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स्वामी विवेकानंद के शैक्षिक विचारों की प्रासंगिकता | युवा दिवस विशेष

स्वामी विवेकानंद के शैक्षिक विचारों की प्रासंगिकता | युवा दिवस विशेष

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‘‘शिक्षा में सबसे ज्यादा ताकत होती है,जिससे पूरी दुनिया को बदला जा सकता है।"

-स्वामी विवेकानंद

12 जनवरी स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वामी जी का दर्शन, चिन्तन, विचार, उनके आदर्श भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्त्रोंत है। उनका शैक्षिक दर्शन भी अत्यन्त प्रेरणादायक तथा प्रभावी है। आज के समय में उनके शैक्षिक विचारों की प्रासंगिकता बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उनके शिक्षा सम्बन्धी विचारों में प्राचीन भारतीय, मूल्यों, आदर्शो और आधुनिक पश्चिमी मान्यताओं का समावेश है। स्वामी जी के अनुसार शिक्षा का प्रथम उद्देश्य अन्तर्निहित पूर्णता को प्राप्त करना है। उनके अनुसार लौकिक तथा आध्यात्मिक सभी ज्ञान मनुष्य के मन में पहले से विद्यमान होता है, इस पर पड़े आवरण को उतार देना ही शिक्षा है। उनके शब्दों में "शिक्षा उस सन्निहित पूर्णता का प्रकाश है, जो मनुष्य में पहले से ही विद्यमान है।" कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं सिखाता, प्रत्येक व्यक्ति अपने आप स्वयं ही सिखता है। बाहरी शिक्षक तो केवल सुझाव ही प्रस्तुत करता है। जिससे भीतरी शिक्षक को समझने में और सीखने के लिए प्रेरणा मिल जाती है। बालक लौकिक तथा आध्यात्मिक सभी प्रकार के ज्ञान का भण्डार होता है। वह पेड़- पौधे की भांति स्वयं ही स्वाभाविक रूप से विकसित होता है अतः बालक को स्वयं विकसित होने का सुझाव दिया है। ‘‘अपने अन्दर जाओ और उपनिषदों को अपने में से बाहर निकालों। तुम सबसे महान पुस्तक हो, जो कभी थी अथवा होगी। जब तक अन्तरात्मा नही खुलती, समस्त बाह्यय शिक्षण व्यर्थ है।‘‘  

स्वामी जी के विचारों को वर्तमान संदर्भ में देखे तो स्पष्ट होता है कि शिक्षा मनोविज्ञान का जो आज उद्भव और विकास हुआ है, वह स्वामी जी के विचारों के पूर्णतः अनुकूल है। वह केवल पुस्तकों के ज्ञान को शिक्षा नहीं मानते, केवल पोथियां पढ़ लेना शिक्षा नहीं है, ना ही अनेक प्रकार का ज्ञान (सूचना) प्राप्त करने का नाम शिक्षा है। केवल डिग्रियां लेना शिक्षा नहीं है। ज्ञान को सूचनाओं के रूप में बालक के दिमाग में ढूंसना मात्र शिक्षा का उद्देश्य नहीं है। कुछ शब्दों को पढ़ना, लिखना ही शिक्षा नहीं है। साक्षरता और शिक्षा में अन्तर है। स्वामी जी के अनुसार शिक्षा सूचनाओं एवं जानकारियों को भरना नहीं है बल्कि उन जानकारियों का जीवन में सही प्रयोग करना है। सीखे गए ज्ञान का जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में उचित प्रयोग वास्तव में शिक्षा है। शिक्षा का अर्थ ‘‘व्यक्तियों को इस तरह से संगठित करने से है जिससे उनके विचार, अच्छाई व लोगों की भलाई के लिए दौड़े और वे अपने कार्य को पूर्ण कर सके।‘‘ हमें उस शिक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है, बुद्धि विकसित होती है, जिसको प्राप्त करके व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है ‘‘अर्थात् शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति और व्यक्तित्व का निर्माण करना तथा उसे आत्मनिर्भर बनाना है। "

वर्तमान शिक्षा प्रणाली ऐसी है जिसमें बालक का मूल्यांकन उसके अच्छे अंकों पर ही निर्भर करता है। कम अंक आने, असफल होने से बालक में निराशा, तनाव, कुंठा उत्पन्न हो जाती है। कई बार बालक अपनी असफलता को स्वीकार नहीं कर पाता, और अनुचित कदम उठा लेता है। ऐसे में स्वामी जी के विचार बालकों का मनोबल बढ़ाते है। उनका मानना था अपने को कभी कमजोर न समझे। अपना आत्मविश्वास बनाए रखे। उनके शब्दों में ‘‘जो तुम सोचते हो वो हो जाओंगे, यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो, तुम कमजोर हो जाओगे, अगर खुद को ताकतवर सोचते हो, तुम ताकतवर हो जाओंगे।"

