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तीसरी कक्षा उतीर्ण पद्मश्री हलधर नाग: बाल मजदुर से कवि एवं लेखक का सफर

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"एक बाल मजदूर, हलधर नाग की पद्मश्री प्राप्त करने की काव्यात्मक यात्रा, यह है कवि हलधर नाग, जो यह कहते हे कि साहब दिल्ली जाने के लिए पैसे नहीं हैं, कृपया पुरस्कार डाक से भिजवां दिजिएं।"


"जीवन संघर्षो से भरा हुआ है, संघर्षमय जीवन को भी हम सरलता से जीते है तो जीवन जीना आसान हो जाएगा। " - हलधर नाग

संघर्षरत बचपन, जब पिता की मृत्यु के बाद क्लास 3 के बाद ही स्कूल छोड़ना पड़ा। घर की तंगी के चलते मिठाई की दुकान पर बालमजदूर की तरह बर्तन धोने पड़े। लेकिन आज इन के जीवन एवं काव्य पर 5 पीएचडी हो चुकी हैं। इनको भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्म श्री पुरुस्कार से भी सम्मानित किया जा चूका है। हम बात कर रहे हैं "लोक कविरत्न" हलधर नाग जो की कोसली भाषा के कवि है एवं जिन्हे अपनी लिखे 20 महाकाव्य और अपनी समस्त कविताएं कंठस्थ याद हैं। संभलपुर विश्वविद्यालय ने अब उनके लेखन संग्रह 'हलधर ग्रंथावली-2' को पाठ्यक्रम में शामिल भी कर लिया है। 

हलधर का जन्म 1950 में ओडिशा के बारगढ़ में एक गरीब परिवार में हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक मिठाई की दुकान में काम करने के दो साल के पश्चात अगले 16 साल तक गाँव पास ही के एक स्कूल में खाना पकाने का कार्य किया। उसके बाद बढ़ते विद्यालयों की संख्या को देखते हुए उन्होंने एक बैंक से 1000 रुपये का ऋण ले कर स्टेशनरी और खाने-पीने की एक छोटी सी दुकान शुरू करी। पद्म श्री हलधर नाग केवल ओडिशा में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में एक प्रसिद्ध व्यक्ति, ओडीसा के कोसली भासा के कवि, एवं लेखक हैं। नाग एक कवि हैं और उनकी कविताएकोसली भाषा में लिखी जाती हैं (जिसे संबलपुरी के नाम से भी जाना जाता है, और यह ओडिया भाषा का पश्चिमी रूपांतर है)। नाग ने अपनी कविताओं के माध्यम से उत्पीड़ित और हाशिए के लिए संघर्ष किया। हमेशा एक सफेद धोती और नंगे पैर चलने वाले नाग को उडिया साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2016 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया हैं।

"अपने हौसलों को यह, खबर करते रहें…

जिंदगी मंजिल नहीं,सफर है, बढते रहें...!! "


हलधर नाग, हलधर,खेतिहर किसान, बलराम आदि अनेक उपनामों के पर्याय, सादा लिबास, सफेद धोती, गमछा, बनियान पहनें, 3 जोडी कपडे, एक टूटी रबर की चप्पल,एक बिन कमानी का चश्मा, जमा पूंजी 732 रूपया,चेहरे पर उन शांत अनुभवों की छाप जिन्हे सुखद नहीं कहां जा सकता हैं,जो पहली नजर में एक किसान मालुम होते हैं, जो तपती धरती और खुले आसमान के नीचे अपनी मेहनत से मुकद्दर लिखता हैं। यह है कवि हलधर नाग, जो यह कहते हे कि साहब दिल्ली जाने के लिए पैसे नहीं हैं, कृपया पुरस्कार डाक से भिजवां दिजिएं। जिनके संघर्ष और सफलता की कहानीं आश्चर्यजनक हैं। कोसली में रचित इनकी कविताओं पर 5 विद्यार्थी पी. एच. डी. तक कर चुके हैं।

संघर्षमय जीवन

" जितने खराब हालातों में आप लडगें,

आपकी कामयाबी भी उतनी ही बडी होगीं।"

गरीब परिवार में जन्में हलधर नाग केवल तीसरी क्लास तक पढे हैं, जब उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। एक गरीब और विधवा मां के बच्चे का जीवन बहुत ही मुश्किल भरा रहता है। क्योंकि परिवार उन्हें स्कूल में रखने का जोखिम नहीं उठा सकता था, पिता की मृत्यु के बाद उनके पास काम करने का कोई चारा नहीं था, जीवन-नैया चलाने के लिए वह मिठाई की दुकान पर बर्तन मांजने का काम करने लग गए।

स्‍कूल में 16 वर्ष तक कुक

"अगर तुम्हारें ख्वाब बडें हैं तो,

 संघर्ष कैसे छोटा हो सकता हैं...!"

