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जानिए पंचशील सिद्धांत: वैश्विक शांति के आधारस्तम्भ एवं चीन के द्वारा उसकी अवमानना

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14 नवंबर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिवस है। वह केवल बच्चों के चाचा नेहरू ही नहीं थे बल्कि आधुनिक भारत के निर्माता भी थे। उन्होंने पंचशील सिद्धांत के माध्यम से विश्व को शांति और सौहार्द का संदेश दिया था। वे महात्मा गांधी के संरक्षण में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे थे। वह 1947 में भारत के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर 1964 तक अपने निधन के समय तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय राज्य, एक संप्रभु समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के वास्तुकार माने जाते हैं उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है और इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात जब भारत आजाद हुआ, भारत का विभाजन, भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति जिस प्रकार उस वक्त थी उसे संभालना, उसे पुनर्गठित करना, उसका निर्माण करना कोई आसान कार्य नहीं था।

उस वक्त अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि विकसित करने और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियो के साथ सामंजस्य स्थापित करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। ऐसे में नेहरू जी ने बागडोर संभाली। उन्होंने अपने बुद्धि, दूरदर्शिता से एक आधुनिक भारत का निर्माण किया। इतना ही नहीं 1952 के आम चुनाव में उनके नेतृत्व में स्वतंत्र लोकतंत्र की नींव रखी गई जो आज मजबूती से खड़ा है। आज भारत को दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में माना जाता है। उन्होंने उस समय की परिस्थितियो को देखते हुए जिस विदेश नीति को अपनाया उसका पालन पोषण किया, उसको आकार प्रदान किया किंतु उसे गढ़ा नहीं था उन्होंने खुद ही स्वीकार किया था कि भारत की विदेश नीति की जड़ें भारत की संस्कृति, सभ्यता, परंपराओ, इस की भौगोलिक स्थिति, शांति, सुरक्षा तथा विकास में निहित है। उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया था। भारत को सही ढंग से समझने और अंतरराष्ट्रीय मामलों की जो पकड़ पंडित जी के पास थी वह उस वक्त भारत की किसी दूसरे नेता की नहीं हो पाई अपने प्रधानमंत्री काल में विदेश नीति हमेशा उन्होंने ही संभाली।

उनकी विदेश नीति में पंचशील समझौता बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह समझौता चीन के साथ 29 अप्रैल 1954 को हुआ था। चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर यह समझौता हुआ था। इस समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धांत थे। पंचशील शब्द ऐतिहासिक बौद्ध अभिलेखों से लिया गया है जो कि बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करने वाले पांच निषेध होते हैं नेहरू जी ने वही से यह शब्द लिया था। यह पांच सिद्धांत थे: 

१. एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना।

२. परस्पर अनाक्रमण। अर्थात एक दूसरे पर आक्रमण ना करना।

३. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना।

४. समान और परस्पर लाभकारी संबंध को बढ़ावा देना।

५. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना।

     

 समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार​ कर लिया इस तरह उस समय इस संधि में भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफी हद तक दूर कर दिया था। 28 जून 1954 को चीन के प्रधानमंत्री और नेहरु जी ने पंचशील के सिद्धांतों को दोहराया। इसके बाद लगभग सभी एशियाई देशों ने पंचशील के सिद्धांत को अपनाया अप्रैल 1955 में बांडुंग सम्मेलन में इन सिद्धांतों को विस्तृत रूप दिया गया और इसके बाद विश्व के अधिकांश देशों ने इसे मान्यता दी। इन सिद्धांतों ने विश्व शांति की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नेहरू जी ने चीन के साथ दोस्ती की पहल बहुत ईमानदारी से ही थी किंतु 1962 में चीन द्वारा किए गए आक्रमण ने भारत को जबरदस्त चोट पहुंचाई थी। उसके बाद से अब तक दोनों देशों के संबंध सामान्य नहीं हो पाए हैं। वर्तमान समय में भी भारत चीन के संबंध तनावपूर्ण ही चल रहें है जिससे हम अवगत है।

