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इंसान की परख लिहाज से होती है, लिबास से नहीं

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दया बहन अपने मोहल्ले की सबसे उम्रदराज महिला थी। उनके मोहल्ले में अधिकतर मध्यवर्गीय परिवार ही रहते थे।तीन बच्चे थे जिनमें दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी। एक बेटा है, जो कालेज में पढ़ता है। पति सुबह ही आफिस के लिए निकल जाते हैैं​। दया बहन थोड़ी पुराने ख्याल की थी।

आजकल दिन भर वह अकेली ही रहती है। पहले उनके सामने वाले घर में शर्माजी का परिवार किराये पर रहता था। उनके साथ दया बहन का दिन कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था। जब से वह गये हैं, दया बहन का मन ही नहीं लगता। अचानक बाहर शोर की आवाज आई तो दया बहन बालकनी में देखने आई। सामने वाले घर में नये किरायेदार आए थे, यह सोचते ही मन ही मन बहुत खुश हुई। राजेश, उसकी पत्नी निहारिका और उनका तीन साल का बच्चा अब उनके नये पडौसी थे। परंतु एक, दो दिन में ही दयाबहन की खुशी गायब हो गई। निहारिका एक आधुनिक महिला थी, वह पाश्चात्य कपड़े ही पहनती और अधिकतर उसे अंग्रेजी में ही बात करते देखा था। उसके छोटे छोटे कपड़े दया बहन को खटकते थे। वह बाहर सड़क पर भी बच्चे के साथ ऐसे ही कपड़ों में घूमती। दया बहन को यह नये पड़ौसी बिल्कुल भी रास नहीं आए। उन्होंने निहारिका के बारे में एक अलग ही राय बना ली थी। परंतु बहुत जल्दी ही उनकी धारणा बदल गई।

एक दिन दया बहन बाजार से घर आ रही थी। अचानक घर के बाहर ही​ उनका पैर फिसल गया। उनकी चीख सुनते ही निहारिका भाग कर उनके पास आई। बड़ी मुश्किल से उसने दया बहन को उठाया और अपने घर लाई। उसने गर्म पानी से दया बहन का पैर साफ किया, उस पर दवाई लगाई। थोड़ी देर बाद वह दया बहन के लिए चाय बना कर ले आई और अपने घर का अधूरा पड़ा झाड़ू, पोंछा करने लगी, फिर बर्तन मांजने लगी तभी उसके बच्चे की रोने की आवाज आई। वह बर्तन छोड़ बच्चे को गोद में लिए दया बहन के पास आकर बैठ गई।

दया बहन ने पूछा, "आज तुम्हारी कामवाली नहीं आई।"

निहारिका ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं आंटी मैं अपना काम खुद ही करती हूं। पूरा दिन घर में मैं क्या करूंगी, जब तक बेटा छोटा है मैं नौकरी तो करूंगी नहीं। बच्चे को अभी मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। इस लिए घर में रहकर मैं घर और बच्चा दोनों को संभालती हूं।"

तभी घड़ी की ओर देखते हुए निहारिका ने कहा, "आंटी दो बज गए हैं अब आप खाना खालो। मैंने आपके लिए खाना बना लिया है।"

उसकी बातें सुनकर दया बहन को बहुत सकुन मिल रहा था। उन्होंने पूछा,"तुम कब खाओगी।" तभी निहारिका ने कहा,"आंटी मेरा तो आज एकादशी का उपवास है। शाम को पूजा करके फिर फलाहार करूंगी।"

दया बहन सोचने लगी इस उम्र में निहारिका उपवास भी रखती है जबकि यह तो अभी तक उन्होंने भी नहीं किया। कितने अच्छे संस्कार है उसके। उन्हें पश्चाताप हो रहा था कि सिर्फ उसके लिबास देखकर ही उन्होंने उसके बारे में कितनी गलत धारणा बना ली थी। आज उन्होंने महसूस किया कि केवल कपड़ों के आधार पर किसी के व्यवहार और संस्कारों को आंका नहीं जा सकता। वस्त्र तो केवल बाहरी आवरण है। हम अपनी परंपराओं और संस्कारों के साथ भी आधुनिक हो सकते हैं। मोहल्ले की वो दया बहन जो सबको सीख देती थी आज खुद उसे एक सीख मिली थी।

यह सही है कि लिबास व्यक्ति को प्रभावित करता है। अधिकतर व्यक्ति के पहनावे को देखकर ही उसके व्यक्तित्व, संस्कार और समाज में उसके स्तर का पता चलता है। बदलते परिवेश में व्यक्ति के परिधान अर्थात लिबास भी बदल गए हैं। कोई भी व्यक्ति चाहे स्त्री हो या पुरुष अपनी सुविधा, पसंद एवं आराम के अनुसार अपने कपड़े चुनते हैं। कोई स्त्री यदि आधुनिक कपड़ों में अपने आप को अधिक आरामदायक महसूस करती है और पहनती है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह संस्कारी नहीं, सभ्य नहीं, या उसमें नैतिकता, एवं मानवीय मूल्य नहीं है। अपनी पसंद और रूचि के अनुसार वस्त्र पहनना सबका अधिकार है। आवश्यकता केवल इतनी है कि किसी भी लिबास में हम अपनी गरिमा बनाए रखें।

"यह इंसानो की बस्ती है साहब, यहां लिहाज की परख लिबास से होती है"


Dr. Rinku Sukhwal

M.A. (Political Science, Hindi), M.Ed., NET, Ph.D. (Education) Teaching Experience about 10 years (School & B.Ed. College) Writing is my hobby.

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