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पिंजरा: पिंजरे में सज़ा नहीं, जीवन है

पिंजरा: पिंजरे में सज़ा नहीं, जीवन है

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विनिता एक 35 वर्षीय खुशमिजाज महिला थी। वह एक निजी विद्यालय में अध्यापिका थी। कोरोना के कारण विद्यालय बंद थे। वह ऑनलाइन कक्षाएं ही ले रही थी। अब विद्यालय की भी छुट्टियां हो गई थी, इस लिए आनलाईन कक्षाएं भी नहीं लेनी पड़ रही थी। घर में पति, दो बच्चे, सास-ससुर थे। आराम से उनका जीवन कट रहा था तभी उन्हें पता चला कि उनके पड़ोस के गुप्ता जी के परिवार के सभी सदस्य कोरोना संक्रमित हो गये है। गुप्ता जी के परिवार के साथ उनका उठना-बैठना था। इस लिए सुरक्षा की दृष्टि से उनके परिवार वालों ने भी तय किया कि उन सब को भी अपना कोरोना टेस्ट करवा लेना चाहिए। सभी ने अपना टेस्ट करवाया। सभी की रिपोर्ट नेगेटिव आई , लेकिन विनीता की पॉजिटिव आई, हालांकि उसे कोरोना के कोई लक्षण नहीं थे,वह स्वस्थ लग रही थी किंतु 14 दिन क्वारंटाइन तो रहना ही था सो वह अपने कमरे में 14 दिन के लिए बंद हो गई। उसके कमरे में टीवी , ए.सी., कंप्यूटर सब भौतिक सुख सुविधाएं थी। चाय नाश्ता-खाना सब घरवाले उसके कमरे के दरवाजे के बाहर रख देते थे और उठाकर वह अंदर ले आती थी। योगा करती, टीवी देखती, सहेलियों से बातें करती , थोड़ा अपना पढ़ाई -लिखाई का काम करती , इस तरह तीन-चार दिन उसके मजे में कैसे निकल गये उसे पता ही नहीं चला। शादी के बाद पहली बार उसे अपने आप के लिए इतना समय मिल रहा था। जैसे चाहे वैसे रहो, कोई रोक टोक नहीं, जब मर्जी उठो। ना काम का टेंशन, ना बच्चों की खट-पट। आराम ही आराम। पर आराम भी कब तक।

जैसा कि ज़फ़र इक़बाल ने लिखा है, "थकान भी लाजमी थी कुछ काम करते-करते, कुछ और थक गया हूं आराम करते करते।" 

विनीता के साथ भी यही हुआ। धीरे-धीरे उसे यह वातावरण असहज लगने लगा। ना तो अब उसे टीवी में कोई दिलचस्पी थी, ना सहेलियों से बातें करने में , पढ़ने लिखने में भी उसका मन नहीं लगता था। अपने आप को बहुत ही असहज ,असहाय और मजबूर महसूस करने लगी थी। भौतिक सुख सुविधाओं से सुसज्जित उसका यह कमरा अब उसे काटने को दौड़ता था। एक-एक पल उसके लिए निकालना मुश्किल होता जा रहा था बच्चों की याद अब उसे सताने लगी थी। सास और पति पर काम का बोझ बढ़ गया ,यह सब सोच सोच कर ही वह बेचैन रहने लगी थी। जबकि फोन पर वह अपने पति बच्चों से बातें किया करती थी फिर भी वह अब बहुत उदास रहने लगी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे एक पिंजरे में बंद हो गई है, सोने के पिंजरे में।

