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यह दान है कि दिखावा?

यह दान है कि दिखावा?

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कमला दूसरों के घरों में बर्तन मांज कर अपने परिवार का पालन पोषण करती थी। उसका पति शराबी था। कुछ कमाता नहीं था। तीन बच्चे थे जिन्हे, पढ़ा लिखा कर वह बड़ा आदमी बनाना चाहती थी इसलिए वह अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी। बड़ी खुद्दार थी। दिन-रात मेहनत करती पर किसी के आगे हाथ नहीं पसारे कभी। लॉकडाउन के कारण दो चार घरों में उसका काम छूट गया पैसे की तंगी होने लगी। दोनों बच्चों की बोर्ड की क्लासेस थी एक दसवीं में था दूसरा बारहवी में। उसे स्कूल की फीस भरनी थी तभी उसने सोचा कि विमला देवी जिनके घर में बर्तन मांजने जाती है शहर के अमीर लोगों में से हैं उनसे कुछ एडवांस मांग लेगी, वह जरूर उनकी मदद करेंगी।

यह सोचते ही उसके मन में उम्मीद की किरण जागी। पाव जल्दी जल्दी चलने लगे वह विमला देवी की कोठी पहुंचकर जल्दी जल्दी काम खत्म करने लगी और काम खत्म करके विमला देवी के सामने खड़ी हो गई।

बिमला देवी ने पूछा- "क्या हुआ।"

कमला - "मैडम मुझे तीन हजार रुपए एडवांस चाहिए। आप हर महीने की पगार में से काट लेना।"

विमला देवी- "क्या करेगी इतने पैसों का।"

"कमला - "मैडम इस साल बच्चों की बोर्ड की क्लास है मुझे स्कूल में फीस जमा करानी है कल आखिरी तारीख है।" 

विमला देवी की भौंहें चढ गई, कमला को ऊपर से नीचे देख कर बोली- "इतने पैसे तो मैं नहीं दे सकती और जब तेरी औकात नहीं है तो सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाती अपने बच्चों को। पैसे मांग मांग कर कौन सा ऑफिसर बन जाएंगे। मैं तो कहती हूं पढ़ाई छुड़ाकर किसी काम पर लगा दे।"

तभी विमला देवी की नजर दरवाजे पर पड़ी। शहर की समाज सेविका निधि शर्मा उनके घर की ओर आ रही थी। उन्हें आता देख विमला देवी का मुख मंडल खिल गया उनका स्वागत करते हुए पूछा "कैसे आना हुआ निधिजी।"

बैठते हुए निधि शर्मा ने कहा - "मैडम शहर में जो अनाथालय हैं उसके लिए कुछ चंदा एकत्रित कर रहे हैं खाने पीने का खर्चा तो सरकार देती है। पढ़ाई लिखाई, स्कूल की फीस आदि का खर्चा समाज के बड़े-बड़े लोगों के योगदान से एकत्रित करते हैं अगर आप भी इसमें कुछ सहयोग करना चाहे तो," बीच में ही विमला देवी ने कहा- "हां-हां क्यों नहीं,आप तो जानते ही हो कि मैं दान धर्म के लिए कभी पीछे नहीं रहती और यह तो बच्चों के भविष्य का कार्य है आज के बच्चे कल के नागरिक हैं। इनकी शिक्षा के लिए तो हमें अवश्य आगे आना चाहिए आखिर मानवता भी तो कोई चीज है।आप मेरी तरफ से इक्कीस हजार रुपए दान में लिख लीजिए।"

दस मिनट बाद बिमला देवी ने नया स्टेटस डाला। ढेरों लाइक्स मिल रहें थे।

"कमला खड़ी खड़ी मानवता की नई परिभाषा समझ रही थी।"

यह दान है कि दिखावा। वास्तव में यह हम दूसरों की मदद नहीं कर रहें हैं बल्कि उनके जरिए अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहें हैं अपना नाम,यश फैलाने के लिए कर रहे हैं। असली मदद वह है जब हम निस्वार्थ भाव से बिना किसी उम्मीद के किसी की मदद करते हैं। हम दूसरों की कितनी सहायता कर रहें हैं,यह महत्व नहीं रखता बल्कि किस भाव से कर रहें हैं, वह वास्तविक सहायता है।

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