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श्राद्धकर्म :सच्चाई एवं सार्थकता

श्राद्धकर्म :सच्चाई एवं सार्थकता

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बुढ़ापे में थी जरूरत, तब एक कौर निवाला तक किसी ने नहीं डाला,

मरते ही पहले श्राद्ध पर पुत्रों ने स्वर्ग तक अन्न जल का प्रबंध तक कर डाला।

श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌  (जो श्रद्धा से किया जाये, वह श्राद्ध है।) भावार्थ यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वही श्राद्ध है। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। परन्तु अगर जीवित रहते मनुष्य के प्रति श्रद्धा नहीं है तो मृत्यु परान्त प्रेत या पितर के निमित्त आत्मा की तृप्ति के लिए की गई श्रद्धा अनौचित्यपूर्ण दिखावा मात्र है।

जन्म और मृत्यु का रहस्य बहुत ही गुढ हैं, जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी निश्चित है, यह प्रकृति का नियम है। अपने पूर्वजों के निमित्त दी गई वस्तुएँ सचमुच उन्हें प्राप्त होती हैं या नहीं, इस विषय में अधिकांश लोगों को संदेह है।

हमारे ही पूर्वज अपने कर्मानुसार किस योनि में उत्पन्न हुए हैं, जब हमें इतना भी नहीं मालूम तो फिर उनके लिए दिए गए पदार्थ उन तक कैसे पहुँच सकते हैं? और जीवित रहते हुए जिस मनुष्य को जिन वस्तुओं की अनिवार्य आवश्यकता थी,वह उसे उस समय नहीं मिल पाई, वहीं वस्तुएं मृत्युपरांत किसी अन्य को आधार मान कर दिया जाना क्या सार्थक है? जीवित व्यक्ति को तो पेट भर के खिलाया ही नहीं, और, मृत्युपरांत उसके नाम से ब्राह्मण को भोजन कराने से क्या हमारे पूर्वजों का पेट भर सकता है? जहां पर जीवित रहते हुए उस मनुष्य को शान्ति नहीं थी, उसे तर्पण के माध्यम से आत्मिक शांति संतुष्टि प्राप्त कैसे हो पाएंगी? अथवा अगर हम किसी कमरे में बैठ कर भोजन कर रहे हैं तो क्या छत पर बैठे किसी अन्य व्यक्ति का बिना भोजन करें पेट भर सकता है। यदि नहीं हे तो फिर मृत व्यक्ति की आत्मा के नाम पर अन्य व्यक्ति पर समस्त येन केन प्रकारेण क्रियाओं का अनुसरण समस्त दान सामग्री, निरर्थक है,और पारिवारिक जीवन में केवल मात्र सम्मान पाने की लोलुपता ही हैं।

घी का दीपक, कौओं को खीर,

और यजमान को दक्षिणा तमाम,

भूखी, प्यासी घर से बेघर ऐसी मां की स्थिति पर सवाल।

यह भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा की, श्राद्धकर्म के माध्यम से पशु, पक्षी, यजमान की पूर्ण खातिरदारी की जाती हैं, श्राद्धपक्ष एक प्रकार से जीव जंतुओं के भोजन का आधार और यजमानों की आय का स्रोत भी हैं।

श्राद्ध हिन्दू एवं अन्य भारतीय धर्मों में किया जाने वाला एक कर्म है जो पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता अभिव्यक्त करने तथा उन्हें याद करने के निमित्त किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं, जिनसे गुण व कौशल, आदि हमें विरासत में मिलें हैं, उनका हम पर न चुकाये जा सकने वाला ऋण हैं। वे हमारे पूर्वज पूजनीय हैं। फिर भी एक पक्ष यह भी हे की मनुष्य को उसी की पूजा करने के लिए कहां है जिसे वह पाना चाहता है अर्थात समझदार इशारा समझ सकता है कि परमात्मा को पाना ही श्रेष्ठ है। अतः अन्य पूजाएं (देवी-देवता और पितरों, भूत पलित की पुजा को) छोड़ कर सिर्फ परमात्मा की पूजा करें।

गीता अध्याय 1 श्लोक 25 के अनुसार पितर पूजने वाले पितरों को, देेव पूजने वाले देवताओं को, और परमात्मा को पूजने वाले परमात्मा को प्राप्त होते हैं। यह तो हमारा स्व निर्णय है कि हम क्या पूजें, और जिसकी पूजा कर रहे हैं उससे किस पदवी को प्राप्त करें।

