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क्या आप जानते है बटुकेश्वर दत्त के जीवन का संघर्ष?

क्या आप जानते है बटुकेश्वर दत्त के जीवन का संघर्ष?

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ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम, तेरी राहों में जान तक लुटा जायेंगे...

फूल क्या चीज है, तेरे कदमो में हम, भेंट अपने सरो की चढ़ा जायेंगे...!

परतन्त्र राष्ट्र में हर एक बच्चे,युवा, वृद्ध की जुबान पर यहीं शब्द करतल पदचाप के साथ एक लयबद्ध नारों से हर गली-मोहल्ले में देश के कोने कोने से गुंजायमान थे। परन्तु स्वतन्त्र राष्ट्र में देश का वर्तमान इतिहास, राष्ट्र व्यापी नीतियों के कारण इन शहीदों के त्याग की स्वीकारोक्ति पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। हमारे स्वतन्त्र राष्ट्र में हर शहीद दिवस पर, विशेष रूप से सभी देशभक्ति गीतों, और बुलन्द आवाज़ में नारों के साथ हम अपनी आजादी और प्रजातंत्र दिवस तो जोर-शोर से मनाते हैं,जिसकी तैयारी भी हम बाकायदा एक दो दिन पहले से ही प्रारंभ कर देते हैं, परन्तु जिस स्वतन्त्र राष्ट्र में हम आज है, उस स्वतन्त्र राष्ट्र की नींव रखने वाले राष्ट्र भक्तों को एक दिवसीय श्रृद्धांजलि अर्पित करने के अलावा हमारी और कुछ भी भूमिका नहीं रहती है।

मैं जला हुआ राख नहीं, अमर दीप हूँ

जो मिट गया वतन पर, मैं वो शहीद हूँ।

भारत के पहले इंकलाबी हैं, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त। इनमें भी बटुकेश्‍वर दत्‍त पहले बंगाली इंकलाबी है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त (जन्म: वर्धमान जिले के गांव में,18 नवंबर 1910 – मृत्यु: 20 जुलाई 1965) जिन्हें इस स्वतन्त्रता का सम्मान देने वाले और शहीदों का गुणगान करने वाले देश ने सिर्फ़ इसलिए भुला दिया, क्योंकि वे आज़ादी के बाद भी ज़िंदा बचे रहे थे, वह ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने आज़ादी के बाद स्वतन्त्र राष्ट्र में अपना सर्वस्व अर्पण करने की पहल करने के बाद भी इसी राष्ट्र में अपनी गरिबी को प्रत्यक्ष आंखों से देखा था। स्वतन्त्र राष्ट्र के लिए क्रांति की मशाल जलाकर पूरे देश में युवाओं का आदर्श बन गए,भगत सिंह तो सभी को याद हैं, लेकिन बटुकेश्वर दत्त को भुला दिया गया।

सैंकड़ों परिंदे आसमान पर आज नजर आने लगे...

बलिदानियों ने दिखाई है राह उन्हें आजादी से उड़ने की।

बटुकेश्वर दत्त ने न केवल 19 साल की उम्र में 8 अप्रैल 1929 को अपने साथी भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेम्बली मे इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारों के साथ बम फेंका था। इस घटना के बाद शहीद भगत सिंह को तो फांसी की सजा हो गई लेकिन बटुकेश्वर दत्त को बहुत कड़ी सजा दी गई, जिसे उस समय 'काला पानी की सज़ा' कहां जाता था और इस सज़ा में कैदी को अंडमान द्वीप पर बनाई गई सेल्युलर जेल में उम्रभर के लिए बंद कर दिया जाता था। पर जब 1947 में देश आजाद हुआ तो बटुकेश्वर दत्त जेल से निकल आए और बिहार की राजधानी पटना में रहने लगे। जहां एक तरफ़ तो राष्ट्र में स्वतन्त्रता का चारों तरफ गुणगान किया जा रहा था, वहीं बटुकेश्वर दत्त का जीवन उगते स्वतन्त्रता के सूर्य उदय मैं पूर्ण अंधकारमय था।

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले...

वतन पर मरने वालों का यहीं बाकी निशा होगा...

अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ भुला नहीं सकते, परन्तु हमने आज़ादी के बाद शहीदों को जरूर भुला दिया है,हम केवल इन शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित करने और नमन करने में जो नकारात्मक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आएं हैं, और शायद हमारी पीढ़ी को भी यहीं हस्तांतरित करेंगे। शायद वर्तमान राष्ट्र भक्तों का यहीं देश अपने नायकों के ज़िंदा रहते उनकी क़द्र करना नहीं जानता है।

इसका जीता जागता उदाहरण बटुकेश्वर दत्त, और इनका जीवन संघर्ष है। देश की आजादी के लिए करीब 15 साल तक सलाखों के पीछे गुजारने वाले बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत (India) में नौकरी और दो समय की रोजी-रोटी के लिए भटकना पड़ा। जिस आजाद भारत में उन्हें सिर आंखों पर बैठाना चाहिए था उसमें उनकी घोर उपेक्षा हुई।