X

थोड़ा आसमान हमारा भी है। शक्तिस्वरूपा नारी अवसर चाहती है, पूजा नहीं!

759 views Save

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:। (मनुस्मृति 3.56)

[जहां पर स्त्रियों की पूजा (सम्मान) होती है, वहां देवता रमते हैं।

जहाँ उनकी पूजा नहीं (असम्मान) होती, वहाँ सब काम निष्फल होते हैं।]


नवरात्रि का त्योहार शुरू हो गया है। नवरात्रि स्त्रीत्व शक्ति का पर्व है। हमारे हिंदू धर्म में, आदिशक्ति सभी रचनाओं में निहित अंतिम स्त्री शक्ति है। यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। नारी मूलतः शक्ति है, वह असीम ऊर्जा है, जिसके बिना संरचना, पोषण, रक्षा और आंनद की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पिछले कुछ दशकों से नारी सशक्तिकरण की लहर चल रही है। परंतु नारी को शक्तिशाली बनाने की जरूरत नहीं है, नारी तो स्वयं में शक्ति है। वह तो सदियों से शक्तिशाली है। जो नारी अपने कोख से पुरुष को जन्म देती है, वह शक्ति हीन कैसे हो सकती है। नारी कोमल है किंतु कमजोर नहीं है। 

नारी को शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता नही हैं बल्कि उसे अवसर चाहिए अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए।

प्राचीन काल से हम नवरात्रि उत्सव मनाते आ रहें है। नारी की शक्ति रूप में उपासना करते हैं, आराधना करते हैं। मां दुर्गा की पूजा करते हैं उनसे शक्ति मांगते हैं लेकिन जो जीवित नारी है उसकी शक्ति, उसका सम्मान हमे स्वीकार नहीं है। नारी को सशक्तिकरण की जरूरत नहीं है बल्कि समाज को अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है। बचपन से ही हम लड़कियों का पालन पोषण इसी तरह करते हैं कि वह लड़की है, लड़कों की तुलना में कमजोर है, उन्हें सुरक्षा की जरूरत है, संभल कर रहने की जरूरत है। उन पर तरह तरह की पांबंदिया लगाई जाती है इसलिए नहीं कि वह कमजोर है बल्कि इसलिए कि हमारी मानसिकता सदियों से यही बन गई हैं।

पुरुष प्रधान समाज में हमेशा ही नारी को दबा कर रखा गया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब नारियों को अवसर मिला है उन्होंने अपनी श्रेष्ठता साबित की है। जब हम उन्हें अवसर ही नहीं देंगे तो वह अपने आप को कैसे साबित करेंगी। आज प्रत्येक क्षेत्र में नारी ने अपना वर्चस्व कायम किया है। वह किसी से कम नहीं है, अंतरिक्ष तक जा पहुंची है। परंतु हमारी मानसिकता उसे स्वीकार नहीं कर पाती है। यह मानसिकता केवल पुरुषों की ही नहीं बल्कि नारियों की भी है। हम अपनी बेटियों की परवरिश बचपन से ही इसी तरह करते हैं कि बड़े होते होते उनकी भी मानसिकता यही बन जाती है । उसे अबला नाम दे दिया गया है जिसे कभी कभी वह स्वयं छोड़ नहीं पाती है।

नारी सशक्तिकरण के दौर में हम पुरुषों को ये तो समझना भूल ही गए की सशक्त नारी के साथ कैसे रहे और कैसा व्यवहार करे! 

अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित मां दुर्गा की प्रतिमा की पूजा तो आस्था के साथ करती है लेकिन स्वयं की शक्ति पर आस्था नहीं होती और जो लड़की, औरत इस मानसिकता के दायरे से निकल जाती है, या निकलना चाहती है तो समाज उसे स्वीकार नहीं कर पाता। उसके चाल चलन पर उंगली उठाई जाती है, यहां तक कि उसके चरित्र पर संदेह किया जाता है। और इसमें केवल पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी शामिल है। कहीं न कहीं हम महिलाएं भी इसी सोच से दबी हुई है, हमने भी इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है। 

नारी को सहारा नहीं अवसर दें, उसकी अवहेलना नहीं बल्कि उस पर विश्वास करें, उसे प्रोत्साहित करें। अगर आप उसे हौसला नहीं दे सकते तो उसके रास्ते में रूकावट भी ना बने।

उसके पास पंख है बस उड़ने के लिए आसमान की जरूरत है, वो उससे ना छिने।

जहां तक सवाल है वर्तमान में नारी दुष्कर्म का, नारी सुरक्षा का, तो उसके लिए कानून और प्रशासन क्या कदम उठाती है यह उनका कार्यक्षेत्र है। लेकिन क्या हमारी स्वयं की कोई जिम्मेदारी नहीं है। हम में से कितनी ऐसी महिलाएं हैं जो अपने बेटों को बचपन से ही यह समझाती हैं कि लडकियां कमजोर नहीं है। वह मां दुर्गा का रूप है, सम्मान की हकदार हैं। अष्टमी, नवमी के दिन हम नौ देवियों (कन्याओं) को घर बुलाकर उनकी पूजा करते हैं। तब हमें अपने बेटों को कहना चाहिए कि ये कन्याएं पूजनीय है और जीवन में हमेशा​ इन्हें सम्मान की नजर से देखे। जब हम लड़कियों को इतनी सीख देते हैं तो अपने बेटों को यह संस्कार क्यों नहीं देते, जिससे कि भविष्य में उनके मन में नारी के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हो सकें।

नारी यह नहीं चाहती कि हमें पूजनीय बनाया जाए। बस उन्हें सम्मान दें, थोड़ा सा आसमान दें, बराबरी का दर्जा दें। और यह तभी संभव होगा जब हम, हमारा परिवार, हमारे समाज की सोच बदलेगी, मानसिकता बदलेगी। और यह सोच हमें अपने घर, परिवार से ही शुरू करनी होगी।

पत्नी द्वारा युद्ध पर जाते हुए योद्धा को कवच पहनाना, गये जमाने का कोई विचित्र फैशन मात्र नहीं था. यह बात शाश्वत सत्यों में से एक हैं कि स्त्री के स्पर्श के बिना आत्मदृढ़ता का कवच हृदय को मजबूत नहीं बना सकता और केवल स्त्री के प्रेरणा के अभाव में योद्धाओं का पराक्रम धुल में मिल जाता हैं. - रस्किन


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

759 views

Recent Articles