भी चीज़ की अति अच्छी नहीं है। हम अपना जीवन अपने लिए जिएं ना कि दूसरों को दिखाने के लिए। लॉकडाउन में सही मायनों में हमने ऐसा जीवन जिया जैसा वास्तव में हम जीना चाहते थे जिसमें कोई दिखावा नहीं था। अपने परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मिला, अपना काम स्वयं करने का अनुभव मिला। परिवार के लोग एक-दूसरे के अधिक करीब आएं। भावनात्मक रूप से मजबूत बने। और जो लोग परिवार से दूर फंसे हुए थे वे भी सही मायनों में अपनो की अहमियत को समझे। अपने संयम और धीरज को पहचानने तथा उसे मजबूत बनाने का यह अवसर था। केवल धन से किसी का जीवन बचाने की कोई गारंटी नहीं है लेकिन अपनों का प्यार, साथ और दुआएं जीने का हौसला जरूर बढ़ा सकते हैं।

यह वर्ष सभी के लिए किसी न किसी तरह से खराब रहा है। काम धंधे प्रभावित हुए हैं, कईयों ने कोरोना से अपने अपनों को खोया हैं। सामाजिक, आर्थिक, व्यक्तिगत सभी तरह से जीवन प्रभावित हुआ है। फिर भी नकारात्मकता को छोड़ कर हम आगे बढ़े हैं। बुराई में से अच्छाई को स्वीकारा है।

हाल बोलैरड़ ने लिखा है, "साल का अंत न तो अंत है और न ही शुरूआत, बल्कि यह तो अपने अनुभव से मिलने वाले विवेक के साथ आगे बढ़ते जाने का समय है।"

इस साल ने जाते जाते हमें जो भावनात्मक मजबूती दी है, अपनेपन का अहसास कराया है, जो अनुभव दिए हैं, दृढ़ता दी है, उन्हें अपनी ताकत बनाना है। और नए जोश ,नए उत्साह के साथ नव वर्ष का स्वागत करना है जैसा कि

डॉ हरिवंश राय बच्चन जी ने लिखा है-

नव वर्ष , हर्ष नव

जीवन उत्कर्ष नव ।

नव उमंग, नव तरंग

जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह ,नवल राह

जीवन का नव प्रभाव ।

गीत नवल, प्रीति नवल

जीवन की रीति, नवल

जीवन की नीति नवल

जीवन की जीत नवल।

नव वर्ष आप सबके लिए मंगलमय हो, आप सुरक्षित रहे, स्वस्थ रहें और अपनो के साथ रहें।

Happy New Year!!!


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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