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जब बेटी हम सबका अभिमान है तो बहू क्यों नहीं?

जब बेटी हम सबका अभिमान है तो बहू क्यों नहीं?

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नीता आंटी बाहर धूप में बैठी मटर छिल रही थी भूख से पेट में चूहे कूद रहे थे लेकिन बहू अभी स्कूल से आई नहीं थी। नीता आंटी की बहू एक स्कूल में शिक्षिका थी। उसकी छुट्टी 2 बजे होती है। घर आते आते ढाई बज जाते हैं। वह बार बार घड़ी की ओर देखती है और मन ही मन बहू को कोस रही है। क्या जरूरत है नौकरी करने की, भगवान का दिया सब कुछ तो है, पर घर से निकलने का बहाना जो चाहिए। मांजी मैं पढ़ी लिखी हूँ दिन भर घर में बैठे बैठे क्या करूंगी।

आंटी मन ही मन बुदबुदा रही थी। अरे अभी तो 1 ही बजे हैं। तभी सामने से उनकी सहेली बिमला आती हुई दिखी।नीता आंटी सहेली को देख बहुत खुश हुई। दोनों बहुत दिनों के बाद मिल रही थी। इधर उधर की बातों का सिलसिला चल पड़ा। तभी बात नीता आंटी की बेटी निधि पर आकर रुक गई।

बिमला - निधि कैसी है, क्या कर रही है आजकल।

नीता आंटी - वह तो कब से ही आफिस जाती है,बेचारी इतनी थक जाती है घर भी संभालना , बच्चो को भी देखना। सास से तो इतना भी नहीं होता कि दो रोटी ही बना लें।चाय भी आफिस से आकर वही बनाती है। दिल बहुत दुखी होता है उसके लिए (आंसू पोछते हुए)।

बिमला - अरे तो नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती।उसे क्या जरूरत है नौकरी करने की। इतने अमीर घर की बहू है।

नीता आंटी- इतनी पढ़ी लिखी है मेरी बेटी।दिन भर घर में बैठे बैठे ऊब जाएगी। थोड़ा बाहर जाएंगी तो मन बहल जाएगा और कुछ सीखने को भी मिलेगा। घर के काम का तो कोई अंत नहीं है।

बिमला -  यह भी ठीक है, और बहू कहां है पोता भी दिखाई नहीं दे रहा।

नीता आंटी - आती ही होगी महारानी। स्कूल जाती है पढ़ाने। मैंने तो बहुत मना किया। पर कहती है मैं पढ़ी लिखी हूं दिन भर घर में खाली बैठे बैठे क्या करूंगी। मेरी सुनता कौन है। अब आ कर रोटियां से़केगी तब खाना मिलेगा। मेरे नसीब में बहू का सुख कहां।

  

तभी स्कूटी की आवाज़ से उनका वार्तालाप भंग हुआ। आंटी की बहू और पोता स्कूल से आए थे।अरे कितनी देर लगा दी आज, भूखा ही मारेगी क्या। "बस मांजी रोटियां ही सेकनी है, दाल सब्जी तो बनाकर गई थी" बहू ने कहा"ठीक है, ठीक है पहले बिमला के लिए चाय बना दें।" नीता आंटी ने हुक्म सुनाया। बिमला सोच में पड़ गई कि जो बेटी के लिए दुखी हो रही है वह स्थिति बहू की भी है लेकिन उसके लिए हमारी सोच, धारना बदल जाती है।

यह कोई अप्रत्याशित घटना या कहानी नहीं है। इस तरह की घटनाएं हमें हमारे दैनिक जीवन में अक्सर देखने सुनने को मिलती हैं। और हम बड़ी सहजता से, आसानी से इसे सुनते हैं। इसमें हमें कुछ गलत नहीं लगता। हमारी यह मानसिकता कहीं बाहर से नहीं थोपी गई हैं बल्कि हमारे अंदर ही पनपी है। 

हम आज बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ की बात करते हैं। और बेटियों के प्रति हमारी सोच में बदलाव भी आया है आज प्रत्येक क्षेत्र में बेटियां आगे आ रही है ,नाम कमा रही है। घर परिवार से उन्हें आगे बढ़ने के लिए अवसर और प्रोत्साहन मिल रहा है। हमारी बेटियां पढ़ लिख कर किसी के घर की बहू बनेगी और किसी की बेटी हमारे घर बहू बनकर आएगी। उन्हें ससुराल में भी आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए। कहावत है कि "एक पुरुष की कामयाबी के पीछे एक औरत का हाथ होता है।" लेकिन एक औरत की कामयाबी के लिए उसके पूरे परिवार का साथ, प्रोत्साहन बहुत आवश्यक है। समाज में ऐसी बहुत सी महिलाएं, बहुएं हैं जो प्रतिभावान, बुद्धिमान​ है लेकिन हमारी दोहरी मानसिकता के कारण वह आगे नहीं बढ़ सकी है। जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं तो पहले हमें विशेषकर हम महिलाओं को बेटी और बहू का भेद मिटाना होगा। किसी की लिखी पंक्तियां हैं:

"बेटियां शक्कर की तरह होती हैं, जो हर हाल में मीठी लगती हैं,

लेकिन बहू नमक की तरह होती है, जिसका कर्ज नहीं उतारा जा सकता है।"

     

बहू भी किसी की बेटी होती हैं वह अपना घर परिवार छोड़ कर आती है वह भी उसी सम्मान और अवसर की हकदार हैं जो हम अपनी बेटियों के लिए चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारी पढ़ी लिखी बेटियों को अपने ससुराल में आगे बढ़ने के अवसर मिलें। सफलता के शिखर तक पहुंचे। लेकिन यही स्थिति और अवसर देने की बात जब अपनी बहुओं के लिए आती हैं तो हमारी सोच, हमारी धारणा बदल जाती है। हम चाहते हैं कि हमारी बहू बस घर परिवार संभाले। जो आज सास है वह भी कभी बहू थी फिर उनकी सोच में यह अंतर क्यों आ जाता है।

"किसी की बेटी हमारे घर की बहू है और हमारी बेटी किसी के घर की बहू है।

हमारी बेटी के पास वही लौट कर आनेवाला है जो व्यवहार हम अपनी बहू के साथ करेंगे।"

इसलिए बेटी को पढ़ाने और आगे बढाने के साथ साथ बहू को भी आगे बढ़ने के अवसर दें, सम्मान दें। उसका सहयोग करें। हमें कोई हक नहीं है कि हम किसी को भी आगे बढ़ने से रोकें। सबको आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हैं। उन्हें आशीर्वाद दें कि वह भी सफलता के शिखर पर पहुंचे। अपने घर परिवार से शुरू करके ही हम नारी सशक्तिकरण की समाज में मिसाल कायम कर सकते हैं।

अब ​वक्त आ गया है यह कहने का- "मेरी बहू मेरा अभिमान"

उन सभी बहुओं को समर्पित हैं जो कुछ करना चाहती हैं, आगे बढ़ने के अवसर चाहती हैं। हैप्पी करवाचौथ।

आंखें नीचे, चुन्नी सर पे बारहा हो जाती है। दादाजी घर आते हैं, मां बहू हो जाती हैं।


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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