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आत्मगलानि: “सारथी” बनो ना कि “स्वार्थी

आत्मगलानि: “सारथी” बनो ना कि “स्वार्थी

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घड़ी में सुबह के 8:30 बज रहे थे। सुधा जल्दी-जल्दी रसोई का काम निपटा रही थी। पति, बच्चों का सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना तैयार करके उसे ऑफिस जाना था। लॉक डाउन की वजह से बच्चों के स्कूल बंद थे। घर पर ही ऑनलाइन क्लासेस होती थी। बच्चों के साथ साथ पति रोहित भी घर से ही ऑनलाइन कार्य कर रहे थे। लेकिन उसे ऑफिस जाना पड़ता था। जल्दी जल्दी काम निपटा कर उसे 10:00 बजे तक ऑफिस पहुंचना था ।आज उसे देर हो गई। सारा काम निपटा कर उसने जल्दी-जल्दी गाड़ी निकाली और चल पड़ी ऑफिस की ओर।

मन में सोच रही थी कि आज फिर से देर हो गई। तभी देखा सड़क पर एक दुर्घटना हो गई है। एक बुजुर्ग के स्कूटर को गाड़ी ने टक्कर मार दी। बुजुर्ग सड़क पर गिर गए। गाड़ी में बैठे बैठे ही उसने देखा बुजुर्ग को काफी चोट लगी है। सड़क पर वाहन दौड़ रहे थे लेकिन किसी ने भी बुजुर्ग का हालचाल जानने की कोशिश नहीं की। रूक कर उनको उठाने का किसी ने भी प्रयास नहीं किया। उसे बहुत क्रोध आ रहा था। कैसे इंसान हैं सब बढ़े चले जा रहे हैं। किसी ने भी बुजुर्ग की मदद करने की कोशिश नहीं की।

ऑफिस पहुंच कर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ। दिन भर उसका मूड खराब रहा। "सबको जल्दी पड़ी है, किसी को किसी से कोई लेना देना ही नहीं है।" मन ही मन बुदबुदा रही थी। इसी उधेड़बुन में कब शाम के 5:00 बज गए उसे पता ही नहीं चला। घर पहुंच कर भी उसका मन उखड़ा -उखड़ा ही रहा। पति रोहित उसकी स्थिति भाप गए।


रोहित ने पूछा "क्या हुआ ? आज ऑफिस में किसी ने कुछ कह दिया।"

सुधा- "नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है।"

परंतु पति के जोर देने पर उसने सुबह की सारी घटना बताई और कहने लगी "मुझे इतना गुस्सा आ रहा है। एक भी इंसान उनकी सहायता के लिए नहीं रुका ,सब देख कर निकल गए।"

तभी पास खड़े 8 वर्षीय पुत्र जो सारी बातें सुन रहा था बड़ी मासूमियत से पूछा -"फिर आप रूकी क्या ममा? आपने उनकी मदद की। ज्यादा चोट तो नहीं आई उन्हें।"

यह सुन उसे मानो करंट लग गया हो, वह सकपका गई। उसका क्रोध एक क्षण में ग्लानि में बदल गया। उसे पछतावा हो रहा था कि वह भी तो रुक सकती थी।

ऐसा ही होता है, हम हमेशा दूसरों से उम्मीद करते हैं। वह मदद करने वाले हाथ हमारे भी तो हो सकते हैं। जिस इंसानियत को हम दूसरों में ढूंढते हैं, उस की शुरुआत हम स्वयं से भी तो कर सकते हैं। दूसरों पर जो इल्जाम हम लगाते हैं वह हम पर भी लागू होता है। हम अपने लिए मदद की उम्मीद करते हैं पर दूसरों की मदद करने की बात आती है तो हम पीछे हट जाते हैं। जल्दी तो सबको है, काम सबको है पर मानवता, इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं है। मदद करने की इच्छा होनी चाहिए,मन होना चाहिए तो रास्ते अपने आप निकल आते हैं। वो मददगार हम क्यों नही हो सकते?

मौका मिले किसी को मदद करने का, तो बनना “सारथी” ना कि “स्वार्थी

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