जीवन में कभी निराश न हो‚ असफलता से घबरायें नहीं बल्कि तब तक प्रयास करे जब तक कि सफलता प्राप्त नहीं हो जाती। उनके शब्दों में ‘‘किसी दिन जब आपके सामने कोई समस्या ना आये आप सुनिश्चित हो सकते है कि आप गलत मार्ग पर चल रहे है।" इसलिए शिक्षा द्वारा छात्रों में आत्मविश्वास, आत्मबल तथा स्वावलंबन उत्पन्न करना चाहिए। यह शिक्षा का उद्देश्य है। ‘‘खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।" स्वामी जी ने आजीवन इस बात पर बल दिया कि "अपने ऊपर विश्वास रखना, श्रद्धा तथा आत्मत्याग की भावना को विकसित करना शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। "उनके शब्दों में "उठो! जागों और उस समय तक बढ़ते रहो जब तक कि चरम उद्देश्य की प्राप्ति न हो जाए।" 

आज का समय प्रतियोगिता का समय है। दूसरे से आगे निकलने की भावना कई बार अनुचित एवं गलत कार्यो की और अग्रसर करती है। अपराध, बेईमानी, अराजकता, हिंसा, अनैतिकता, समाज में फैल रही है। ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में नैतिक‚ आध्यात्मिक तथा चरित्र निर्माण का विकास करना होना चाहिए। स्वामी जी भी छात्रों में नैतिक, आध्यात्मिक और चारित्रिक विकास को शिक्षा का उद्देश्य मानते थे। आज के छात्र कल के नागरिक है। स्वामी जी के शब्दों में ‘‘नागरिकों को महान बनाने के लिए उनका नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास परम आवश्यक है।"अतः शिक्षा को इस और ध्यान देना चाहिए। नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों से विहीन शिक्षा प्रणाली किसी भी समाज को अवनति की और ले जा सकती है। इसलिए स्वामी जी ने अनिवार्य रूप से शिक्षा में गीता‚ उपनिषद् और वेद में निहित नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के समावेश की आवश्यकता पर बल दिया है। उनके शब्दों में ‘‘नैतिकता और धर्म एक ही है। इन मूल्यों से ओत-प्रोत शिक्षा विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करने में सहायक है।"

स्वामी जी का मानना था कि बालक का तन-मन से स्वस्थ रहना बहुत आवश्यक है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य बालक का शारीरिक एवं मानसिक विकास भी होना चाहिए। शारीरिक उद्देश्य पर इसलिए बल दिया जिससे आज के विद्यार्थी भविष्य में निर्भीक एवं बलवान बने, साहसी बने ओर मानसिक उद्देश्य पर बल देते हुए उन्होने बताया "कि हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिसे प्राप्त करके बालक अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। ऐसी शिक्षा हो जिससे वह अपना जीवन निर्वाह कर सके।" अतः स्वामी जी वैज्ञानिक,औद्यौगिक और तकनीकि शिक्षा के महत्व को भी समझते थे। उन्होंने बालक के भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए शिक्षा को ज्ञान एवं कौशल के रूप में स्वीकार किया। बालक को जीवन संघर्ष के लिए तैयार करना होगा। इसके लिए तकनीकि एवं विज्ञान शिक्षा की आवश्यकता पर उन्होंने बल दिया।  

आज शिक्षा मौलिक अधिकार है लेकिन स्वामी जी के समय में शिक्षा जन साधारण को सुलभ न थी किन्तु स्वामी जी का विचार था कि शिक्षा का प्रचार जन साधारण में होना चाहिए। बालक बालिकाओं को समान शिक्षा मिलनी चाहिए। वे सार्वभौमिक शिक्षा के समर्थक थे। शिक्षा में किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरूद्ध थे। निर्धनतम व्यक्ति को भी शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए। शिक्षा सभी को सुलभ हो। आम जनता की शिक्षा व्यक्तिगत प्रगति के साथ सामाजिक विकास को सुनिश्चित करती है। वर्तमान में भी हम यही मानते है कि देश का सम्पूर्ण विकास तभी होगा जब सभी शिक्षित होगे

अन्ततः स्वामी जी ने शिक्षा के उद्देश्य में शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक, व्यावसायिक विकास तथा भेदभाव रहित सार्वभौमिक शिक्षा का समर्थन किया है तथा मानव के व्यक्तित्व निर्माण को प्राथमिकता दी है। उन्होंने व्यावहारिक और आधुनिक दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, उ़़द्योग, विज्ञान से जुड़ी पश्चिमी शिक्षा को भी महत्व दिया है। स्वामी जी का शैक्षिक दर्शन अत्यंत प्रासंगिक है जिसका अनुसरण कर वर्तमान समाज की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। 

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यह लेख ‘शिविरा पत्रिका'(माध्यमिक शिक्षा राजस्थान) जनवरी,2021अंक 07 में प्रकाशित हो चुका है।

हमे ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैर पर खड़ा हो सके।



Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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