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उम्र जब ढलने लगे

उम्र जब ढलने लगे

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एक वक्त के बाद ये उम्र जब धीरे - धीरे ढलने लगती है।

सबकी आंखों में यह जिंदगी ना जानें क्यों खटकती है।

उम्र भर बस इस उम्मीद में जीवन की भागदौड़ चलती है। 

कि रिटायरमेंट के बाद तो ये जिंदगी आराम से कटती है।

चलता है कामकाज,तो सभी की निगाहें उन्हें ही ढूंढती है

पर कामकाज छूटते ही वही नजरें मिलने से कतराती है।

जब ड्राइंग रूम में बैठ टेबल पर आराम से टांगे फैलती है।  

सफाई करते- करते कामवाली की नजरें उन पर उठती है।

यहां से उठकर कहीं और बैठो कहती हुई वह झल्लाती है।

उठ कर जाता हूं जब अपने कमरे में तो पत्नी भी घूरती है।

कुछ करते क्यों नहीं , दिन भर बैठे - बैठे कुर्सी भी टूटती है।

कदम मुड़े तब रसोई में, पर वहां तो बहू खाना पकाती है।

कोई कोना ढूंढता हूं, तो नजरें बेटे के कमरें पर टिकती है।

यहां मत बैठो पापा, आफिस के काम में रुकावट आती है।   

होकर परेशान फिर जिंदगी जैसे खुद पर ही झल्लाती है।

तभी कहीं से एक खिलखिलाती सी हंसी सुकून दे जाती है।

कदम बढ़ें, पर यहां तो बच्चों की खेल मंडली मचलती है।

घर से बाहर निकल कर टहलना शरीर को स्वस्थ बनाती है।

तभी ताक में बैठी बहु रानी, ' बाहर जा रहे हैं ? ' पूछती है।

हां, कहने से पहले ही वह मुझको हाथ में थैला थमा देती है। 

इस समय सब्जियां ताज़ी और बहुत अच्छी मिल जाती है।

दोनों हाथों में भरें थैले आता देख फिर वह चाय पिलाती है।

दोपहर मे देखता हूं टीवी, क्योंकि अब नींद नहीं आती है।

आवाज़ आई, दिन भर टीवी बिजली फ्री में नहीं मिलती है।

इनवर्टर से पंखा चलाता हूं, जब कभी लाइट चली जाती है

बेटी बुदबुदाती, बिन पंखे इनकी एक मिनट नहीं कटती है।

अखबार पढूं तो कहते, इनकी तो आंखें भी नहीं दुखती है।

देखूं मोबाइल तो, जानें क्या देख कर ये आंखे चमकती है।

अपने ही घर की दीवारें ना जाने क्यों बेगानी सी लगती है।

किसी से नजरें मिलाते हुए भी अब ये आंखें जी चुराती है।

यह सही है कि, हर जिंदगी उम्र का यह पड़ाव झेलती है।

पर फिर भी ना जाने क्यों लोगों की सोच नही बदलती है।

दस्तूर है यही कि आज की जवानी कल बुढ़ापे में ढलती है।

बावजूद इसके बुजुर्गो की पीड़ा किसी को नहीं दिखती है।

ये अनदेखी, अनकही बाते क्यों किसी को नहीं खलती है।

वो आंखें, अपनों के दिल में प्रेम के लिए ही तो छलकती है।

ये ना सोचों, इसके बदले में वो कुछ और तुम से चाहती है।

उनकी तो हर दुआ अपनों की खैरियत के लिए ही होती है।

बावजूद इसके वो अपनो के ही साथ के लिए तरसती है।

सबकी आंखों में यह जिंदगी ना जानें क्यों खटकती है।


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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