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श्रृंगार का अधिकारी कौन?

श्रृंगार का अधिकारी कौन?

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अंध भक्त होने के लिए प्रचंड मूर्ख होना अनिवार्य शर्त है। - हरिशंकर परसाई

अगर हमने अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, ग़लत परम्पराओं को अपनाने की अनिवार्य शर्त को मंजूरी दे दी है तो यह बात सर्वथा सिद्ध हो गई है की हम प्रचंड मूर्ख है।

भारतीय संस्कृति की अनेक विशेषताएं होने के बावजूद भी हमारी संस्कृति विभिन्न परम्पराओं, रिवाजों, रूढ़िवादी मानकों से कई स्थानों पर इस तरह झकडी हुई है कि अनेक स्थानों पर वृद्धों द्वारा इन्हीं परम्पराओं को अपनाने के लिए दिया गया दबाव और हमारा विरोध विवाद का मुद्दा हो जाता है। हम में से ही अनेक व्यक्तियों द्वारा इसके सम्बंध मे रुढ़िवादीता की दलील देते हुए पुरजोर सिफारिश प्रस्तुत की जाती है।

श्रृंगार का अधिकारी कौन?

एक सामान्य सा प्रश्न हर एक व्यक्ति के ज़हन में उठता है कि श्रृंगार की अनिवार्यता किसके लिए होनी चाहिए अथवा नहीं?

‌श्रृंगार और सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग एक शादीशुदा औरत को करना चाहिए या नहीं, अथवा इन का उपयोग एक विधवा स्त्री बिल्कुल भी नहीं कर सकतीं? अथवा एक विवाहित महिला,या लड़की रंगीन वेशभूषा से अलंकारों से अलंकृत रहेगी, वहीं विधवा स्त्री केवल सफेद पहनावों में अपने आप को ढाले रहेगी, यह बात तो सार्थक नहीं है। किसी स्त्री का पती मरना, अथवा किसी कारण वश येन केन प्रकारेण उस स्त्री का परित्याग कर देना, एक आकस्मिक घटना है, उससे उसके पहनावे पर बंदीश लगाना उचित नहीं है। जैसे वह अपने विचारों से स्वतंत्र है, वैसे ही परिधानों और अलंकारों में भी उसकी स्वतंत्रता पर अवरोध नहीं होना चाहिए। वहीं दूसरी और हम एक शादीशुदा औरत को पुरा श्रृंगार करने को कहते हैं, और अगर वह उस श्रृंगार की पुरजोर विरोधी है, तो यह तो यहीं हुआ कि हम अपनी मन की संतुष्टि के लिए उस पर जबरदस्ती अपने विचार डाल रहे हैं। आज का आधुनिक समय जो परम्पराओं और रूढ़िवादिता से बहुत ही आगे निकल चुका है, फिर भी हम एक ही परिपाटी को स्वीकार किए हुए है, क्योंकि हम और हम में से ही अनेक इस बदलाव के पक्षधर नहीं है।

जब स्त्री पुरुष जन्मजात समान रूप में जीवन लेते हैं,तब एक तरफ हम नारी सोलह श्रृंगार का अनिवार्य राग अलपाते है, कारण भी तो समस्या ही हैं।

सोलह श्रृंगार स्त्री की अनिवार्यता को बताते है, यह तो सही है परन्तु रूढ़िवादी महिलाएं इसे हद से ज्यादा अनिवार्य कर अनावश्यक सिंदूर मांग में भरकर, सुहाग का Symbols दर्शाने लग जाती है, एक तरह से देखा जाए तो सिंदूर में उच्च मात्रा का LEAD पारा होता है जो विषाक्तता का नेतृत्व करते हुए मानव शरीर के वायरल अंगों पर अत्यधिक हानिकारक प्रभाव डालता है। सिंदूर भरना या लगाना, अथवा उसका प्रतिरूप लगाना अनोचित्य है, वहीं हाथों में चुड़ियों को हद से ज्यादा पहनना, या एकादी पहनना, अथवा लाल ही रंग पहनना, सर ढंकना, घूंघट निकालना, मैंहदी लगाना न लगाना, पायल पहनना न पहनना, बिंदी लगाना या न लगाना, अथवा लालवस्त्र परिधानों में अनिवार्य स्वीकार करना, एक परम्परा के रूप में श्रृंगार सामग्री का स्वरूप ही है, परन्तु इसे सुहाग के चिन्ह या शादी सुदा महिला के Symbol के रूप में मानना कुछ हद तक सोचनीय ही हैं।

एक बात तो निश्चित ही है कि किसी बिंदी विशेष में, कंगन विशेष में, भरी हुई मांग के सिंदूर में, या लाल‌ वस्त्र विशेष में सुहाग या शादीशुदा महिला के Symbol नहीं होते हैं। और इन सब का प्रयोग न करने पर वह विधवा स्त्री का भी द्योतक नहीं है।

अंध भक्त होने के लिए प्रचंड मूर्ख होना अनिवार्य शर्त है। - हरिशंकर परसाई


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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