गुमसुम सी खिड़की के पास बैठी वह बाहर का नजारा देख रही थी तभी उसकी नजर पेड़ की डाल पर बैठे एक तोते पर पड़ी। उसे देखते ही याद आया कि बचपन में उनके घर के पास गुप्ता जी का घर हुआ करता था। गुप्ता जी ने एक तोता पाल रखा था। बहुत ही खूबसूरत पिंजरा उस तोते के लिए बनवाया था। दिन में दो बार उस पिंजरे की सफाई करते, दाना पानी डालते , तोते को बोलना सिखाते। उसका नाम प्यार से मिट्ठू रखा था उन्होंने। गुप्ता जी को तोते से बहुत प्रेम था। विनीता भी बचपन में उस तोते से मिलने जाया करती थी। उसे भी वह बहुत भाने लगा था। घर आकर वह बहुत जिद करती थी कि उसे भी ऐसा ही एक तोता चाहिेए। लेकिन उसके माता-पिता ने साफ इंकार कर दिया कि किसी भी पक्षी को इस तरह बंद करके रखना सही नहीं है। उसकी जगह खुले आसमान में है यह अनुचित है। पर उसका मासूम मन इन सब बातों को कहां मानने वाला था।

वह जिद पर अड़ी रही , खूब बवाल मचाया,खाना पीना तक छोड़ दिया लेकिन उसकी एक न चली आखिर उसने अपना मन मार लिया और जब इच्छा होती गुप्ता जी के घर जाकर मिट्ठू से मिल लेती। उसे लगता था कि शायद उसकी माताजी का काम बढ़ जाएगा इसलिए वह तोते को घर लाना नहीं चाहती है। जब बड़ी हुई उसकी शादी हो गई तो उसने अपनी यह इच्छा अपने पति को भी बताई पर कोई फायदा नहीं हुआ वहां से भी उसे वही जवाब मिला जो बचपन से मिलता आया था। खिड़की में बैठी अपने बचपन की यादों में खोई हुई थी कि तभी उसने देखा तोता पेड़ की डाल से उड़ गया और आसमान में जाकर कहीं खो गया। उसने महसूस किया कि वह भी तो पिंजरे में बंद उस तोते की तरह हो गई है। सब सुख सुविधाओं से पूर्ण उसका कमरा उसे अब पिंजरा लगने लग गया था। उसके कमरे में सारी सुख सुविधाएं थी, जैसे चाहे रहो ,जो चाहे करो, बस बाहर नहीं निकल सकते। आखिर तोते और उसमें क्या फर्क रह गया था। बचपन की वो तर्क हीन , बचकानी जिद जो कभी पूरी नहीं हुई उस पर उसे बहुत ग्लानि महसूस हो रही थी। आज उस पिंजरे में कैद तोते की पीड़ा को वह महसूस कर पा रही थी।

"जाने परिंदे कैसे रह लेते हैं पिंजरे में,

मुझे तो एक पल भी अब बर्दाश्त नहीं होता।"

चाहे इंसान हो या परिंदा कैद किसी को भी नहीं भाती। पिंजरा तो पिंजरा ही होता है, चाहे सोने चांदी का ही क्यों ना हो। आज कोरोना की इस महामारी ने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है। इंसान की सोच बदल गयी है। यह कैसा मंजर है ,कैसी सज़ा है, इंसान इंसान के लिए ही खतरा बन गया है। आज यह पिंजरा जरूरी हो गया है। जीने की मजबूरी हो गया है। कल और आज में समय बहुत बदल चुका है। कल तक पक्षी कैद में थे, पिंजरे में थे और हम आजाद घूम रहे थे लेकिन आज हम पिंजरे में है, जीने के लिए, अपनों के साथ रहने के लिए। हम खुशनसीब हैं कि हमारे पास घर है, पिंजरा है कैद होने के लिए। जरा सोचिए उन लोगों के बारे में जिनके पास पिंजरा भी नहीं है, कोई आसरा भी नहीं है, खुद को सुरक्षित रखने के लिए। जान हथेली पर रखकर चल रहें हैं जीने के लिए। यदि कल उन्मुक्त गगन में उड़ना है तो आज पिंजरे को स्वीकार करना ही होगा। पिंजरा सज़ा नहीं है बल्कि जीवन रक्षक है। ये समय मुश्किल जरूर है पर गुजर जाएगा ।आज जिसने पिंजरे को अपना लिया वह सुरक्षित रहेगा, अपनों के साथ रहेगा। इसलिए घर पर ही रहें, सुरक्षित रहें।

"बेगुनाही की सजा काट कर वो जब घर आया, सबसे पहले उसने पिंजरे में बंद परिंदों को उड़ाया।"


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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