दो वर्ष बाद एक गांव के प्रमुख उन्‍हें हाईस्‍कूल ले गए लेकिन यहां पर उन्‍होंने पढ़ाई नहीं की बल्कि एक कुक के तौर पर काम किया। 16 वर्षों तक वह यहां पर कुक के तौर पर रहे। धीरे-धीरे उस इलाके में कई स्‍कूल आने लगे। फिर हलधर नाग ने बैंक से 1,000 रुपए लोन लेकर स्‍कूली बच्‍चों के लिए स्‍टेशनरी और खाने-पीने के दूसरे सामानों वाली एक छोटी दुकान खोल ली।

याद है अपनी हर कविता

सादगी और सरलता की मूर्ति हलधर नाग का जीवन बहुत ही कष्टमय रहा है लेकिन उन्होंने इन्हीं जीवन के संघर्षो से ऐसे शब्द ढूंढ लिए जिन्हे पिरोया तो कविता बन गई। हलधर नाग, समाज धर्म, मान्यताएं, और परिवर्तन के विषय पर लिखते हैं। उनकी कविताएं सामाजिक मुद्दो के बारे में बात करतीं हैं, उत्पीडन, प्रकृति, धर्म, पौराणिक कथाओं से लडती हैं,उनके समीप के परिवेश से ली गई यह कवितायें जीवन से मेल और लोगो के लिए एक संदेश देती हैं। उनका कहना है कि कविता समाज के लोगों तक संदेश पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम हैं। हलधर नाग को अपनी सारी कविताएं और अब तक उन्हीं के द्वारा लिखे गए 20 महाकाव्य कंठस्थ हैं। संभलपुर विश्वविद्यालय में अब इनके लेखन के संकलन को हलधर ग्रन्थावली- 2 को पाठ्यक्रम में शामिल भी कर लिया गया हैं। वह अपनी चुनी हुई कविता के अंग्रेजी अनुवाद की एक कृति कंवलंजलि के लिए प्रसिद्ध हैं

वर्ष 1990 में आई पहली कविता

साल 1990 में हलधर ने ‘ढोडो बरगाछ’ (पुराना बरगद) (द ओल्ड बरगद ट्री ) शीर्षक से कविता लिखी, जो एक पत्रिका में प्रकाशित हो गई। इसे खूब सराहा गया और यहां से एक नया सफर शुरू हुआ। उन्होंने और कविताएं लिखीं और विभिन्न पत्रिकाओं में भेजीं, वे सभी प्रकाशित हो गईं।

हलधर की कविताएं पाठकों द्वारा बहुत पसंद की जातीं, उनका दूसरा भाषाओं में अनुवाद होने लगा। उन्हें विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाने लगा और वे कविता पाठ करने लगे। उन्‍होंने गांव वालों को अपनी कविताएं सुनाना शुरू किया जिससे वह उन्‍हें याद रख सकें और गांववाले भी बड़े प्‍यार से उनकी कविताएं सुनते थे। लोगों को हलधर की कविताएँ इतनी पसन्द आई कि वो उन्हें "लोक कविरत्न" के नाम से बुलाने लगे। हलधर कवि ने 1995 के आसपास स्थानीय उडिया भाषा राम शबरी जैसे प्रसंगों पर लिख लिख कर लोगो को सुनाना शुरू किया।

हलधर को कविता प्रेमियों से इतना सम्मान मिला कि रोज ही करीब तीन-चार कार्यक्रमों के लिए बुलावे आ जाते हैं। प्रसिद्धि के बावजूद वे जमीन से जुड़े रहे और आज तक अपना पहनावा नहीं बदला। साल 2016 में जब उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया तो कवि हलधर ठेठ ग्रामीण पहनावे में ही सम्मान प्राप्त करने दिल्ली आए। हम किताबों से प्रकृति चुनते हैं, हलधर ने प्रकृति से चुन चुन कर किताबें बुनी हैं।

"आपके जीवन में हर संघर्ष ने आपको उस व्यक्ति में आकार दिया है जो आप आज हैं। कठिन समय के लिए आभारी रहें, वे केवल आपको मजबूत बना सकते हैं। अगर हम बिना किसी बाधा के हमारे जीवन से गुज़रना चाहते थे, तो हम अपंग होंगे। हम उतना मजबूत नहीं होंगे जितना हम कर सकते थे। हर अवसर को मौका दें, अफसोस के लिए कोई जगह न छोड़ें।" - फ्रेडरिक निएत्ज़्स्चे



Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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