पंचशील का सिद्धांत नेहरू जी के विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इस समझौते के बाद इतने दशक बीत चुके हैं प्रश्न यह उठता है कि यह सिद्धांत कितना कारागार हो पाया है इसमें किस हद तक सफलता प्राप्त की। देखा जाए तो 1962 से अब तक पंचशील के सिद्धांत पर प्रश्न चिन्ह ही रहा है। यह समझौता एकतरफा पालन करने वाला ही अधिक रहा है। भारत ने हमेशा ही इन सिद्धांतों का पालन किया है लेकिन चीन ने हमेशा इसकी अवमानना ही की है कभी भारत पर हमला करके, कभी वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार करके भारतीय सीमा में अवैध तरीके से घुसपैठ करके तथा पंचशील समझोता की 60 वीं वर्षगांठ पर चीन ने भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताते हुए विवादित नक्शा जारी कर दिया था। यह नीति विशेषकर सिद्धांतों पर आधारित थी जिसके कारण वह राष्ट्रीय सुरक्षा आर्थिक विकास के साथ सीधी तरह जुड़ नहीं पाई।

पंचशील सिद्धांत का विषय है देशों के बीच एक दूसरे की प्रभुसत्ता, प्रादेशिक अखंडता का सम्मान, एक दूसरे का अनाक्रमण एक दूसरे के घरेलू मामलों में अहस्तक्षेप और आपसी लाभ तथा शांतिपूर्ण सहजीवन। देखा जाए तो दोनों देशों के बीच संबंध अच्छे होने की बजाय बिगड़े ही है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही तौर पर चीन ने भारत के साथ दुश्मनी निभाई है बल्कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान को आर्थिक, सामरिक ताकत देने से भी वह पीछे नहीं रहा। वास्तव में शुरू के 5 वर्षों तक यह समझौता भारत की विदेश नीति की रीढ़ की हड्डी रहा है इसके बाद ही हिंदी चीनी भाई भाई के नारे लगे और भारत ने गुटनिरपेक्ष रवैया अपनाया। पंचशील का सिद्धांत चीन व भारत द्वारा दुनिया की शांति एवं सुरक्षा में किया गया एक महत्वपूर्ण योगदान था और आज तक दोनों देशों की जनता की जुबान पर इसका नाम है। उस समय जिस प्रकार की परिस्थितियां थीं उसको देखते हुए नेहरू जी ने दूरदर्शी समझौता किया था किंतु ताली एक हाथ से नहीं बजती यह समझौता एकतरफा ही रहा। 

आज दुनिया में हिंसा, आतंक, अराजकता जैसी स्थिति मौजूद है। देशों के बीच आपस में झगडे हो रहे हैं। विश्व स्तर पर यह मतभेद साफ दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में जरूरत है पंचशील के सिद्धांतों को फिर से समझने की उसको स्वीकार करने की और उसको पुनः स्थापित करने की क्योंकि शांति और सुरक्षा की आवश्यकता तो विश्व को आज भी है। प्रत्येक देश अपनी अखंडता, संप्रभुता आज भी चाहता है। ऐसे में हमें पंचशील के इन सिद्धांतों का प्रयोग करके विश्वशांति सोहार्द तथा विकास की दिशा में नया कदम बढ़ाना चाहिए।

यह सिद्धांत न सिर्फ उस समय  बल्कि आने वाले वर्षों तक हमारे लिए मार्गदर्शक रहे हैं। भारत ने कभी भी दूसरे राष्ट्रों पर हमला करने या हस्तक्षेप करने की नीति नहीं अपनाई। कभी अपनी तरफ से पहल नहीं की। भारत ने हमेशा वसुधैव कुटुंबकम् की भावना में विश्वास किया है। पंचशील का सिद्धांत सभी राष्ट्रों की आत्मनिर्भरता को स्वीकार करता है, यह आपसी विश्वास का सिद्धांत है, राष्ट्रों के मध्य संघर्षों को रोकने में​ विशवास करता है। जियो और जीने दो के सिद्धांत में विश्वास रखता है। पंचशील के सिद्धांत पहले भी प्रासंगिक थे और आज भी हो सकते हैं​, जरूरत है बदलते परिवेश में वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप इनको फिर से स्वीकार करने की, अपनाने की।


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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