मां का श्राद्ध था,पुजा पाठ हवन भवन में हो रहा ा।

व्यंजनों की खुशबू से सदन महक रहा था,

तोंद वाले पंडित जी को परोसें जा रहें ऐ, भर भर मिठाई के थाल,

कोने में दुबका भुखा बाप लेकिन रो रहा था।

श्राद्धकर्म में दिखावे के नाम पर बनाएं गये सुगंधित पकवानों की सार्थकता और मृत्युपरांत किया गया नाटकीय घटनाक्रम सच्चाई को छुपा नहीं सकता है। मुंशी प्रेमचंद जी की कहानी बूढी काकी का अंश

इसी हालात को प्रकट करता है।

"बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में शोकमय विचार की भाँति बैठी हुई थीं। यह स्वाद मिश्रित सुगंधि उन्हें बेचैन कर रही थी। वे मन-ही-मन विचार कर रही थीं, संभवतः मुझे पूड़ियाँ न मिलेंगीं। इतनी देर हो गई, कोई भोजन लेकर नहीं आया। मालूम होता है सब लोग भोजन कर चुके हैं। मेरे लिए कुछ न बचा। यह सोचकर उन्हें रोना आया, परन्तु अपशकुन के भय से वह रो न सकीं।इस प्रकार निर्णय करके बूढ़ी काकी उकड़ूँ बैठकर हाथों के बल सरकती हुई बड़ी कठिनाई से चौखट से उतरीं और धीरे-धीरे रेंगती हुई कड़ाह के पास जा बैठीं। यहाँ आने पर उन्हें उतना ही धैर्य हुआ जितना भूखे कुत्ते को खाने वाले के सम्मुख बैठने में होता है।

मेंढक केंचुए पर झपटता है, उसी प्रकार वह बूढ़ी काकी भोजन पर झपटी और बूढ़ी काकी की यह अवस्था देखकर क्रोध से आग-बबूला बहू रूपा की झुंझलाहट निकलीं बूढ़ी काकी को दोनों हाथों से झटक कर बोली-- ऐसे पेट में आग लगे, पेट है या भाड़? कोठरी में बैठते हुए क्या दम घुटता था? अभी मेहमानों ने नहीं खाया, भगवान को भोग नहीं लगा, तब तक धैर्य न हो सका? आकर छाती पर सवार हो गई। जल जाए ऐसी जीभ। दिन भर खाती न होती तो जाने किसकी हांडी में मुँह डालती? गाँव देखेगा तो कहेगा कि बुढ़िया भरपेट खाने को नहीं पाती तभी तो इस तरह मुँह बाए फिरती है। डायन न मरे न मांचा छोड़े। नाम बेचने पर लगी है। नाक कटवा कर दम लेगी। इतनी ठूँसती है न जाने कहां भस्म हो जाता है। भला चाहती हो तो जाकर कोठरी में बैठो, जब घर के लोग खाने लगेंगे, तब तुम्हे भी मिलेगा। तुम कोई देवी नहीं हो कि चाहे किसी के मुँह में पानी न जाए, परन्तु तुम्हारी पूजा पहले ही हो जाए।"

यद्यपि यह मात्र कथा का ही अंश है, परन्तु साथ ही यह यह भी सच्चाई उजागर करता है,की जहां पर जीवित मनुष्य को उसी घर में पेट भर निवाला नहीं है, वहां उसी मनुष्य की मृत्यु के बाद उसी के निमीत्त अन्य व्यक्तियों को भरपेट निवाला खिलाना औचित्यता नहीं है। यह हमारी सामाजिक व्यवस्था पर एक गहरा कुठाराघात भी है कि हम जीवित व्यक्ति का तो तिरस्कार करते हैं, और मृत्यु परान्त उसी पर हमारी पारिवारिक, मानसिक, झुठी सामाजिक प्रतिष्ठा निर्धारित करते हैं। जिंदा मनुष्य कि सच्चाई से भागकर, या आंख मूंद कर उसकी मौत के पश्चात् किया गया प्रस्तुतीकरण, दिखावटी आंसू बहाना केवल और केवल एक मात्र झुठे सम्मान का चोला ओढ़े ढोंग का ही प्रकटीकरण हैं। श्राद्धकर्म के नाम पर किया गया यह नाटकीय घटनाक्रम

मृत वृद्धात्मा की आत्मीक आवाज को बुलंद आवाज़ में प्रकट करता है कि:

श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर बार बार ...

जो भी खिलाना हो, पहनाना हो,

जीवित रहते हुए अभी ही खिला और पहना दो...

मुझे जिंदा रहते हुए भी यह सब कुछ नहीं मिला तो मरने के बाद अब नहीं है शौक़ तुम्हारे, दान किए गए मंहगे वस्त्रों, मिठे पकवानों, चावल की खिर और ब्राह्मण भोज का...यह सब तुम्हें और सिर्फ तुम्हें ही मुबारक...!!


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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