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क्यों कहते हो अबला मुझे..

क्यों कहते हो अबला मुझे..

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  क्यों कहते हो अबला मुझे।

घर को बनाया उसे संभाला,बगिया को संवारा तेरे,

तुम्हारे तन को, मन को अपने प्रेम से तृप्त किया है मैंने।

संस्कारों का घूंघट ओढ़े, मर्यादा का लिबास लपेटे,

अपने सपनों को, अस्तित्व को मन में ही मारा है मैंने।

फिर क्यों कहते हो अबला मुझे।


मन मेरा भी हुआ आसमां में उड़ने का, सपने देखने का ,

पंख काटे, असहाय किया, पर हौसला ना छोड़ा है मैंने।

अपनी पीड़ा को दबाएं, मुस्कुराते हुए आगे कदम बढ़ाया,

मां, पत्नी, बेटी का फर्ज निभाते हुए सपने पूरे किए हैं मैंने।

फिर क्यों कहते हो अबला मुझे।


कंधे से कंधा मिलाकर चली, साथ दिया हमेशा तुम्हारा,

पर अपने जीवन पथ पर खुद को अकेला ही पाया है मैंने।

बिना रुके, बिना थके तय किया है उम्र का एक लंबा सफर,

अपनी हिम्मत से खुद को अबला से सबला बनाया है मैंने

फिर क्यों कहते हो अबला मुझे।


तुम से आगे निकल जाना नहीं रही कभी चाहत मेरी,

तुम्हारे प्रेम में, तुम में ही खुद को हमेशा संवारा है मैंने।

बस, बहुत हुआ अब और नहीं, खुल गए हैं सब बंद दरवाजे

चुनौतियों को स्वीकार कर अपना लोहा मनवाया है मैंने।

फिर क्यों कहते हो अबला मुझे।


क़ैद चारदीवारी में किया, रिवाजों की बेड़ियों में जकड़ा,

अबला नाम तुमने दिया पर सदियों तक इसे जिया है मैंने।

दुर्गा काली की शक्तियां मैंने पाई है यह स्वीकारा है तुमने,

विडंबना तो देखो, पुरुष को अपनी कोख से जन्मा है मैंने।

फिर क्यों कहते हो अबला मुझे..


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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