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अभी न होगा मेरा अन्त। पुरी कविता

अभी न होगा मेरा अन्त। पुरी कविता

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अभी न होगा मेरा अन्त

अभी-अभी ही तो आया है

मेरे वन में मृदुल वसन्त-

अभी न होगा मेरा अन्त ।

निराला जी के बचपन का नाम सूर्यकुमार था। निराला जी का बचपन अभावों की पीड़ा को झेलते हुए व्यतीत हुआ परंतु फिर भी निराला जी ने हिम्मत नहीं हारी और अपने जीवन में संघर्ष करते हुए आगे बढ़े।

अभी न होगा मेरा अंत ध्वनि कविता के माध्यम से निराला जी ने मानव मन में उत्साह वर्धन की बात करीं हैं। वह कह रहे हैं कि जीवन में चाहें कैसी भी परिस्थितियां आएं वह हताश और निराश कभी नहीं होंगे,इस कविता के माध्यम से भी कवि जीवन में हताश और निराश लोगों को रास्ता बता रहे हैं, वह बार बार कह रहे हैं कि जीवन में असीम खुशियां है , उन्हें स्वीकार्य करों, अभी इनका अंत कहां हुआ है। कवि छिपे हुए तरीके से कह रहे हैं कि उनका मन जोश और उत्साह से भरा हुआ है। जब तक वो अपने लक्ष्य को पा नहीं लेते, वो हार नहीं मानेंगे। कवि कहते हैं कि चारों तरफ हरे-भरे पेड़ हैं और पौधों पर खिली कलियाँ मानो अब तक सो रही हैं। मैं सूरज को यहाँ पर खींच लाऊँगा और इन सोई कलियों को जगाऊँगा। उनका अंत अभी नहीं होगा। सोये-अलसाए फूलों की तरह आलस और उदासी में जीवन व्यतीत करने वालों के लिए नव जीवन की बात करते हुए कवि कहते हैं कि मैं हर पुष्प से आलस व उदासी खींचकर, उसमें नए जीवन का अमृत भर दूँगा। अगर युवा पीढ़ी परिश्रम करेगी, तो उसे मनचाहा लक्ष्य मिलेगा और इस आनंद का कभी अंत नहीं होगा। जब तक वो थके-हारे लोगों और युवा पीढ़ी को सही राह नहीं दिखा देंगे, तब तक उनका अंत होना असंभव है। कवि अभी न होगा मेरा अंत के माध्यम से युवाओं में नवीन उत्साह रूपी संचार को बढ़ाने के लिए लालायित हैं। जीवन में खुशियां नहीं है तो वह खुशियां ले आएंगे, अभी कहां उनका अंत हुआ है, अभी उसकी मृत्यु नहीं हो सकती है।

इसलिए तो निराला जी कह रहे है कि अभी न होगा मेरा अंत...

अभी न होगा मेरा अन्त

अभी-अभी ही तो आया है

मेरे वन में मृदुल वसन्त-

अभी न होगा मेरा अन्त

हरे-हरे ये पात,

डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर

फेरूँगा निद्रित कलियों पर

जगा एक प्रत्यूष मनोहर

पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,

अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको

है मेरे वे जहाँ अनन्त-

अभी न होगा मेरा अन्त।

मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,

इसमें कहाँ मृत्यु?

है जीवन ही जीवन

अभी पड़ा है आगे सारा यौवन

स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,

मेरे ही अविकसित राग से

विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;

                       अभी न होगा मेरा अन्त।                     

                

(सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला")


Dr.Nitu  Soni

I am a Ph.D. in Sanskrit and passionate about writing. I have more than 11 years of experience in literature research and writing. Motivational writing, speaking, finding new stories are my main interest. I am also good at teaching and at social outreach.

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