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तुमने कभी ना देखा | एक कविता | FailWise

तुमने कभी ना देखा | एक कविता | FailWise

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आज मेरा बदलता रूप तुमने देखा।

आसमां में उड़ता मेरा गुरूर देखा।

तुमसे कंधे से कंधा मिलाते देखा।

पर चारदिवारी में बंद मेरी बेबसी,

और घुटन को तुमने कभी ना देखा।


आज मेरा आजाद होना तुमने देखा।

घर से बाहर निकलते मेरा अहंकार देखा।

ममता को छोड़ सपने पूरे करते देखा।

पर नौ महीने खुशी खुशी दर्द एवं पीड़ा

को सहा, उसको तुमने कभी ना देखा।


आज मेरा घूंघट को हटाना तुमने देखा।

साड़ी से जींस तक मुझको आते देखा।

अबला जीवन छोड़ सबला बनते देखा।

पर मेरे यहां तक पहुंचाने के सफर में आए,

कष्ट और संघर्ष को तुमने कभी ना देखा।


आज मुझे आधुनिक बनते तुमने देखा।

मेरे विचारों को उन्मुक्त नाम देते देखा।

मेरी स्वतंत्रता को स्वच्छंदता कहते देखा।

पर मुझमें सहनशीलता, करुणा, प्रेम एवं,

त्याग भी है जिसको तुमने कभी ना देखा।

जिसको तुमने कभी ना देखा।



Dr Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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